टूटते बिखरते आरण्यक के संघर्ष की एक विरल गाथा ।
पुस्तक विमर्श : रमेश अनुपम के फेसबुक वॉल से साभार

।। ’कटकोना’ : संजय अलंग
के बहाने टूटते _बिखरते आरण्यक के संघर्ष की एक विरल गाथा ।।
” उसने मुड़कर हसदो आरण्य की ओर देखा वह विशाल वन क्षेत्र जो सदियों से एक फेफड़े की तरह सांस ले रहा था अब टुकड़ों में बंट रहा था । उसे अहसास हुआ जिसे वे विकास कह रहे थे वह दरअसल एक बड़े विध्वंस की तैयारी थी । विकास की सड़कों पर चलकर जो मशीनें आ रही थीं वे सिर्फ कोयला निकालने नहीं बल्कि हसदो की रूह को कुरेदने आ रही थीं । 1974 का वह दौर तो सिर्फ एक शुरुआत थी भविष्य के गर्भ में हसदो के उन हजारों पेड़ों का कटना और हाथियों के बेघर होकर गलियों में भटकना पहले से ही लिखा जा चुका था। ” ( इसी कहानी से )
संजय अलंग की यह कहानी ’कटकोना’ अभी हाल में लिखी गई कहानी है जिसे वेब मैगज़ीन ’समालोचन’ में कल ही प्रकाशित की गई है, अर्थात वर्ष 2026 , 26 अप्रैल के दिन यह कहानी पाठकों के सामने आई है।
छत्तीसगढ़ राज्य के हसदो आरण्यक को बचाने के लिए विगत दस वर्षों से राज्य के नागरिक आंदोलन कर रहे हैं। नए नए कोल ब्लॉक के आबंटन से लगभग एक लाख सत्तर हजार हेक्टेयर भूभाग में फैले हुए सरगुजा संभाग के इस आरण्यक का अस्तित्व एक तरह से खतरे में है। एक अनुमान के अनुसार हसदो आरण्यक में चार लाख पेड़ काटे जाएंगे तथा दस हजार आदिवासी बेघर हो जाएंगे । सैकड़ों हाथियों को जंगल छोड़कर गलियों में भटकना होगा । जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध इस आरण्यक में लगभग 82 दुर्लभ प्रजाति की पक्षियों और विभिन्न प्रजातियों की तितलियाँ का बसेरा उजड़ जाएगा । 167 प्रजाति की दुर्लभ वनस्पतियां भी जो इसी आरण्यक में पाईं जाती हैं लुप्त हो जाएंगी ।
अब इस उद्धरण के साथ ऊपर उल्लेखित कहानी के अंश को पढ़िए जो सन 1974 के देश काल को इंगित करने वाली तथा आज से इनकावन वर्ष पहले की चेतावनी की याद दिलाती है ।
यह भी कि जिसे विकास कहा जा रहा था वह एक बड़े विध्वंश की तैयारी थी । यह भी कि 1974 का वह दौर तो एक शुरुआत थी । भविष्य के गर्भ में हसदो के उन हजारों पेड़ों का कटना और हाथियों के बेघर होकर गलियों में भटकना पहले से ही लिखा जा चुका था ।
संजय अलंग की यह कहानी ’कटकोना’ हसदो जैसे आरण्यक को नष्ट किए जाने भर की कहानी नहीं है , अपितु यह आदिवासी जनजीवन और प्रकृति को भी नष्ट कर दिए जाने की दास्तान को एक अलग और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने वाली एक महान कहानी है।
संजय अलंग जिस तरह से इस कहानी के नायक गुलशन कपूर के माध्यम से इस आरण्यक की कथा कहते हैं वह एक तरह से हसदो और इसी तरह के आरण्यक के संकट तथा संघर्ष की ही विरल गाथा है ।
यह कहानी कोयला खदानों के बहाने जंगल, पहाड़, वन्य जीवों और आदिवासियों के उजड़ने की कहानी भर नहीं है । यह चमाठ पहाड़ में छिपे हुए अनमोल खनिज को लेकर पूंजीपतियों और सत्तासीन लोगों की भी कहानी है।
यह कहानी एक साथ
आदिवासियों से जुड़े हुए अनेक गंभीर मुद्दों की ओर भी हमारा ध्यान खींचती है ।
जिन तथ्यों और प्रसंगों को लेकर संजय अलंग इस कहानी का ताना _बाना बुनते हैं, वह इन संघर्षों से बिना एकाकार हुए संभव नहीं है। इस आरण्यक और आदिवासी जनजीवन में आपदमस्तक डूबे बिना मुमकिन नहीं है। तो क्या लेखक इस संघर्ष में मन प्राण से उनके सहभागी भी हैं ?
इस छोटी सी कहानी को पढ़ते हुए न जाने मैं क्यों ’ग्लोबल गांव का देवता’ ( रणेंद्र ), ’मरंग गौडा नीलकंठ हुआ’ ( महुवा माजी ) जैसे आदिवासी जनजीवन को केंद्र में रख कर लिखे गए इन महान उपन्यासों में कहीं खो सा गया था। तो क्या संजय अलंग की यह छोटी सी कहानी ’कटकोना’ भी इन उपन्यासों की तरह प्रभावशाली तथा वर्षों तक याद रखी जाने वाली एक बड़ी और रेखांकित की जाने वाली कहानी है ?
मैं कहूंगा
’कटकोना’ एक गंभीर विषय पर लिखी गई एक ईमानदार कहानी है , जिसे मैं हिंदी कहानी की एक उपलब्धि के रूप में देखना पसंद करूंगा ।
इस कहानी की अंतर्वस्तु जितनी प्रभावित करती है उतनी ही इसकी शैली और भाषा भी कमाल करती हुई नजर आती हैं। भाषा में काव्यात्मकता ही नहीं, काव्यबिंब भी चकित करते हैं। इतनी माधुर्य युक्त लयात्मक भाषा हिंदी कहानी में दुर्लभ है। प्रकृति का इतना मनमोहक चितेरा और प्रकृति के प्रति इस हद तक आसक्त इस लेखक की कहानी को पढ़ना एक सुंदर आरण्यक में खो जाना है , जिसे बचाने की भरपूर चिंता भी इस लेखक को कम नहीं है। इस कहानी के नायक गुलशन कपूर और संजय अलंग को भी अलग _अलग कर देख पाना संभव नहीं है ।
अगर आप एक खूबसूरत और बेहद मानीखेज कहानी पढ़ने में गंभीर रुचि रखते हैं और आप शानदार शिल्प तथा काव्यात्मक भाषा में रसी_ बसी कहानी को पढ़ना नहीं जीना चाहते हैं तो निश्चित रूप से इस कहानी को आपको जरूर पढ़नी चाहिए ।
अगर आप हसदो और इसी तरह के आरण्यक को आने वाली पीढ़ी के लिए महफूज रखना चाहते हैं,
इसके लिए संघर्षरत लोगों के संघर्ष में अपनी पूरी मानवीय संवेदना के साथ शामिल होना चाहते हैं , आदिवासियों, वन्य पशुओं , पक्षियों ,तितलियों और विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के पेड़_ पौधों को संरक्षित किए जाने के पक्ष में है तो आपको यह कहानी किसी भी हालत में अवश्य पढ़नी चाहिए।
इस कहानी में कई ऐसे दृश्य और प्रसंग हैं जो आपको चैन से जीने नहीं देंगे , जब _तब आपको परेशान करते रहेंगे । हर अच्छी कविता , कहानी ,नाटक ,उपन्यास यह जरूर करते हैं।
चलिए इस कहानी से एक और उद्धरण की चर्चा करते हैं और इसके साथ ही इस आशा के साथ आपसे विदा लेते हैं कि आप इस कहानी को जरूर पढ़ेंगे और साथ ही इस सुंदर पृथ्वी को अपनी तई बचाने की चिंता भी करेंगे ।
”वहां जब खदान की पहली मिट्टी खोदी गई तो वह सिर्फ मिट्टी नहीं थी वह एक पुराने समय का बाहर आना था और एक नए समय का भीतर जाना था । ” ( इसी कहानी से )
