दुनिया की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी ब्लैकरॉक (BlackRock) ने अपने 26 बिलियन डॉलर के प्राइवेट क्रेडिट फंड (HLEND) से पैसा निकालने पर पाबंदी लगा दी है। हाल ही में निवेशकों ने लगभग 1.2 बिलियन डॉलर की निकासी की मांग की थी, लेकिन कंपनी ने भारी दबाव के चलते केवल 50% भुगतान ही किया है।
इस कदम ने वैश्विक बाजारों में हड़कंप मचा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि $2 ट्रिलियन का ‘शैडो बैंकिंग’ और प्राइवेट क्रेडिट सेक्टर अब दबाव में है। जब बड़ी संख्या में निवेशक एक साथ अपना पैसा वापस मांगते हैं और फंड के पास पर्याप्त नकदी नहीं होती, तो ऐसी स्थिति पैदा होती है।
मुख्य बिंदु:
निवेशकों ने फंड का 9.3% हिस्सा निकालने की मांग की थी, लेकिन निकासी सीमा (Cap) के कारण उन्हें इंतजार करना पड़ रहा है।
ब्लैकरॉक के इस फैसले के बाद अन्य वित्तीय दिग्गजों जैसे केकेआर (KKR) और ब्लैकस्टोन के शेयरों में भी गिरावट देखी गई।
क्या यह 2008 जैसे किसी बड़े आर्थिक संकट की शुरुआत है? बाजार के जानकार अब लिक्विडिटी (नकदी) की कमी को लेकर सतर्क हो गए हैं।
दुनिया भर के नक्शों पर अपनी 9-Dash Line खींचने वाले चीन के रणनीतिकारों को आज कल नींद नहीं आ रही है। वजह कोई डरावनी फिल्म नहीं बल्कि हिंद महासागर की लहरों पर उठी एक ऐसी गूंज है जिसने बीजिंग के ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल’ की खिड़कियां हिला दी हैं। ईरानी युद्धपोत IRIS Dena का श्रीलंका के पास जलसमाधि लेना,दरअसल चीन की उस सबसे बड़ी दुखी सपने (Nightmare) का सच होना है,जिसे वे प्यार से ‘मलक्का डिलेमा’ कहते हैं।
अदृश्य मेहमान और चीन का ब्लड प्रेशर चीन को लगा था कि हिंद महासागर उनका अपना ‘स्विमिंग पूल’ है,जहाँ वे जब चाहें अपने जासूसी जहाजों को ‘मछली पकड़ने’ के बहाने भेज सकते हैं। लेकिन एक अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी ने बिना नॉक किए जिस तरह ईरानी जहाज को समंदर की गहराई का टूर करा दिया,उसने चीन के रडार सिस्टम की इज्जत पर पानी फेर दिया है। चीन अब सोच रहा है कि अगर ईरान का सबसे आधुनिक युद्धपोत इतनी खामोशी से गायब हो सकता है तो उनके अपने खिलौनेनुमा विमानवाहक पोत क्या सिर्फ परेड में सजाने के लिए रह गए हैं?
2. मलक्का का ‘फांसी का फंदा’ चीन के लिए मलक्का जलडमरूमध्य हमेशा से एक ऐसी गर्दन रही है,जिसे जब चाहो मरोड़ा जा सकता है। अब तक चीन को लगता था कि वे BRI और CPEC के नाम पर सड़कें बनाकर इस फंदे से बच जाएंगे। लेकिन इस हमले ने समझा दिया कि:
तेल का खेल: अगर हिंद महासागर में शिकारी घूम रहे हैं तो चीन के तेल टैंकर वहां से ऐसे गुजरेंगे जैसे कि बिल्ली के सामने से चूहा।
रणनीतिक फेल: अरबों डॉलर खर्च करके बनाए गए पोर्ट और चौकियां धरी की धरी रह गईं,जब असली एक्शन शुरू हुआ।
बीजिंग का नया रोना इस घटना के बाद चीन के सरकारी अखबार (Global Times) संभवतः यह लिखेंगे कि ‘यह शांति के खिलाफ साजिश है।’ लेकिन सच तो यह है कि जो चीन दक्षिण चीन सागर में दूसरों की नावों पर पानी की बौछारें छोड़ता था,आज वह खुद भीग रहा है,खौफ के पसीने से!
