हसदेव के जंगल पर फिर चला ‘नीलामी का हथौड़ा’: 2023 में जिस तारा ब्लॉक को छत्तीसगढ़ ने बचाने की गुहार लगाई, 2026 में उसी को अदाणी समूह की कंपनी ने हथिया लिया
विधानसभा का सर्वसम्मत संकल्प, सुप्रीम कोर्ट में राज्य का हलफनामा और 2023 की आपत्ति—सब पीछे छूटे; 11 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार के नए पत्र के बाद खुला रास्ता
रायपुर। हसदेव अरण्य के जंगलों को बचाने की करीब डेढ़ दशक पुरानी लड़ाई के बीच तारा कोल ब्लॉक की दोबारा नीलामी ने छत्तीसगढ़ की राजनीति और पर्यावरण नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि केंद्र सरकार ने तारा कोल ब्लॉक की नीलामी क्यों की। सवाल यह है कि जिस छत्तीसगढ़ सरकार ने 2023 में इसी ब्लॉक को नीलामी से बाहर रखने के लिए केंद्र को पत्र लिखा था, उसी राज्य सरकार ने दिसंबर 2025 में ऐसा क्या बदलता हुआ देखा कि उसने केंद्र से तारा कोल ब्लॉक की नीलामी का अनुरोध कर दिया?
और इससे भी बड़ा सवाल—26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा हसदेव अरण्य के सभी कोल ब्लॉकों को रद्द करने का सर्वसम्मत संकल्प आखिर किस फाइल में दफन हो गया?
2023 में राज्य सरकार ने खुद कहा था—तारा को नीलाम मत करो
तारा कोल ब्लॉक पहली बार 2023 में वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी में शामिल किया गया था। उस समय छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र से तारा समेत नौ कोल ब्लॉकों को नीलामी से बाहर रखने का आग्रह किया था।
23 जून 2023 के राज्य सरकार के पत्र में तारा को लेकर पर्यावरणीय आपत्तियां दर्ज थीं। तारा ब्लॉक में 15.96 वर्ग किलोमीटर Very Dense Forest यानी अत्यंत घना वन क्षेत्र मौजूद होने की बात कही गई थी। उस समय तारा ब्लॉक का लगभग 81 प्रतिशत हिस्सा वनाच्छादित बताया गया था।
यानी राज्य सरकार की आपत्ति केवल यह नहीं थी कि तारा का कुछ हिस्सा लेमरू हाथी रिजर्व से जुड़ा हुआ है।
आपत्ति का आधार स्वयं राज्य सरकार के दस्तावेजों में घना प्राकृतिक वन और उसकी जैव विविधता भी था।
और यही वह तथ्य है जिसे आज की बहस में दबाया नहीं जाना चाहिए।
26 जुलाई 2022: विधानसभा ने सर्वसम्मति से क्या कहा था?
26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन के लिए आवंटित सभी कोल ब्लॉकों को रद्द करने के लिए केंद्र से आग्रह करने वाला सर्वसम्मत अशासकीय संकल्प पारित किया था।
संकल्प के दौरान विधानसभा में यह तर्क रखा गया था कि खनन से हसदेव की समृद्ध जैव विविधता और घने जंगल नष्ट होंगे तथा मानव-हाथी संघर्ष भी बढ़ सकता है।
तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी विधानसभा के संकल्प के बाद केंद्र से हसदेव के कोल ब्लॉकों को रद्द करने का आग्रह किया था।
इसलिए आज तारा की नीलामी पर सवाल केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है।
यह छत्तीसगढ़ विधानसभा के संकल्प की राजनीतिक विश्वसनीयता का भी सवाल है।
जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट में राज्य का दूसरा बड़ा बयान
मामला यहीं खत्म नहीं होता।
जुलाई 2023 में छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कथित रूप से यह रुख रखा था कि हसदेव अरण्य में नए कोयला खदानों को आवंटित या विकसित करने की आवश्यकता नहीं है। इस तथ्य को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी तारा नीलामी के विरोध में दोहराया है।
इसके कुछ ही महीने बाद अक्टूबर 2023 में केंद्र के कोयला मंत्रालय ने 40 कोल ब्लॉकों को नीलामी प्रक्रिया से हटा दिया था, जिनमें तारा भी शामिल था।
यानी घटनाक्रम की पहली कड़ी साफ थी—
विधानसभा का संकल्प → राज्य की पर्यावरणीय आपत्ति → सुप्रीम कोर्ट में राज्य का रुख → केंद्र द्वारा तारा को नीलामी से हटाना।
लेकिन फिर कहानी बदल गई।
फिर दिसंबर 2025 में क्या बदल गया?
