बांध मंत्री की दूरदृष्टि… आज भी दे रही है छत्तीसगढ़ को पानी
गोकुल सोनी
साथियो, इस वर्ष हमारे प्रदेश में अच्छी बारिश हो रही है। नदी-नाले उफान पर हैं और प्रदेश के अधिकांश बांध पानी से लबालब भर गए हैं। ऐसे समय में पानी से भरी कोई तस्वीर केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं दिखाती, बल्कि हमें उन लोगों की दूरदृष्टि की भी याद दिलाती है, जिन्होंने वर्षों पहले जल-संरक्षण और सिंचाई के लिए इन बांधों की नींव रखी थी।
तस्वीर गरियाबंद जिले के पांडुका में पैरी नदी पर बने पैरी बराज की है। आज जब इसे पानी से भरा देखते हैं तो शायद ही कोई सोचता होगा कि इसकी कहानी पांच दशक से भी ज्यादा पुरानी है।
पैरी सिंचाई परियोजना के अंतर्गत तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल जी ने 23 अप्रैल 1971 को इसका शिलान्यास किया था और वर्ष 1976 में यह बनकर तैयार हुआ।
श्यामाचरण शुक्ल जी को उस दौर में प्रदेश में बड़े पैमाने पर बांध और सिंचाई परियोजनाएं शुरू कराने के कारण लोग प्यार से “बांध मंत्री” के नाम से भी पुकारते थे। यह नाम केवल एक उपनाम नहीं था, बल्कि उनकी उस सोच और दूरदृष्टि का परिचायक था, जिसमें उन्होंने समझ लिया था कि पानी को बचाना और उसका सही उपयोग करना ही आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है।
उनकी इसी दूरदृष्टि की बड़ी मिसाल है गंगरेल बांध। आज जिसे हम रविशंकर सागर जलाशय के नाम से जानते हैं, वह भी उन्हीं की परिकल्पना का परिणाम था।
जरा सोचिए, जिस पानी को हम आज सहजता से अपने घरों की नलों में आते हुए देखते हैं, उसके पीछे कितने वर्षों की योजना, मेहनत और दूरदृष्टि छिपी हुई है।
रायपुर शहर की पेयजल व्यवस्था में गंगरेल का महत्वपूर्ण योगदान है। वहीं भिलाई के विशाल औद्योगिक संयंत्रों के लिए भी गंगरेल से पानी पहुंचता है। यानी यह बांध केवल खेतों की सिंचाई के लिए नहीं, बल्कि कृषि, उद्योग और शहरों के जीवन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।
दरअसल, बांध केवल कंक्रीट और पत्थरों से बनी कोई दीवार नहीं होता।
बांध बारिश के पानी को भविष्य के लिए सहेजने का एक बड़ा माध्यम है।
बारिश के दिनों में यही पानी जलाशयों में जमा होता है और फिर जरूरत के समय खेतों की सिंचाई, शहरों की पेयजल व्यवस्था और उद्योगों की जरूरत पूरी करता है। सूखे या कम बारिश वाले समय में यही संचित पानी किसी क्षेत्र के लिए जीवनरेखा बन जाता है।
आज हम जब भरे हुए बांधों को देखकर खुश होते हैं तो हमें उन लोगों को भी याद करना चाहिए, जिन्होंने आज से 50-55 वर्ष पहले आने वाले समय की जरूरतों को समझते हुए इन परियोजनाओं की कल्पना की थी।
आज की बारिश का पानी कल की जिंदगी बने—शायद यही इन बांधों का सबसे बड़ा महत्व है। पैरी बराज की यह तस्वीर देखकर मन में एक सवाल भी उठता है। हमारे प्रदेश में ऐसे कितने बांध और जलाशय हैं, जिनके पीछे हमारे इतिहास, हमारे नेताओं और हमारे इंजीनियरों की ऐसी ही कोई रोचक कहानी छिपी हुई है ?
अगर आपको इनके बारे में जानकारी है तो जरूर साझा कीजिए। हमारी पुरानी पीढ़ी की ये जल-यात्राएं आने वाली पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए।
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