निष्कर्ष: कागज का शेर और पानी का फेर अंत में संदेश साफ है। चीन ने सोचा था कि वह दुनिया का नया थानेदार बनेगा,लेकिन हिंद महासागर के गहरे पानी ने बता दिया कि यहाँ का असली डॉन अभी भी वही है जिसके पास साइलेंट पनडुब्बियां हैं। चीन के लिए अब मलक्का का डर कोई किताबी बात नहीं बल्कि एक कड़वी हकीकत है। “जब समंदर में शिकारियों का राज हो तो कागजी कश्तियों को बंदरगाह पर ही रहना चाहिए।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के तुरंत असर साफ दिख रहे हैं।
लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक वहाँ रहते और काम करते हैं। अब वे इस बढ़ते युद्ध के बीच फंस गए हैं। ये लोग सिर्फ़ संख्या नहीं हैं – ये भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का बहुत बड़ा सहारा हैं। इन कामगारों से आने वाली रकम (रेमिटेंस) भारत की कुल रेमिटेंस का कम से कम 38% हिस्सा है। यह पैसा केरल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में लाखों परिवारों के लिए बहुत ज़रूरी है।
पश्चिम एशिया भारत के माल का लगभग 15% खरीदता है। इज़राइल अब भारत को सेंसर, मिसाइल, ड्रोन और एयर डिफेंस हथियार देने वाले बड़े आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन गया है। यूएई, सऊदी अरब और कतर अब भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल एस्टेट और टेक्नोलॉजी में निवेश कर रहे हैं। वहाँ के सॉवरेन वेल्थ फंड बड़े-बड़े भारतीय कंपनियों में हिस्सेदार बन चुके हैं।
नई दिल्ली हमेशा कहती है कि पश्चिम एशिया भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र है। भारत की सुरक्षा सिर्फ़ कांडला या कोच्चि से नहीं, बल्कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य और बाब-एल-मंदब से शुरू होती है।
अब यह पूरा क्षेत्र खतरे में है। अगर खाड़ी में मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़े तो तेल (ब्रेंट) और एलएनजी की कीमतें बहुत तेज़ी से बढ़ेंगी – चाहे जलडमरूमध्य बंद हो या न हो। अभी से जहाज़ों में डर के कारण देरी हो रही है, बीमा और फ्रेट की लागत बढ़ गई है। भारतीय रिफाइनरी को कागज़ पर तो सप्लाई मिलेगी, लेकिन असल में खाड़ी के देश राजनीतिक सुरक्षा देखकर तेल दूसरी जगह भेज सकते हैं। क्रूड से लेकर कंटेनर तक सबके लिए शिपिंग महंगी हो जाएगी। भारतीय हवाई जहाज़ सीधे पश्चिम नहीं जा सकते क्योंकि पाकिस्तान के ऊपर से रास्ता बंद है। हजारों भारतीय यात्री वहाँ के एयरपोर्ट पर फंसे हुए हैं।
दूसरी तरफ के खतरे (जो कम दिखते हैं लेकिन गहरे हैं) • खाड़ी में काम कम होने से नई नौकरियाँ घटेंगी, पुराने कामगारों पर भी दबाव बढ़ेगा। • रेमिटेंस कम होने से गाँवों में खर्च घटेगा, जो पहले से ही मुश्किल में है। राज्य सरकारों को भी नुकसान होगा। • इंजीनियरिंग सामान, प्रोसेस्ड फूड, ज्वेलरी जैसे निर्यात में ऑर्डर रुक सकते हैं या कम हो सकते हैं। • स्टॉक मार्केट में खाड़ी और इज़राइल से आने वाला पैसा कम हुआ तो शेयरों के दाम गिर सकते हैं।
