छत्तीसगढ़

वन शहीद दिवस: 1985 से अब तक 36 वनकर्मियों ने दी जान, शहीद परिवारों से जुड़े रहने पर जोर

रायपुर में 22वां वन शहीद दिवस आयोजित, शहीदों की स्मृति में स्मारिका का विमोचन

रायपुर, 11 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ में वनों और वन्यजीवों की रक्षा करते हुए प्राण गंवाने वाले वनकर्मियों की स्मृति में शुक्रवार को रायपुर के राजीव स्मृति वन में 22वां वन शहीद दिवस मनाया गया। कार्यक्रम में वन विभाग और शासन की ओर से प्रदेश के अमर वन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

कार्यक्रम में बताया गया कि 1985 में जशपुर के वनरक्षक स्वर्गीय बुधराम भगत की शहादत से लेकर वर्ष 2025 में कांकेर के वनपाल स्वर्गीय नारायण सिंह यादव तक कुल 36 वनकर्मी कर्तव्य निर्वहन के दौरान अपनी जान गंवा चुके हैं। इनमें वनरक्षक, वनपाल और अन्य मैदानी वनकर्मी शामिल हैं, जो जंगलों में वन तस्करों, वन्यजीवों के हमलों और नक्सली हिंसा जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच वन सुरक्षा का दायित्व निभाते रहे।

खेजड़ली के बलिदान की स्मृति में मनाया जाता है दिवस

11 सितंबर को देशभर में वन शहीद दिवस मनाया जाता है। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1730 के खेजड़ली बलिदान से जुड़ी है, जब राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के खेजड़ली गांव में पेड़ों की रक्षा के लिए अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।

भारत सरकार ने वर्ष 2013 में अधिसूचना जारी कर 11 सितंबर को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस घोषित किया। हालांकि छत्तीसगढ़ में इस दिवस का आयोजन इससे पहले वर्ष 2005 से लगातार किया जा रहा है। इस वर्ष राज्य में इसका 22वां आयोजन हुआ।

‘शहीद परिवारों से आर्थिक मदद से ज्यादा जरूरी भावनात्मक जुड़ाव’

कार्यक्रम में प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण कुमार पांडे ने वन शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि शहीद परिवारों के लिए केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है। उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों से आग्रह किया कि वे शहीद परिवारों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखें, ताकि उन्हें यह महसूस हो कि वे आज भी वन विभाग के विशाल परिवार का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि वन शहीद दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि वन सुरक्षा के प्रति नए संकल्प का दिन है।

पांडे ने यह भी बताया कि वनकर्मियों के लिए एक्स-ग्रेशिया यानी अनुग्रह राशि जैसी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के प्रशासनिक प्रयास जारी हैं। हालांकि उन्होंने अधिकारियों से शहीद परिवारों के साथ व्यक्तिगत और भावनात्मक संबंध बनाए रखने को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताया।

शहीदों की संतानों ने संभाली वन सुरक्षा की जिम्मेदारी

कार्यक्रम में इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि कई शहीद परिवारों की अगली पीढ़ी स्वयं वन विभाग में सेवाएं दे रही है। अनुकंपा नियुक्ति के माध्यम से वनरक्षक के रूप में सेवा शुरू करने वाले कई परिजन अब वनपाल और परिक्षेत्र अधिकारी जैसे पदों तक पहुंचे हैं।

श्रीमती अन्नपूर्णा साहू, मनोज जायसवाल, रामविलास सिंह और श्रीमती तुलसा मरकाम जैसे शहीद परिवारों के सदस्य आज अपने पिता या पति के अधूरे दायित्व को आगे बढ़ा रहे हैं। कार्यक्रम में इसे शहीदों के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि बताया गया।

शहीद परिवारों के कल्याण के लिए शासन की प्रतिबद्धता

कार्यक्रम में अपर मुख्य सचिव ने शहीद परिवारों के कल्याण के प्रति शासन की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि पात्र परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति प्राथमिकता के आधार पर दी जा रही है। उत्कृष्ट कार्य करने वाले वनकर्मियों को वानिकी दिवस 2027 के अवसर पर सम्मानित करने की भी बात कही गई।

इस अवसर पर वन शहीदों पर केंद्रित एक विशेष स्मारिका का विमोचन भी किया गया। इसमें प्रदेश के वन शहीदों का जीवन-वृत्त और उनके परिवारों के लिए उपलब्ध कल्याणकारी प्रावधानों को संकलित किया गया है।

कार्यक्रम का समापन वन सुरक्षा की सामूहिक शपथ के साथ हुआ। इस दौरान कहा गया कि वन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं रह सकती। उनके बलिदान को वन संरक्षण के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी और संकल्प में बदलना ही उनके प्रति वास्तविक सम्मान होगा।

शासन की ओर से समाज से भी अपील की गई कि वन केवल वन विभाग की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की साझा प्राकृतिक धरोहर हैं। वन सुरक्षा में नागरिकों की भागीदारी ही वन शहीदों की स्मृति को वास्तविक अर्थ दे सकती है।

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