साहित्य

हां, हम हार गए

हां, हम हार गए
फिलहाल तो हम हार गए
जैसे हारे थे स्पार्ट्कस
जैसे हारे थे पेरिस कम्यून के कामरेड्स
जैसे हारे थे सैको-वैनजेटी
जैसे हारे थे नक्सलबाड़ी के नक्सली
हां, हम हार गए

लेकिन तुम भी कहां जीते
आज भी कैद रहते हो अपने दुर्ग सरीखे घरों में
जहां पक्षी भी बंदूकों से साये से डरकर
बिना रुके आगे निकल जाते हैं
वे जानते हैं
यहां न दाना मिलेगा और न पानी

बिना सड़क सूनी किए
और बिना इजरायली हथियारों के
तुम सड़कों पर कब निकल पाते हो?
अगर बिल्ली भी तुम्हारा रास्ता काटे
तो वह भी कुचल दी जाती है
बेरहमी से

तुमसे तो आसपास के पेड़ भी सहमे रहते हैं
कि न जाने कब उनकी बढ़ती लंबाई को
संभावित खतरा समझ लिया जाय
और डर से उनका क़त्ल कर दिया जाय

यह पहली बार है शायद
कि अब तो तुम कलम से भी डर जाते हो

लेकिन तुम्हारा यह डर अकारण नहीं है
तुम्हे पता है
हम हारते जरूर हैं
लेकिन मरते नहीं

हम लेते हैं जन्म बार बार
हर बार
किसी रक्तबीज की तरह
फीनिक्स पक्षी की तरह

स्पार्ट्कस हारा जरूर था
लेकिन मरा नहीं
वह फिर फिर पैदा हुआ
और पिछली बार तो पैदा हुआ था
हमारा भगत सिंह बनकर

और इस तरह हर बार हम तुम्हे तुम्हारे डर के खोल में
भीतर
और भीतर धकेल देते हैं

और इस तरह
हम हार कर भी जीत जाते हैं
हर बार
और तुम जीत कर भी हार जाते हो
हर बार

लेकिन इस बार हम इस खेल को हमेशा के लिए खत्म कर देंगे

हमारी धरती अब अपने बच्चों का रक्त और नहीं सोख सकती
बच्चों की कब्र के लिए
धरती पर अब और जगह नहीं बची है
एक इंच भी नहीं

इसलिए,
इस बार हम आयेंगे
लाखों करोड़ों की संख्या में
तूफान बनकर
अंतिम युद्ध के लिए

तुम्हे तुम्हारे डर से हमेशा के लिए मुक्त करने

ताकि हमें भी न लेना पड़े जन्म बार बार

और आने वाली पीढ़ी
जी सके उतनी ही सहजता और स्वतंत्रता से
जैसे धरती पर बहती है कलकल करती नदी
बिना किसी बाँध के

जैसे चहचहाते हैं पंछी
बिना किसी डर के

जैसे खिलखिलाता है बच्चा
बिना किसी खौफ के…….

(क्रांतिकारी शहीद भूमैया और किस्ता गौड़ पर लिखे वरवर रॉव के संस्मरण से प्रभावित होकर)

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