भारत सरकार की प्रतिक्रिया:
हमले की खबर आने के कुछ घंटों में ही विदेश मंत्रालय ने बयान दिया:”भारत ईरान और खाड़ी में हो रही घटनाओं से बहुत चिंतित है। सभी पक्ष संयम बरतें, तनाव न बढ़ाएँ, नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखें। बातचीत से समस्या सुलझाएँ और संप्रभुता का सम्मान करें।”
लेकिन इस बयान में: • न अमेरिका का नाम लिया, न इज़राइल का • हमले को गलत नहीं कहा • ईरान में लड़कियों के स्कूल और घरों पर बमबारी की निंदा नहीं की • खामेनेई की हत्या का ज़िक्र नहीं किया • ट्रंप और नेतन्याहू के ईरान में सरकार बदलने के बयान पर कुछ नहीं कहा
यह रवैया भारत के “ग्लोबल साउथ के लीडर” होने के दावे से मेल नहीं खाता। ईरान अब BRICS का सदस्य है और भारत इस समय BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। फिर भी भारत ने साफ़ तौर पर कुछ नहीं कहा। यह सावधानी नहीं, बल्कि डरपोकपन है।
मोदी सरकार पहले भी ट्रंप के दबाव में ईरान से सस्ता तेल खरीदना बंद कर चुकी है। चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट भी ट्रंप की धमकियों के कारण रुका हुआ है। भारतीय कंपनियों ने 30 साल से खाड़ी देशों के साथ गहरे रिश्ते बनाए हैं। वे यह मानकर चल रही थीं कि भारत सरकार भू-राजनीतिक जोखिम को कम करेगी। लेकिन अब सरकार की नीति जोखिम को और बढ़ा रही है।
यह रणनीतिक स्वतंत्रता नहीं है – यह जोखिम बढ़ाने वाली नीति है।
सवाल यह नहीं है कि भारत अमेरिका या इज़राइल को नाराज़ कर सकता है या नहीं।सवाल यह है कि क्या भारत एक युद्धग्रस्त पश्चिम एशिया का बोझ उठा सकता है…???Sheetal P Singh
जो व्यक्ति यह जानना चाहता है कि डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका अगली बार कब हमला करेगा, उसे पेंटागन के आसपास कितनी पिज़्ज़ा मंगाई जा रही हैं, इस पर नज़र रखनी चाहिए।
दुनिया को कैसे पता चले कि डोनाल्ड ट्रम्प—दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति और ऐसे इंसान जो अपने रास्ते में आने वाले कानूनों, नियमों, मानकों और सीमाओं की परवाह नहीं करते—किसी दुश्मन पर हमला करने की योजना बना रहे हैं?
संयुक्त राष्ट्र तो भूल ही जाइए। ट्रम्प को इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं कि वे अपने हमलों को उस संस्था में वैध ठहराएँ जिसे हम एक तरह का विश्व संसद कह सकते हैं (चाहे उसमें कितनी ही कमियाँ क्यों न हों)। अमेरिकी कांग्रेस से भी सलाह नहीं ली जाती। फिर हमें किस पर भरोसा करना चाहिए कि वह हमें बताए कि कुछ होने वाला है। यह कि अमेरिकी युद्ध मशीन चलने वाली है?
