जनपक्षीय विचार क्यों आधार है, गंभीर धाराओं के….
साथी Rupesh Kumar Singh का पटना हाई कोर्ट से 9 सितम्बर को जमानत खारिज हो चुकी है। क्योंकि उनपर गंभीर धाराएं, यूपीए एक्ट लगी है, एक वर्ष के अंदर पूरी ट्रायल कम्प्लीट होने की बात भी आई है। इससे पहले एक दूसरे केस में भी जमानत सुप्रीम कोर्ट से रिजेक्ट हुआ था, उसका आधार भी यूएपीए की गंभीर धाराओं का होना ही था।
हमारे देश में बहुत से बुद्धिजीवी है जिन्हें यूएपीए की धारा होने के आधार पर चार, पांच सालों तक बेल नहीं मिलता।
उनके विचारों के कारण न ही सिर्फ उनपर केस दर्ज किया जाता है, बल्कि यूपीए जैसी गंभीर एक्ट की धाराएं लगाकर जमानत पाने की स्वतंत्रता भी छीन ली जाती है।
यूएपीए की धाराएं जमानत पाने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करती है, प्रथम दृष्टया अगर आरोप बनता दिखता है तो जमानत नहीं मिलेगी, यानी जमानत खारिज होने के लिए इतना काफी है कि आप पर गंभीर आरोप लगा दिए गए हों।
इधर काफी वर्षों से यूएपीए का इस्तेमाल धड़ल्ले से बुद्धिजीवी वर्ग के खिलाफ किया जा रहा है। भ्रष्टाचार, घूसखोरी, घोटाले, कालाबाजारी, जो समाज को दीमक की तरह चाट रहे हैं के खिलाफ कोई ऐसा सख्त कानून नहीं है जो इन अपराध को करने वालों को डरा सके, रोक सके, इनके लिए जमानत के शर्त उतने सख्त नहीं है पर एक जनपक्षीय व्यक्ति के लिए सख्त कानून हैं ।
सरकार को उन दीमको से खतरा नहीं है, खतरा है तो उस विचार से जो परिस्थितियों में साकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
जनपक्षीय लोगों के भाषण, लेखन, कला से देश को खतरा बताकर इनपर यूएपीए की धारा लगा दी जाती है, यहाँ यह सवाल कभी नहीं बनता कि ऐसे जनपक्षीय लोगों के कौन से विचार देश के लिए खतरा है- सच को शीशे की तरह साफ करने वाले विचार,आम व्यक्ति के रोजी- रोटी की समस्या और समाधान को ढूंढने वाले विचार?
देश की समृद्धि के लिए किस विचार की जरूरत है, दिन-हीन दशा को देख आंख बंद करने वाले, दिन-हीन दशा पैदा करने, पालने वाले या उसमें बदलाव के लिए आगे आने वाले।
देश के लिए खतरा क्या है दीमक की तरह चाटा जाना या ईमान के साथ उससे बचाना?
कभी ये सवाल नहीं उठता कि समाज के इन प्रतिष्ठित लोगों के समाज में लोकप्रिय, जन पक्षधर इनके विचार और काम देश के लिए खतरा कैसे है?
हां यह सत्ता के लिए खतरा हो सकती है क्योंकि सत्ता देश नहीं है और सत्ता ऐसी हो सकती है जिनका काम देश के विरुद्ध हो और इन सबकी पहचान समाज में घटित घटनाओं के परिणाम से तो लगाया ही जा सकता है।
अगर सत्ता सही है तो क्यों भ्रष्टाचार है, क्यों बेरोजगारी है, क्यों आए दिन अखबार दिन हीन खबरों से भरा पड़ा रहता है, क्यों व्यापक जनता त्रस्त है , छात्र सड़कों पर आंदोलनों में है, किसान के हाथ कहीं फांसी का फंदा है तो कहीं आंदोलन का झंडा और इन आम त्रस्त लोगों के टैक्स से जमा धन, उनके मेहनत से जमा किए गए धन पर कोई धनाड्य बनकर बैठा है।
क्यों संविधान में धर्मनिरपेक्षता की बात के बावजूद धार्मिक उन्माद हो रहे हैं, हिन्दू मुस्लिम का मतभेदी कीड़ा पल रहा है सत्ता की इन खामियों पर बात करने वाले पर यूएपीए क्यों?
उसके बाद वर्षों वर्ष उनकी पूरी स्वतंत्रता एक कोल कोठरी में बंद क्यों?
जेलों का अगर मुआयना कर लिया जाए तो मालूम हो कि ये कैद के अंदर भी कैद में रखे जाते हैं। बड़े बड़े अपराधी जिन्होंने सच में अपराध किया है, सामान्य वार्ड में सारी सुविधाओं के साथ जीते हैं और ये बुद्धिजीवी लोगों को तन्हा सेल में रखा जाता है। पर ऐसा मुआयना कभी नहीं होगा जो सच को सामने ला सके। हम वाकिफ है क्योंकि रूपेश कुमार सिंह का अनुभव हमारे साथ है। साथी रूपेश पिछले चार वर्षों से सेल में ही है, जहाँ दिमागी राहत के लिए कुछ भी नहीं है, कई कई बार उन्होंने बताया कि संगीत सुने उन्हें कितने समय हो गये है, संगीत प्रेमी रूपेश कई बार सेल में भी संगीत होने की आशा व्यक्त करते हैं ।
साथी रूपेश तो जहाँ केस है और ट्रायल चल रहा है उस जगह पर भी नहीं रखे गये है, बल्कि मनमाने तरीके से दूर भागलपुर के जेल में भेज दिए गए हैं, जहाँ जाने के लिए हमें सोचना पड़ता है।
इस तरह न ही सिर्फ व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित है, बल्कि स्वस्थ रहने का अधिकार से भी वंचित है। इसके बावजूद वे अपने लेखन से बहुत प्यार करते हैं, और सच और न्याय के लिए लड़ने वाले साथियों को याद भी करते रहते हैं।
एक तरफ समाज में किए गए गंभीर अपराध के आरोपी के लिए जमानत आसान है, या जेल में सुविधाएं उपलब्ध है दूसरी तरफ समाज के लिए जीने वाले जनपक्षीय विचार वाले रूपेश जी जैसे लोग न ही सिर्फ लम्बे अरसे तक जमानत की स्वतंत्रता से वंचित रहते हैं बल्कि जेल में भी तन्हा रूप में स्वस्थ रहने के अधिकार से भी वंचित कर दिए जाते हैं, कोई मूलभूत सुविधा मिलती है तो वह काफी संघर्ष का परिणाम होती है।
और इसी के साथ एक और विडंबना है कि जब लम्बे अरसे जेल में रहने के बाद जब दोष मुक्ती होती है तो उसपर अफसोस भरी लम्बी चर्चा भी होती है उसे गंभीर मामला भी माना जाता है,
यदि एक तरफ व्यक्ति चार पांच साल तक भी जमानत का हकदार नहीं होता, तो आखिर क्यों अरसे बाद बरी हुए व्यक्ति के जेल में बीते गई जिंदगी पर बहस की जाती है?
क्या हमारे देश में हमारी न्यायविदों द्वारा और न्याय व्यवस्था देखने- संभालने वालों के द्वारा इस दोहरी व्यवस्था पर कभी विचार किया जाएगा!
और साथी रूपेश कुमार सिंह की लेखनी जनपक्षीय है या देश के लिए खतरा पाठक पढ़कर खुद तय कर सकते हैं।
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