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पीएम आवास पर आमने-सामने बघेल और विजय शर्मा—आंकड़ों से गरमाई बहस

सत्ता और विपक्ष के दो प्रमुख चेहरे पहली बार एक मंच पर, करीब सवा घंटे चली सीधी बहस; स्वीकृति, निर्माण, पोर्टल और केंद्र की राशि पर भिड़े तर्क

राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बीच संवाद की नई मिसाल, बड़ी संख्या में पत्रकार पहुंचे प्रेस क्लब

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में मंगलवार को एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने राजनीतिक बहस की परंपरा को एक नई दिशा दी। प्रधानमंत्री आवास योजना के मुद्दे पर उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत मंत्री विजय शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री एवं विपक्ष के प्रमुख नेता भूपेश बघेल पहली बार एक ही मंच पर आमने-सामने बैठे और करीब सवा घंटे तक आंकड़ों, नीतियों और अपने-अपने कार्यकाल के दावों पर सीधी बहस की।

रायपुर प्रेस क्लब में हुई इस खुली बहस में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के दावों पर सवाल उठाए, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह रही कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दोनों ने सार्वजनिक मंच पर अपने तर्क रखने का अवसर स्वीकार किया। यही इस कार्यक्रम को सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से अलग बनाता है।

भूपेश बघेल का तर्क : स्वीकृति और पोर्टल का सवाल

भूपेश बघेल ने बहस में प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए 2011 की जनगणना को आधार बताते हुए कहा कि राज्य में बड़ी संख्या में आवासों की जरूरत थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में लगभग 6.97 लाख आवास स्वीकृत किए जाने का दावा किया।

बघेल ने 2018 में 3 लाख 48 हजार 960 आवास स्वीकृत होने तथा इनमें से करीब 1 लाख 39 हजार के पूर्ण होने का आंकड़ा रखा। 2020-21 के लिए उन्होंने 1 लाख 97 हजार 811 आवासों के लक्ष्य और करीब 1 लाख 22 हजार आवास पूर्ण होने की बात कही।

उनका मुख्य तर्क था कि कोरोना काल और आर्थिक परिस्थितियों के साथ-साथ 2022-23 में पीएम आवास का पोर्टल बंद होने के कारण योजना प्रभावित हुई। उन्होंने केंद्र से राशि मांगे जाने का भी मुद्दा उठाया।

बघेल ने आगे विभिन्न चरणों में हुई नई स्वीकृतियों का हवाला देते हुए कहा कि बाद की स्वीकृतियों को जोड़ने पर आंकड़ा काफी बड़ा हो जाता है। उनके अनुसार 18 लाख की शुरुआती स्वीकृति के बाद अलग-अलग चरणों में नई स्वीकृतियां मिलीं और कुल स्वीकृतियों का आंकड़ा 46 लाख तक पहुंचता है।

विजय शर्मा का जवाब : ‘गणना सही करिए’

उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बघेल के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्वीकृत आवास, लक्ष्य और वास्तव में पूर्ण हुए आवास को एक साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उनका जोर इस बात पर था कि प्रधानमंत्री आवास के आंकड़ों की सही श्रेणी और अवधि के साथ गणना की जाए।

शर्मा ने दावा किया कि कांग्रेस सरकार के पांच साल के कार्यकाल में करीब 3 लाख आवास ही पूर्ण हुए, जबकि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में लगभग 16 हजार करोड़ रुपये आवास निर्माण पर खर्च किए जा चुके हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि वर्तमान सरकार के दौरान 11 लाख 75 हजार आवास पूरे हो चुके हैं और वित्तीय वर्ष 2025-26 में छत्तीसगढ़ ने देश में सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री आवास बनाए।

शर्मा ने यह भी कहा कि केंद्र से लगातार राशि आती रही और पोर्टल बंद होने को योजना रुकने का मुख्य कारण बताना सही नहीं है। उन्होंने पिछली सरकार पर गरीबों के आवास रोकने का आरोप लगाया और कहा कि भाजपा सरकार ने 18 लाख आवास बनाने का संकल्प लिया है।

सबसे बड़ा टकराव : पोर्टल बंद था या नहीं?

