संपादकीय

देवी बनाकर गुलाम रखने का खेल

जिस समाज ने स्त्री को बराबरी नहीं दी, उसने उसे देवी बनाकर बहलाया—अब संविधान उस बहाने को स्वीकार नहीं करता

भूमकाल समाचार संपादकीय

स्त्री को देवी कहो—लेकिन उसे बराबरी मत दो।

उसे शक्ति कहो—लेकिन संपत्ति में हिस्सा मत दो।

उसे लक्ष्मी कहो—लेकिन आर्थिक फैसलों से बाहर रखो।

उसे गृहलक्ष्मी कहो—लेकिन घर के सारे फैसले पुरुष के हाथ में रखो।

उसे ‘अर्धांगिनी’ कहो—लेकिन उसके जीवन का फैसला खुद करो।

यह भारतीय पितृसत्ता का सबसे सफल मार्केटिंग मॉडल रहा है—पहले स्त्री को देवी बनाओ, फिर इंसान के अधिकार देने से बच जाओ।

और इस खेल को समझने का समय आ गया है।

मनुवादी सामाजिक सोच ने स्त्री को बराबरी का नागरिक नहीं, बल्कि पुरुष-केन्द्रित परिवार व्यवस्था की भूमिका में देखने की कोशिश की। आधुनिक भारत का संविधान इसी सोच के सामने सबसे बड़ा लोकतांत्रिक सवाल बनकर खड़ा हुआ।

क्योंकि संविधान ने कहा—नागरिक बराबर हैं।

यह बात उस व्यवस्था के लिए असुविधाजनक थी जो जन्म, जाति और लिंग के आधार पर सामाजिक हैसियत तय करने की आदी थी।

यहीं से असली टकराव शुरू होता है।

व्रत याद है, अधिकार नहीं?

बहनों को बताया गया—

किस दिन व्रत रखना है।

किस दिन कथा सुननी है।

किस दिशा में पूजा करनी है।

पति की लंबी उम्र के लिए क्या करना है।

लेकिन कितनी बहनों को बचपन में यह बताया गया कि—

पिता की संपत्ति में आपका कानूनी अधिकार क्या है?

घरेलू हिंसा होने पर कानून आपके साथ क्या खड़ा करता है?

काम के बदले समान वेतन का अधिकार क्या है?

विवाह में आपकी सहमति का महत्व क्या है?

तलाक और भरण-पोषण से जुड़े आपके अधिकार क्या हैं?

यही वह जगह है जहां कर्मकांड और नागरिक अधिकारों के बीच का फर्क दिखाई देता है।

कर्मकांड आपको किसी की लंबी उम्र के लिए उपवास करना सिखा सकता है।

संविधान आपको अपने जीवन की गरिमा के लिए आवाज उठाना सिखाता है।

बाबा साहेब की कलम बनाम पितृसत्ता की परंपरा

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्त्री की समानता को सामाजिक न्याय के व्यापक प्रश्न से जोड़ा।

हिंदू कोड बिल के जरिए महिलाओं को संपत्ति, विवाह और पारिवारिक कानूनों में अधिक समानता देने की कोशिश इसी संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

लेकिन इतिहास का यह अध्याय भी बताता है कि महिलाओं की कानूनी बराबरी का रास्ता फूलों से नहीं, विरोध से होकर निकला।

आज जब कोई महिला अपने अधिकार की बात करती है तो उससे पूछा जाता है—

‘हमारी संस्कृति का क्या होगा?’

सवाल यह होना चाहिए—

जिस संस्कृति में बेटी को बराबरी नहीं मिली, उस संस्कृति की समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए?

‘देवी’ का तमगा उतारिए, नागरिक बनिए

स्त्री को देवी कहना सुनने में सम्मानजनक लगता है।

लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ा सम्मान देवी बनाना नहीं है।

बराबर का नागरिक मानना है।

देवी से सवाल नहीं किया जाता।

नागरिक सवाल करती है।

देवी को प्रसाद दिया जाता है।

नागरिक अपने अधिकार मांगती है।

देवी से आज्ञाकारिता की उम्मीद की जाती है।

नागरिक सत्ता से जवाब मांगती है।

और शायद यही कारण है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था को ‘देवी’ सुविधाजनक लगती है, लेकिन सवाल पूछती हुई नागरिक असुविधाजनक।

संघ और मनुवादी राजनीति से असली सवाल

जो राजनीति भारतीय संस्कृति की बात करती है, उससे सवाल होना चाहिए—

भारतीय संस्कृति किसकी संस्कृति है?

क्या उसमें स्त्री की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पुरुष की सत्ता?

क्या उसमें बेटी की संपत्ति का अधिकार भी उतना ही पवित्र है जितना परिवार की ‘इज्जत’?

क्या उसमें महिला की अपनी पसंद से जीवन जीने की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना विवाह और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा?

और अगर संविधान और किसी पुरानी सामाजिक व्यवस्था के बीच टकराव हो, तो लोकतांत्रिक भारत में अंतिम शब्द किसका होगा?

जवाब साफ है—संविधान का।

क्योंकि भारत किसी मनुस्मृति से नहीं, संविधान से चलता है।

अब ‘देवी’ नहीं, सवाल पूछिए

करवा चौथ रखिए या मत रखिए—यह आपकी आस्था है।

तीज मनाइए या मत मनाइए—यह आपका चुनाव है।

पूजा कीजिए या न कीजिए—यह आपकी स्वतंत्रता है।

लेकिन इसके साथ एक काम और कीजिए—

संविधान पढ़िए।

क्योंकि जिस दिन महिला ने अपने अधिकार पढ़ लिए, उस दिन ‘देवी’ कहकर उसे चुप कराना मुश्किल हो जाएगा।

जिस दिन उसने कानून समझ लिया, उस दिन ‘परिवार की इज्जत’ के नाम पर उसके अधिकार छीनना आसान नहीं रहेगा।

और जिस दिन उसने सवाल पूछना शुरू कर दिया—

‘मेरी जिंदगी का फैसला मैं क्यों नहीं कर सकती?’

उस दिन पितृसत्ता की सबसे पुरानी दीवार में दरार पड़ेगी।

इसलिए महिलाओं से हमारी अपील है—

देवी बनने के भ्रम से बाहर आइए।
किसी के चरणों में नहीं, संविधान के सामने अपने अधिकार पहचानिए।
व्रत रखना है तो रखिए, लेकिन अधिकारों पर उपवास मत कीजिए।
कथा सुननी है तो सुनिए, लेकिन अपने इतिहास की कथा भी पढ़िए।
और सबसे जरूरी—जिस व्यवस्था ने आपको सदियों तक बराबरी नहीं दी, उससे सवाल पूछने का साहस रखिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक महिला वह नहीं है जो व्रत नहीं रखती।

सबसे खतरनाक महिला वह है जो संविधान पढ़कर पूछती है—
‘मेरा अधिकार कहाँ है?’

और पितृसत्ता को सबसे ज्यादा डर इसी सवाल से लगता है।

— भूमकाल समाचार

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