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चार साल तक बीमा दावा लटकाया, फिर किया खारिज; छत्तीसगढ़ सरकार ने ओरिएंटल इंश्योरेंस को तीन साल के लिए किया ब्लैकलिस्ट

भूमकाल समाचार का सवाल: जनता के पैसे से बीमा प्रीमियम चुकाने के बावजूद यदि सरकारी संपत्ति के नुकसान का दावा वर्षों तक अटका रहे और अंत में खारिज कर दिया जाए, तो केवल कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि बीमा राशि की वसूली हो, दावे में हुई देरी और अस्वीकृति के कारण सार्वजनिक किए जाएं तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में सरकारी संपत्तियों के बीमा दावों के साथ ऐसा न हो।

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भाजपा को SIR के 13 करोड़ नामों का इतना सटीक हिसाब कहां से मिला ?

भूमकाल का सीधा सवाल
भाजपा को 13 करोड़ नामों का इतना सटीक श्रेणीवार हिसाब किस दस्तावेज से मिला?
ECI के पास अगर यह पूरा डेटा है तो जनता से क्यों छिपा है?
अगर यह डेटा सभी दलों को दिया गया है तो उसका स्रोत सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
और अगर भाजपा के पास कोई अलग डेटाबेस है, तो चुनाव आयोग बताए कि वह डेटाबेस भाजपा तक कैसे पहुंचा?
13 करोड़ नामों का सवाल सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस का राजनीतिक विवाद नहीं है। यह भारत के मतदाता और उसके मताधिकार के भरोसे का सवाल है।
इसलिए अब सवाल किसी पार्टी से नहीं—सीधे चुनाव आयोग से है:
‘ये आंकड़े आए कहां से?’

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सिंगापुर मॉडल से छत्तीसगढ़ के जंगलों को जोड़ने की तैयारी

सिंगापुर से सीखना अच्छी बात है, लेकिन छत्तीसगढ़ के जंगलों का भविष्य सिंगापुर की नकल से नहीं, बल्कि यहां के जंगल, वन्यजीव और स्थानीय समाज की वास्तविक जरूरतों को केंद्र में रखकर तय होना चाहिए।
इको-टूरिज्म तभी सफल माना जाएगा, जब जंगल भी बचें, स्थानीय समुदाय भी मजबूत हों और पर्यटन की कमाई का बड़ा हिस्सा उसी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में वापस पहुंचे। यह अच्छी बात है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री इस दिशा में गंभीर है ।

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Form-7 से वोट काटने का खेल?

कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बीच Form-7 को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में पहले से भरे हुए Form-7 के जरिए पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने की कोशिश की जा रही है।

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ज्ञानेश कुमार की बेटी के मामले में ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ का आरोप

भूमकाल समाचार की नजर में मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता, रोस्टर व्यवस्था और समान व्यवहार के उस भरोसे का है जिस पर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता टिकी है।

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क्या जल-जंगल-जमीन और आदिवासी अधिकारों के सवाल उठाने वाले आंदोलनों को सुरक्षा कानूनों के सहारे दबाया जा रहा है?
इसका जवाब सरकार को देना चाहिए।
क्योंकि विकास का सवाल अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र में विकास की कीमत यह नहीं हो सकती कि प्रभावित समुदाय से उसकी ग्रामसभा, उसकी आस्था और उसके सवाल पूछने का अधिकार ही छीन लिया जाए।

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वोटर को नागरिकता नहीं, अब वोटर होने का सबूत देना होगा?

जिस सिस्टम ने किसी नागरिक को ‘unmapped’, ‘mismatch’, ‘dead’, ‘shifted’ या ‘duplicate’ के खाने में डाल दिया, क्या उसी सिस्टम की गलती साबित करने का पूरा बोझ भी उसी नागरिक पर होना चाहिए?

लोकतंत्र में मतदाता को सिस्टम पर भरोसा करना चाहिए—या सिस्टम को मतदाता के अधिकार की रक्षा करने के लिए खुद ज्यादा मेहनत करनी चाहिए?

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SIR विवाद में नया मोड़: दो चुनाव आयुक्तों की चिट्ठी, कैबिनेट सचिव और लॉ कमीशन के बीच क्या है कड़ी?

अब सबसे अहम सवाल यही है—
क्या SIR के दौरान दर्ज आपत्तियों और हटाए गए नामों की स्वतंत्र जांच होगी?
और यदि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़े जाते हैं, तो फिर यह भी पूछा जाएगा कि उन्हें पहली बार सूची से बाहर करने की वजह क्या थी?
आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के स्तर पर होने वाली कार्रवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।

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ब्रेकिंग: LIC के MD दिनेश पंत ने लिया VRS, LIC के निवेश और जवाबदेही पर उठे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यही है—देश के करोड़ों पॉलिसीधारकों के पैसे से चलने वाली LIC में निवेश संबंधी फैसलों की जवाबदेही आखिर किसकी है?
LIC के निवेश, जोखिम और सरकार की भूमिका पर पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। क्योंकि यह केवल शेयर बाजार का सवाल नहीं है—यह करोड़ों पॉलिसीधारकों के भरोसे का सवाल है।

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