बेशक सैनिकों की हलचल और नौसेना की गतिविधियों की खबरें आई। यह भी विश्वसनीय रिपोर्टें थीं कि अमेरिका, इज़राइल के साथ मिलकर, ईरान पर हमला करने की योजना बना रहा था।
लेकिन जो जानना चाहता है कि हमला कब निकट है, वह “पेंटागन पिज़्ज़ा इंडेक्स” वेबसाइट पर नज़र रखे। जैसा नाम से स्पष्ट है, यहाँ पेंटागन के आसपास पिज़्ज़ा की बिक्री पर नज़र रखी जाती है। सिद्धांत यह है कि जब पिज़्ज़ा की बिक्री अचानक बढ़ जाती है, तो इसका मतलब है कि अमेरिकी रक्षा मुख्यालय के अंदर लोग ओवरटाइम काम कर रहे हैं।
पिज़्ज़ा सिद्धांत नया नहीं है; इसकी जड़ें 1980 के दशक तक जाती हैं। लेकिन ट्रम्प के दौर में यह फिर से प्रासंगिक हो गया है। अधिकांश अमेरिकी राष्ट्रपति हमले से पहले कांग्रेस, संयुक्त राष्ट्र या कम से कम सहयोगी देशों से संपर्क करते थे। ट्रम्प अकेले निर्णय लेते हैं।
और सचमुच: शुक्रवार, 27 फरवरी की दोपहर को पेंटागन के आसपास पिज़्ज़ा की बिक्री बढ़ गई! पिज़्ज़ा इंडेक्स पर अलार्म स्तर 4 तक पहुँच गया, जो आम तौर पर संकेत देता है कि कुछ होने वाला है। कुछ ही घंटों बाद ईरान पर हमला शुरू हो गया।
कुछ समय की युद्ध कार्रवाई के बाद ईरान के मज़हबी नेता अली खामेनेई की मृत्यु हो गई। अन्य कई नेताओं के भी मारे जाने की खबर है। आने वाले घंटों, दिनों और हफ्तों में क्या होगा, इसके बारे में हमें बहुत कम जानकारी है, लेकिन ईरानी शासन डगमगाता हुआ प्रतीत होता है। यह अच्छी बात है।
नॉर्वे में शायद ही कोई ऐसा होगा जो इस कथन से असहमत हो। प्रवासी ईरानी इस बात पर एकमत हैं कि शासन गिरना चाहिए। नॉर्वे की राजनीति में भी वाम से दक्षिण तक व्यापक सहमति है कि ईरानी मज़हबी नेतृत्व क्रूर और विनाशकारी है और उसके पतन पर आँसू बहाने की आवश्यकता नहीं।
फिर भी, हमारे राष्ट्रीय विमर्श में कई लोग वाम दलों को खामेनई समर्थक बताने की कोशिश करते हैं। सप्ताहांत में सोशल मीडिया देखना लगभग हास्यास्पद था। जब तेहरान और मध्य पूर्व के अन्य हिस्सों में बम गिर रहे थे, तब नॉर्वे के कई सोशल मीडिया योद्धा यह दावा करने में लगे थे कि नॉर्वे का वामपंथ इस बात से अवसाद में है कि ईरानी अयातुल्ला की मृत्यु हो गई और उनके लोग संघर्ष कर रहे हैं।
जब ईरान और मध्य पूर्व में सैनिकों और नागरिकों की जान जा रही है, तब नॉर्वेजियन सोशल मीडिया पर “देखो, हमने कहा था” जैसे व्यंग्यात्मक संदेशों की बाढ़ आ गई है, मानो वामपंथ के नायक गिर रहे हों।
शायद यह ट्रोलिंग है। या शायद यह इस बात का उदाहरण है कि एक ही समय में दो विचारों को मन में रखना कितना कठिन हो सकता है।
आइए कोशिश करें: शायद ही कोई होगा जो खामेनेई की नियति पर शोक मना रहा हो। फिर भी कई लोग ईरान पर हमले का जश्न नहीं मना रहे, क्योंकि उन्हें इस बात का डर है कि आगे क्या होगा। सर्वोत्तम स्थिति में, आने वाले दिनों में शासन गिर जाएगा, उसकी जगह बहुलतावादी लोकतांत्रिक व्यवस्था ले लेगी, और ईरान पूरे क्षेत्र में एक उदाहरण बन जाएगा।
लेकिन समस्या यह है कि हम ऐसी चर्चा पहले भी कई बार कर चुके हैं। लगभग ऐसा ही भविष्य 2003 में इराक को दिखाया गया था, जब जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के नेतृत्व में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने देश पर आक्रमण किया था। परिणाम बिल्कुल अलग निकला। इराक अराजकता में डूब गया, और क्रूर शासन के बाद उपजे शून्य को “इस्लामिक स्टेट” जैसे संगठनों ने भर दिया।
उस समय अमेरिका ने ज़मीनी सैनिक भी उतारे थे। इस बार युद्ध संभवतः हवाई हमलों तक सीमित रहेगा। इससे शासन कमजोर हो सकता है, सैन्य क्षमताएँ नष्ट हो सकती हैं—और संभव है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर पाए। यह भी संभव है कि जनता उठ खड़ी हो और देश बेहतर भविष्य की ओर बढ़े। इससे बेहतर कुछ नहीं होगा।
लेकिन 2011 में जब अमेरिका और उसके मित्र देशों (जिनमें नॉर्वे भी शामिल था) ने लीबिया पर बमबारी की थी, तब ऐसा नहीं हुआ। वहाँ भी एक क्रूर शासक की जगह अराजकता और इस्लामी उग्रवाद ने ले ली।
ईरान में ऐसा होना अनिवार्य नहीं है। दिशा सही भी हो सकती है। लेकिन यह याद रखना ज़रूरी है कि “ट्रम्पीय शांति” कैसी दिख सकती है। गाज़ा में अभी समृद्धि नहीं है, भले ही ट्रम्प खुद को शांति का निर्माता बताते हों।
अमेरिका और इज़राइल की एकतरफा कार्रवाई एक खतरनाक मिसाल भी कायम करती है। अभी दो महीने पहले ही ट्रम्प के अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला किया और वहाँ के राष्ट्रपति को पकड़ लिया। वह भी अधिकतर लोगों के लिए अचानक हुआ। और इससे भी कम समय पहले ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को अधिग्रहित करने की धमकी दी थी।
क्या यह सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें हैं, या वह सचमुच वही करते हैं जो कहते हैं? हम कभी निश्चित नहीं हो सकते। अगला निशाना कौन होगा?