बहस का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु प्रधानमंत्री आवास के पोर्टल और केंद्र से मिलने वाली राशि को लेकर रहा।

भूपेश बघेल का कहना था कि पोर्टल बंद होने से स्वीकृत आवासों की प्रक्रिया और भुगतान प्रभावित हुआ तथा राज्य को केंद्र से अपनी राशि के लिए पत्राचार करना पड़ा।

वहीं विजय शर्मा ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा कि पोर्टल बंद नहीं था और कोरोना काल में भी केंद्र से राशि आती रही। इस मुद्दे पर दोनों नेता अपने-अपने दावों पर कायम रहे।

7.81 लाख आवास का सवाल भी उठा

विजय शर्मा ने बहस में केंद्र से मिले 7.81 लाख आवासों का मुद्दा भी उठाया। उनका दावा था कि इनमें से लगभग 81 हजार आवास ही बन पाए और शेष आवासों को दूसरी योजना में स्थानांतरित करने की स्थिति बनी। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को पिछली सरकार के दौरान आवास निर्माण की धीमी गति से जोड़ा।

बहस का निष्कर्ष क्या रहा?

इस बहस में ऐसा कोई सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं निकला कि प्रधानमंत्री आवास के आंकड़ों पर एक पक्ष का दावा पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया हो। बल्कि बहस ने यह साफ कर दिया कि ‘स्वीकृत’, ‘लक्षित’, ‘स्वीकृत होकर निर्माणाधीन’ और ‘पूर्ण’ आवासों के आंकड़ों को अलग-अलग रखकर ही वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।

दोनों नेताओं ने अपने-अपने कार्यकाल और केंद्र-राज्य संबंधों के आधार पर आंकड़े रखे। विवाद का मूल प्रश्न यही रहा कि किस अवधि में कितने आवास वास्तव में स्वीकृत हुए, कितने पूरे हुए, केंद्र से कितनी राशि आई और कितने हितग्राहियों को वास्तविक लाभ मिला।

जीत किसी की हो, लोकतंत्र का मंच मजबूत हुआ

राजनीतिक बहस का अंतिम फैसला जनता और उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों के आंकड़े करेंगे। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम की सबसे सकारात्मक उपलब्धि यह रही कि सत्ता और विपक्ष के दो प्रमुख नेता एक ही मंच पर बैठकर एक-दूसरे से सीधे सवाल-जवाब करने को तैयार हुए।

लोकतंत्र में हर बहस का उद्देश्य जरूरी नहीं कि सामने वाले को पराजित करना हो। कई बार बहस का महत्व इस बात में होता है कि जनता के सामने दोनों पक्षों के तर्क एक साथ आ जाएं और फैसला जनता स्वयं करे।

रायपुर प्रेस क्लब में पत्रकारों की बड़ी मौजूदगी और सीमित जगह के कारण बाहर तक खड़े पत्रकारों की तस्वीर ने भी इस बहस में मीडिया और सार्वजनिक संवाद की भूमिका को रेखांकित किया।

प्रधानमंत्री आवास योजना पर हुई यह बहस इसलिए याद रखी जाएगी कि इसमें राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बीच संवाद का रास्ता बंद नहीं हुआ। छत्तीसगढ़ की लोकतांत्रिक राजनीति में ऐसे सार्वजनिक, तथ्य-आधारित और आमने-सामने के संवाद जितने बढ़ेंगे, सत्ता और विपक्ष दोनों की जवाबदेही उतनी ही मजबूत होगी।

लोकतंत्र की नई मिसाल: जब एक ही मंच पर नीति और नीयत पर सामने आए सत्ता और विपक्ष

​छत्तीसगढ़ की राजनीति ने हाल ही में भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक अभूतपूर्व और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे जनहित के संवेदनशील मुद्दे पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं विपक्ष के नेता भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री, गृह व पंचायत मंत्री विजय शर्मा एक ही मंच पर खुलकर आमने-सामने आए। विचारों की इस सीधी जंग में दोनों नेताओं ने तीखे तर्कों, आंकड़ों और संसदीय मर्यादा के साथ अपनी बात रखी।

​राजनीतिक परिदृश्य में अक्सर दूरियां और मतभेद ही सुर्खियां बनते हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक परिचर्चा ने यह साबित कर दिया कि जन सरोकार के मुद्दों पर संवाद के दरवाजे कभी बंद नहीं होने चाहिए। यह आयोजन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ‘ऑक्सीकारक’ (नवऊर्जा देने वाला) सिद्ध हुआ, जिसने राजनीतिक विमर्श को एक नई ऊंचाई दी।

  • ऐतिहासिक पहल: संभवतः यह देश के राजनीतिक इतिहास में पहला मौका था जब सत्ता और विपक्ष के शीर्ष चेहरे किसी जन-कल्याणकारी योजना पर सार्वजनिक मंच पर तार्किक बहस के लिए एक साथ बैठे।

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