देहदान पर सम्मान की घोषणा, लेकिन असली सवाल प्रोत्साहन का
फूल-माला और प्रशस्ति पत्र से आगे बढ़े सरकार : देहदान का संकल्प लेने वालों को जीवनभर निःशुल्क इलाज की सुविधा देने पर हो विचार
रायपुर
छत्तीसगढ़ सरकार ने सेवा संकल्प अभियान के तहत देहदान और अंगदान को बढ़ावा देने की पहल की है। मुख्य सचिव श्री विकासशील ने कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि देह एवं अंगदान करने वाले परिवारों को सम्मानित किया जाए और जिन मरीजों को दान किए गए अंगों से जीवन मिला है, उनके परिवारों को भी कार्यक्रमों में शामिल कर उनकी प्रतिक्रिया ली जाए।
सरकार का यह प्रयास निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या देहदान और अंगदान जैसे महान सामाजिक संकल्प को केवल सम्मान समारोह, फूल-माला और प्रशस्ति पत्र तक सीमित रखा जाना चाहिए?
सरकार यदि वास्तव में समाज में देहदान और अंगदान की संस्कृति को मजबूत करना चाहती है तो सम्मान के साथ-साथ ठोस प्रोत्साहन की व्यवस्था पर भी विचार करना चाहिए।
‘सम्मान’ के साथ मिले सुरक्षा का भरोसा
भूमकाल समाचार का सुझाव है कि जो व्यक्ति जीवित रहते हुए देहदान या अंगदान का संकल्प लेता है, उसे सरकार केवल मृत्यु के बाद सम्मानित करने के बजाय उसके जीवनकाल में भी सम्मान और सुरक्षा का अनुभव कराए।
सरकार ऐसी नीति पर विचार कर सकती है जिसमें देहदान/अंगदान का विधिवत संकल्प लेने वाले पात्र नागरिक को मृत्यु तक सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में निःशुल्क उपचार अथवा निर्धारित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो।
इससे देहदान को किसी लाभ के लेन-देन के रूप में नहीं, बल्कि समाज के प्रति योगदान के रूप में प्रोत्साहित किया जा सकेगा। साथ ही आम नागरिक के मन में यह संदेश भी जाएगा कि सरकार उनके इस सामाजिक संकल्प को गंभीरता से महत्व देती है।
सवाल यह भी कि कितने लोगों ने संकल्प लिया और कितने दान हुए?
सरकार ने अभियान में बड़े पैमाने पर गतिविधियां आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में पारदर्शिता के लिए यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि—
- छत्तीसगढ़ में अब तक कितने लोगों ने देहदान का संकल्प लिया है?
- वास्तव में कितने देहदान हुए?
- कितने लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया और कितने मामलों में अंगदान संभव हुआ?
- दान किए गए अंगों से अब तक कितने मरीजों को जीवन मिला?
- देहदान के बाद मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में उसका उपयोग किस प्रकार हुआ?
- देहदान करने वाले परिवारों को सरकार की ओर से क्या-क्या सहायता और सम्मान दिया गया?
इन आंकड़ों को जिला और राज्य स्तर पर सार्वजनिक किया जाए तो अभियान की वास्तविक उपलब्धि भी सामने आएगी।
फूल-माला से ज्यादा जरूरी है सामाजिक सुरक्षा का संदेश
किसी परिवार का अपना प्रियजन खोने के बाद उसकी देह को चिकित्सा शिक्षा और मानवता के लिए दान करना सामान्य निर्णय नहीं है। यह एक बड़ा सामाजिक और मानवीय संकल्प है।
ऐसे परिवारों को मंच पर बुलाकर फूल-माला पहनाना और प्रशस्ति पत्र देना सम्मान का एक तरीका हो सकता है, लेकिन सरकार का वास्तविक सम्मान तब दिखाई देगा जब वह देहदान का संकल्प लेने वाले नागरिकों और उनके परिवारों के साथ संस्थागत रूप से खड़ी दिखाई दे।
भूमकाल समाचार का मानना है कि सरकार को इस दिशा में एक ऐसी नीति पर विचार करना चाहिए, जिसमें देहदान/अंगदान के संकल्प को स्वास्थ्य सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक मान्यता से जोड़ा जाए।
क्योंकि देहदान मृत्यु के बाद समाप्त होने वाली जिंदगी नहीं, बल्कि किसी और के ज्ञान, चिकित्सा और भविष्य के लिए छोड़ी गई एक मानवीय विरासत है।
सरकार अगर इस भावना को समझते हुए सम्मान के साथ ठोस प्रोत्साहन की नीति बनाती है तो संभव है कि आज केवल कुछ लोग जो संकल्प ले रहे हैं, कल हजारों लोग देहदान और अंगदान के लिए आगे आएं।