हम सब वॉशिंगटन के व्हाइट हाउस में बैठे एक अप्रत्याशित व्यक्ति के मूड पर निर्भर हैं। और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के साथ कदम मिलाने के लिए हमें पेंटागन के बाहर पिज़्ज़ा की बिक्री पर नज़र रखना सीखना होगा।
ईरानी मज़हबी नेतृत्व के संभावित अंत पर आँसू बहाने का कोई कारण नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से उस दुनिया से डरने के कई और भी कारण हैं जो हमारे चारों ओर आकार ले रही है।
आठ अरब देशों के उपर एक साथ हमला करना फिर हमले को जारी रखना फिर कल भी हमला जारी रहा फिर एक देश बच गया ओमान इस लिए बचा उसने कह दिया था। अपने एयर स्पेस को अमरीका या इजरायल के लिए नहीं खोलेगा लेकिन हुआ ए कुछ जहाजों का फ्यूल खत्म हुआ तो उन्हे मजबूरन उतरना पड़ा ओमान में इजरायली विमान थे । हवाई क्षेत्र बंद कर दिया गया था। अब अब्राहम लिंकन के उपर सवार आठ विमान हमले के लिए लौटे अब ईरान ने अब्राहम लिंकन के रनवे को रोक दिया और आपूर्ति लाईन काट दी इन लडा़कू विमानों का इंधन खत्म हो रहा था। इन में से पांच को ओमान में उतारना पड़ा उन्हे परमिशन देनी पड़ी अब ईरान ने उन्हे युद्ध बंदी घोषित कर दिया है। उने संयुक्त राज्य को सौपने से मना कर दिया है। अन्यथा ईरानी मिशाइल तैयार है। देखते हैं इस पर क्या फैसला ओमान लेता है।””
अगर ओमान 5 फाईटर प्लेन को छोड़ता है। तो ईरान उस पर भी हमला करना सुरु कर देगा।
86 साल के इस नेता को बखूबी पता था कि अमेरिकी इंटेलीजेंस एजेंसी CIA उनकी जान के पीछे पड़ी है।
उनका घर एक भूल–भुलैया था। घर के नीचे कई सुरंगें। सभी भूल–भुलैया जैसी। आपस में जुड़ी हुई।
सारे ईरानी अफ़सर या ख़ामेनेई की कैबिनेट के मंत्री तक को आंख में पट्टी बांधकर उन तक पहुंचाया जाता।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी को भी आंख में पट्टी बांधी जाती।
ख़ामेनेई के पर्सनल बॉडीगार्ड IGRC के छंटे हुए लोग थे। इतने आशंकित कि किसी को भी ख़ामेनेई के पास फटकने तक नहीं देते थे।
ख़ामेनेई अपने सीक्रेट बंकर में रहते थे। बीते साल इजरायल से 12 दिन की लड़ाई में भी वह बंकर में ही रहे।
उस बंकर तक कई सुरंगें जाती हैं। ईरान के एक आला अफसर बताते हैं कि उनके बंकर को तोड़ना सिर्फ़ अमेरिका के बूते की ही बात थी।
पिछले जून में CIA ने जाना कि बंकर में जाने के बाद IGRC और ख़ामेनेई कैसे संपर्क करते हैं।
फिर CIA ने कई मॉडल बनाए। हर टनल का हिसाब रखा। 17 जून 2025 को राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा–मुझे मालूम है कि ख़ामेनेई कहां है। वह आसानी से मारा जा सकता है। लेकिन इस बार नहीं।
10 दिन बाद फिर कहा–मैंने ख़ामेनेई को एक विद्रूप मौत से बचा लिया।
