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श्रीराम मंदिर की दान-लूट और श्रीराम के असली भक्त और उनकी पहचान!

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श्रीराम को उनके राम दरबार से निकाल कर अकेला करना और फिर उनके लिए आए दान को सांगठनिक तरीके से लूटने की बात से राम की मर्यादा तार-तार हो गई है। श्रीराम को अपमानिक करने का कोई भी मौका श्रीराम का अपना कहने वालों ने कभी नहीं छोड़ा। उनके जीवन काल में चाहे कैकेई-मंथरा हो या उनकी प्रजा का कोई धोबी। कैकेई तो माता थी-राम को लंगोटी पहना कर वन भेज दिया। लौटे तो धोबी ने लांछन लगा कर श्रीराम का दाम्पत्य नाश कर दिया। किसी ने श्रीराम को लांछित करके मारा कियी ने वचन की आड़ में उनके जीवन की खाट खड़ी कर दी। यह श्रीराम का निज पुरुषार्थ था कि वे अकलंकित जीवन निकाल लिए और अपनी मर्यादा पर अडिग अचल खड़े रहे। लेकिन उनको कितना सहना पड़ा इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है।

तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में एक मार्मिक प्रसंग का वर्णन किया है जो श्रीराम के भक्तों के चरित्र को समझने में सहायक है। अयोध्या काण्ड का यह प्रसंग बताता है कि श्रीराम का प्रभाव किस प्रकार पड़ भी सकता है और नहीं भी पड़ सकता। जो रामत्व से प्रभावित है वो ही श्रीराम का है जो नहीं प्रभावित है वो रावण का है। भले ही वो अयोध्या का नागरिक हो या लंका का।

श्रीराम जब वन गए तो वहाँ उनसे मिलने कोल किरात आदि वनवासी मिलने आए। अयोध्या काण्ड की 250 वें दोहे के बाद की अर्धाली में चार पाँच चौपाईयाँ इसके लिए देखने की आवश्यकता है। वे अकिंचन वनवासी भी खाली हाथ नहीं आए थे, बल्कि श्रीराम को अर्पित करने के लिए अपनी शक्ति भर जो था लेकर आए थे। यह उनका कुछ ले कर आना सुदामा की पोटली का स्मरण कराता है। उन सब ने श्रीराम से अपनी दीनता और गरीबी का वर्णन किया। अपनी दीनता में भी श्रीराम को कुछ देना नही भूले। श्रीराम को उन का भेट ले आना संकोच में डाल गया। इस बात को समझते हुए उन वनवासियों ने श्रीराम से कहा कि-

यह जियँ जानि सँकोच तजि, करिअ छोह लखि नेहु ।
हमहि कृतारथ करन लगि, फल तृन अंकुर लेहु ॥250॥

यह प्रकरण शबरी प्रकरण के बहुत पहले है। वे श्रीराम को सम्राट नहीं अतिथि मान कर कर उनके स्वागत में प्रस्तुत हैं। और राम को केवल प्रेम ही प्यारा है। वे दान-दक्षिणा-राज्य-मुकुट सब त्याग देते हैं प्रेम स्वीकार करते हैं। ऐसे हाम से वे वनवासी कहते हैं-

तुम प्रिय पाहुने बन पगु धारे । सेवा जोगु न भाग हमारे ।।
देब काह हम तुमहि गोसाँई। ईंधन पात किरात मिताई ।।

तुम लोग वन में पधारे हो, सो हमारे प्यारे पाहुने हो । अतिथि हो। परन्तु हमारे भाग्य तुम्हारी सेवा के योग्य नहीं हैं। हे स्वामी ! हम तुमको क्या दे सकते हैं ? किरातों से मित्रता करके तो जलाने के लिए लकड़ियों और पर्ण कुटी बनाने के लिए पत्तों की प्राप्ति ही हो सकती है।

यह हमारि अति बड़ सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई ।।
हम जड़ जीव जीव गन घाती । कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ।।

