हिट वेव का का शिकार हुआ एफिल टॉवर

राजा राम त्रिपाठी
कल पेरिस-एअरपोर्ट पर.. कदम रखते ही प्रकृति ने रेड कार्पेट नहीं, रेड-अलर्ट से स्वागत किया! लगा कि एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन से पहले ही सूरज देवता ने अपनी अलग काउंटर खोल रखा है, जहां कोई प्रिआरिटी यदि डिप्लोमेटिक पासपोर्ट वाले महाजनों को भी बच निकलने की कोई पतली गली नहीं है। चेहरे पर ऐसा गर्मी का भभूका पड़ा कि क्षणभर को लगा कहीं अपने ‘जगदलपुर-रायपुर’ वाले विमान में ही तो नहीं बैठ गया हूँ! जहां बेचारे घाटा कम करने के लिए पेट्रोल की बचत के लिए प्रायः एसी बंद कर देते हैं और एयरोप्लेन का टीन का डब्बा मानो माइक्रो-ओवन बन जाता है।
बहरहाल मोबाइल खोला तो पता चला कि पूरे पेरिस में अभूतपूर्व ‘हीट-वेव: चल रही
है और शहर “रेड-अलर्ट” पर है। बच्चों के स्कूलों की छुट्टी कर दी गई है। दर्शनीय स्थल भी लगभग बंद।
वही पेरिस, जो कभी संस्कृति, साहित्य, कला और नवजागरण का प्रतीक माना जाता था। वही ठंडा-ठंडा कूल-कूल वाला पेरिस, जहां कभी दुनिया भर के अमीर-उमरा गर्मी की छुट्टियां बिताने आया करते थे। पर आज हालात यह हैं कि शहर स्वयं तंदूर बनने की दिशा में अग्रसर दिखाई दे रहा है।
“एफिल टॉवर” जी हां यह वही है, जिसे आधुनिक दुनिया का “आठवां अजूबा” कहा जाता है। जहां सामान्य दिनों में लाखों पर्यटकों की भीड़ उमड़ती है, वहां कल सचमुच कौए बोल रहे थे। यकीन करिए, यह कोई साहित्यिक अतिशयोक्ति नहीं है, वास्तव में कौए ही बोल रहे थे! दर्जनों प्रवेश द्वार सूने पड़े थे। सुरक्षाकर्मी तैनात थे, पर वे भी आखिर इंसान ही हैं। बेचारे इधर-उधर छांव की तलाश में दुबकते दिखाई दे रहे थे।
अब हम तो खैर किसान ठहरे ऊपर से बस्तरिया। कड़कती धूप, कड़कड़हाटी ठंड और मूसलाधार बारिश को वर्षों से सिर पर झेलने का प्रशिक्षण खेतों ने दिया है, जो आज भी बरकरार है। इसलिए किसी तरह हमने भी यह अग्निपरीक्षा पार कर ही ली।
हाँ, यह अवश्य कहना पड़ेगा कि पेरिस को काफी हद तक हरा-भरा बनाया गया है। शहर के बाहरी इलाकों तक में व्यापक वृक्षारोपण दिखाई देता है। लेकिन लगता है कि प्रकृति अब मनुष्य को और बख्शने के मूड में नहीं है। सदियों तक हमने विकास के नाम पर पृथ्वी के साथ जो निर्मम और मूर्खतापूर्ण व्यवहार किया है, उसका हिसाब-किताब अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है।
पेरिस की यह तपती दोपहर केवल फ्रांस की कहानी नहीं है। यह बस्तर, छत्तीसगढ़, भारत और पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। बस्तर छत्तीसगढ़ की बात जरुरी है क्योंकि यहां स्थिति अभी भी सुधारी जा सकती है, पर लगता नहीं हम ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज या अपने पर्यावरण को लेकर जरा भी गंभीर हैं।
जिस रास्ते पर आधुनिक सभ्यता तेज़ी से दौड़ रही है, वह कहीं न कहीं इससे कई गुना बड़ी त्रासदी को ही निमंत्रण-पत्र भेज रहा है, वह भी फास्टेस्ट -कोरियर से।
प्रकृति का संविधान बहुत कठोर होता है। वहां न वकील चलता है, अपील चलती है, न स्थगन आदेश मिलता है।
सोचिए, यदि “सिटी ऑफ प्लेजर” भी गर्मी से बेदम बेहाल है, तो आने वाली पीढ़ियों के हिस्से में क्या बचने वाला है?