8 महीने बाद ख़ामेनेई का बंकर जमीन के और नीचे बनाया गया। इतना नीचे कि अमेरिका भी न तोड़ सके।
लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंज़ूर था।
न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है–ख़ामेनेई को बंकर से निकलना जरूरी था।
इसीलिए, जब मोसाद के खबरी ने बताया कि ख़ामेनेई शनिवार सुबह अपने आर्मी कमांडरों से बैठक करेंगे तो अमेरिका ने कहा–रात का इंतज़ार मत करो। सुबह ही मार डालो।
वह बैठक बंकर में नहीं, ख़ामेनेई के घर में हुई थी। अमेरिका ने टॉमहॉक मिसाइलों में 60 फीट नीचे बंकर बस्टर बम लगाकर भेजा।
जब आप हर पल अमेरिकी उपग्रहों की नज़र में हों तो आंखों पर पट्टी बांधने का कोई फायदा नहीं।
छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार ने तय कर लिया है कि जंगल चाहे वह हसदेव जैसे प्राकृतिक हो या शहरों के आसपास के प्लांटेशन सभी को खत्म करना है. नई राजधानी रायपुर में ग्राम माना और तूता के बीच 100 एकड़ क्षेत्र में फ़िल्म सिटी का निर्माण किया जा रहा है. इस परियोजना के लिए लगभग 2 हज़ार पेड़ो को काटा जा रहा है जिसमे लगभग 200 पेड़ो को काट दिया गया है.
नई राजधानी का निर्माण 41 गाँव की जमीन को अधिग्रहित करके हुआ है जिसमे अभी भी हजारों एकड़ जमीन खाली पड़ी है जिसमे पेड़ नहीं है लेकिन फ़िल्म सिटी का चयन उस जगह पर किया गया जो पहले राजस्व जंगल था और इसे पर्यटन के विकास हेतु छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल को सौंपा गया था.
रायपुर शहर का यदि AQI ईमानदारी से मापा जाए तो देश के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल होगा . PM 2.5 और PM 10 न्यूनतम से कई गुना ज़्यादा होगा. रायपुर शहर एक तरफ़ से 3 बड़े उद्योगिक क्षेत्रों से सिलतरा, उरला और बोरझरा से घिरा हुआ है जहाँ लगभग 70 प्रतिशत उद्योग कोयला आधारित हैं.
दुनिया की सबसे प्रदूषित उद्योगिक इकाई स्पाँज आयरन की लगभग 50-60 इकाई इन उद्योगिक क्षेत्रों में स्थापित हैं जिनका प्रदूषण तबाही मचा के रखा हुआ है . रायपुर शहर के किसी भी घर की छत में सुबह एक काली परत जमा मिलती है . तथाकथित विकास के नाम पर रायपुर शहर के वर्षों पुराने पेड़ो को काट कर कांक्रीट का जंगल बना दिया गया है. अब थोड़े बहुत पेड़ जो आसपास के गाँव में बच्चे हैं उन्हें भी काटने का दौर चल पड़ा है.
इस तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में छत्तीसगढ़ में शायद कुछ भी प्राकृतिक बचा न रहे. आज लगभग सभी नदियाँ गंभीर प्रदूषित हो चुकि हैं, खनन के नाम पर जंगल और पहाड़ गायब होते जा रहे है बस काग़ज़ी आंकड़ों में 44 प्रतिशत जंगल बचा है और वह अन्तिम जंगल काटने तक इतना ही बचा रहेगा.