हे श्रीराम, हमारी तो तुम सब के प्रति बड़ी सेवा इसी में है कि तुम्हारे कपड़े और बर्तन न चुरा लें क्योंकि हम मूर्ख प्राणी जीवों को मारने वाले, छलिया, कुकर्मी, दुर्बुद्धि और नीच हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि जो लूटमार करने वाले लोग थे वे श्रीराम को न केवल शरण दे रहे हैं बल्कि उनको सुरक्षा का भी वचन दे रहे हैं। राम की भक्ति संरक्षण देने में है किसी को उजाड़ने में नहीं। और उन लोगों ने पूरे चौदह साल श्रीराम को दिए अपने वचन निभाए। उनके पास जो नहीं था वो लूट से हासिल कर सकते थे। सीता के गहने लूट सकते थे और कुछ नहीं तो राम की निश्चिंतता तो अवश्य ही लूटी जा सकती थी। सीता के गहने राम की अंगूठी न उन वनवासियों ने लूट लिए न आगे जब हरण के बाद सीता ने जोगहने विमान से गिराए तब बंदरों ने ही छिपा कर निजी संपदा बना लिया। बंदर तो यह भी नहीं जानते थे कि ये गहने सीता के हैं। वे इतना ही समाज धर्म समझते थे कि ये संपति उनकी नहीं है। यह किसी और की अमानत है। इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं।

एक तरफ वे धनमोह से वंचित अकिंचन वनवासी हैं जो श्रीराम के प्राचीन भक्त भी नहीं लेकिन राम के लिए अपना सब कुछ त्यागने को प्रस्तुत हैं तो दूसरी ओर वे बंदर हैं जो श्रीराम सीता को जानते नहीं लेकिन उन सबके मन में दूसरे के धन या श्रीराम-सीता के धन की लूट का विचार भी नहीं आता। मैं ऐसे वनवासियों में अनसूइया माता को भी रखता हूँ। वे भी सीता को देती ही हैं। ज्ञान भी और मान सम्मान और आभूषण भी।

लेकिन एक ये हैं आज के श्रीराम भगत। इनको देखिए इनमें त्याग की जगह लूट की भावना से वनवासियों बंदरों आदि से तुलना कीजिए। यदि ये जटायु की जगह होते तो सीता को पास अपना सुराग छोड़ने के लिए भी गहना उनके शरीर पर न छोड़ते। ये तो श्रीराम को बंधक बना कर उनको ही लूटने के लिए टूट पड़े हैं। यदि आज श्रीराम सीता इनके वन में होते तो रावण के पहले या श्रीराम को लूट लेते। सीता का अपहरण करते और उनको बंधक बना कर रखते। रक्षा करने के लिए नहीं उनको अपमानित करने का कोई अवसर ये नहीं छोड़ते। मूल बात केवल यह है जो राम का होगा, राम के विचारों का होगा वो राम को अपना सर्वस्व अर्पित करेगा उनको लूटकर अपना घर जेब बैंक कोष-खजाना नहीं भरेगा। केवट ने मजदूरी में सीता की वह सोने की मुंदरी नहीं ली। यहाँ उस वर्ग पर ध्यान रहे कौन राम के लिए छोड़ रहा है और कौन राम को लूट रहा है। कोल-किरात, निषाद, शबरी, जटायु सब अपना जीवन अर्पित कर रहे हैं और रावण और रावण के लोग त्रास दे रहे हैं लूट रहे हैं।

आज वाले श्रीराम भगत रहे होते सीता की वह मुंदरी जो केवट ने नहीं ली सीता की अंगुली काटकर निकाल लेगे, वह चूड़ामणि जो सीता ने हनुमान को अपनी निशानी के रूप में दिया उनके पास बचने ही नहीं देते। यह इनकी सेवकाई और इनका चरित्र और पहचान है।

यहाँ उद्धृत सारी चौपाइयाँ, छंद, और दोहे गीताप्रेस के श्रीरामचरितमानस (गुटका) के इकतीसवें संस्करण के पृष्ठ 363 से लिए हैं।

बोधिसत्व

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