देश

“सरकारी स्कूल खाली, निजी स्कूल मालामाल! नीति आयोग की रिपोर्ट ने खोले शिक्षा व्यवस्था के कड़वे सच”

7bbbfb74 d4a6 4983 a271 a65f9f8731ce

नई दिल्ली/रायपुर। क्या देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया जा रहा है? क्या सरकारी स्कूलों को बदहाल छोड़कर निजी शिक्षा उद्योग के लिए बाजार तैयार किया जा रहा है? ये सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि नीति आयोग की रिपोर्ट से उभरती तस्वीर खड़ी कर रही है।
रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों से बच्चों का पलायन लगातार बढ़ रहा है और निजी स्कूलों में दाखिले बढ़ रहे हैं। यह केवल अभिभावकों की पसंद का बदलाव नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में लगातार घटते भरोसे का प्रमाण है।


सवाल यह है कि जब हर साल शिक्षा के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तब सरकारी स्कूलों में शिक्षक क्यों नहीं हैं? प्रयोगशालाएं क्यों नहीं हैं? पुस्तकालय क्यों नहीं हैं? बुनियादी सुविधाएं तक क्यों नहीं हैं? और यदि हालात इतने अच्छे हैं, तो मंत्री, विधायक, सांसद और वरिष्ठ अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाते?
सरकारें एक ओर नई शिक्षा नीति, डिजिटल इंडिया और विश्वस्तरीय शिक्षा के दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर हजारों सरकारी स्कूलों का विलय, युक्तियुक्तकरण और बंदी जारी है। दूर-दराज़, आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में इसका सबसे अधिक असर उन बच्चों पर पड़ रहा है जिनके पास निजी स्कूलों तक पहुंचने का कोई विकल्प ही नहीं है।
नतीजा यह है कि गरीब परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा निजी स्कूलों की फीस, परिवहन और किताबों पर खर्च करने को मजबूर हैं। शिक्षा अब अधिकार कम और कारोबार अधिक दिखाई देने लगी है। जिस शिक्षा को संविधान ने समान अवसर का माध्यम माना था, वह धीरे-धीरे आर्थिक हैसियत पर निर्भर होती जा रही है।

thumbnail 184ee2ce 17bf 40e9 880d 164b19a1bc98


सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी स्कूलों को मजबूत करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति आखिर क्यों दिखाई नहीं देती? क्या सरकारें सचमुच सार्वजनिक शिक्षा को बेहतर बनाना चाहती हैं, या फिर शिक्षा को धीरे-धीरे निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया चल रही है?


छत्तीसगढ़ भी इस बहस से अलग नहीं है। यहां भी अनेक सरकारी स्कूल शिक्षकों की कमी, संसाधनों के अभाव और घटते नामांकन से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर निजी स्कूलों का विस्तार लगातार जारी है। ऐसे में यह सवाल और तीखा हो जाता है कि क्या सरकारी शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर कमजोर होने दिया जा रहा है?


नीति आयोग की रिपोर्ट केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर आरोप-पत्र जैसी प्रतीत होती है। यदि सरकारें वास्तव में शिक्षा को अधिकार मानती हैं, तो उन्हें विज्ञापनों से नहीं, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता से जवाब देना होगा। क्योंकि जिस दिन आम नागरिक का भरोसा सरकारी स्कूलों से पूरी तरह उठ जाएगा, उसी दिन समान शिक्षा का संवैधानिक सपना भी दम तोड़ देगा।
सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है क्या सरकार सरकारी स्कूल बचाना चाहती है, या सिर्फ निजी शिक्षा के लिए रास्ता साफ करना चाहती है?

शुभांकर शुक्ला की रिपोर्ट

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *