नकटी में गरीबों की झोपड़ियां उजाड़ने के बाद अब अरपा घोटाले की जांच पर सवाल: कलेक्टर कीर्ति मान सिंह राठौर फिर चर्चा में

रायपुर। नकटी विस्थापन के मामले में प्रशासन की ओर से प्रमुख भूमिका निभाने वाले कीर्ति मान सिंह राठौड़ के पूर्व कार्यकाल में हुए कई घोटाले के मामले फिर से चर्चा में आ गए हैं । अरपा भैंसाझार परियोजना के कथित मुआवजा घोटाले को लेकर एक बार फिर प्रशासन और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सोशल मीडिया और विभिन्न जनसंगठनों द्वारा आरोप लगाया जा रहा है कि इस प्रकरण में तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका होने के बावजूद अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी है।

मामले को लेकर प्रकाशित समाचारों के अनुसार, राज्य शासन ने तत्कालीन अधिकारी एवं वर्तमान रायपुर अपर कलेक्टर कीर्तिमान सिंह राठौर के विरुद्ध आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) को जांच की अनुमति दी थी। आरोप है कि परियोजना में मुआवजा वितरण के दौरान गंभीर अनियमितताएं हुईं, जिनमें कई अधिकारियों की भूमिका की जांच आवश्यक मानी गई थी।
इसी बीच नकटी क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर भी राठौर की भूमिका पर सामाजिक संगठनों और प्रभावित ग्रामीणों द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान गरीब परिवारों के घर उजाड़े गए, जिससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारी की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
इधर नकटी मैं हुए तोड़फोड़ को लेकर स्वयं अपनी सरकार के रवैया से नाराज सांसद बृजमोहन अग्रवाल के बयान से भी प्रतिमान सिंह राठौड़ काफी दिक्कत में आ गए हैं । सांसद बृजमोहन ने कहा कि नकटी गाँव में गरीबो के घरों में तोड़फोड़ की गई वह किसी भी हालत में माफ करने लायक नहीं है। रात के अंधेरे में इस तरह की कार्रवाई करना गलत है। जिन अधिकारियों ने यह दुस्साहस किया है, उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
आलोचकों का कहना है कि EOW और ACB जैसी जांच एजेंसियां निचले स्तर के कर्मचारियों—जैसे पटवारी और राजस्व निरीक्षकों—तक तो कार्रवाई सीमित रखती हैं, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के मामलों में जांच अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ती। इसी कारण अब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि शासन द्वारा जांच की अनुमति दिए जाने के बाद भी मामले में अंतिम कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि जांच की अनुमति दी गई थी, तो उसकी वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए सरकार एवं जांच एजेंसियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जांच किस चरण में है और यदि देरी हुई है तो उसके कारण क्या हैं।
भूमकाल समाचार का पक्ष: अरपा भैंसाझार मुआवजा प्रकरण और नकटी विस्थापन जैसे मामलों में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। इनकी निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही के लिए आवश्यक है। यदि किसी अधिकारी पर आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं, तो उन्हें भी निष्पक्ष जांच के माध्यम से अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। वहीं, यदि जांच लंबित है, तो उसकी प्रगति और परिणाम सार्वजनिक करना शासन एवं जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
कमल शुक्ला, संपादक भूमकाल समाचार