कोयला मंत्रालय के आज के स्पष्टीकरण के अनुसार, 11 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ सरकार ने तारा कोल ब्लॉक की नीलामी के लिए केंद्र से अनुरोध किया।
यहीं से सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता है।
अगर 2023 में तारा—
- लेमरू हाथी रिजर्व के निकट होने के कारण संवेदनशील था,
- 15.96 वर्ग किलोमीटर Very Dense Forest से घिरा था,
- जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण था,
- विधानसभा के 26 जुलाई 2022 के सर्वसम्मत संकल्प की भावना के विरुद्ध था,
तो दिसंबर 2025 तक ऐसा क्या बदल गया कि वही जंगल अचानक नीलामी योग्य हो गया?
क्या जंगल कम घना हो गया?
क्या हाथियों ने अपना कॉरिडोर बदल लिया?
क्या विधानसभा का संकल्प समाप्त हो गया?
क्या हसदेव की जैव विविधता खत्म हो गई?
या फिर केवल सरकार बदल गई और जंगल को देखने का नजरिया बदल गया?
इन सवालों का जवाब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार को छत्तीसगढ़ की जनता को देना चाहिए।
तारा की नई कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय—विजेता कौन है?
केंद्र सरकार के आधिकारिक नीलामी परिणाम के अनुसार 2026 में Tara (Revised) को CG Syn-Gas & Chemicals Limited ने जीता।
ब्लॉक में लगभग 293.91 मिलियन टन भूगर्भीय कोयला संसाधन, 6 MTPA की पीक रेटेड क्षमता और 37.50 प्रतिशत का अंतिम ऑफर दर्ज किया गया।
लेकिन यहां एक और बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने आता है।
CG Syn-Gas & Chemicals Limited कोई स्वतंत्र स्थानीय कंपनी नहीं है।
अदाणी एंटरप्राइजेज ने 23 अगस्त 2025 को स्टॉक एक्सचेंजों को सूचना देकर बताया था कि उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी Mundra Synenergy Limited ने CG Syn-Gas & Chemicals Limited को अपनी Wholly Owned Subsidiary के रूप में स्थापित किया है।
अदाणी एंटरप्राइजेज के बाद के कॉरपोरेट दस्तावेजों में भी CG Syn-Gas & Chemicals Limited को उसकी subsidiary के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
अर्थात नीलामी के परिणाम में नाम भले CG Syn-Gas & Chemicals Limited का हो, लेकिन कॉरपोरेट स्वामित्व की श्रृंखला इस प्रकार है—
CG Syn-Gas & Chemicals Ltd.
↓
Mundra Synenergy Ltd.
↓
Adani Enterprises Ltd.
यही वजह है कि इस नीलामी को केवल एक सामान्य कोयला नीलामी मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा।
2023 में तारा को लेकर सरकार की आपत्ति बनाम 2026 की नीलामी
| मुद्दा | 2023 में राज्य सरकार का रुख | 2026 की स्थिति |
|---|---|---|
| तारा ब्लॉक | नीलामी से बाहर रखने की मांग | नीलाम |
| Very Dense Forest | 15.96 वर्ग किमी VDF का उल्लेख | वही वन क्षेत्र बहस के केंद्र में |
| लेमरू हाथी रिजर्व | संवेदनशीलता का आधार | खनन की आशंका फिर सामने |
| विधानसभा संकल्प | हसदेव के कोल ब्लॉक रद्द करने का सर्वसम्मत संकल्प | नीलामी आगे बढ़ी |
| राज्य का रुख | नए/अतिरिक्त ब्लॉकों के प्रति आपत्ति | दिसंबर 2025 में नीलामी का अनुरोध |
| विजेता | — | CG Syn-Gas & Chemicals Ltd. |
| कॉरपोरेट संबंध | — | अदाणी एंटरप्राइजेज की अप्रत्यक्ष पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी |
तारा सिर्फ कोयले का एक ब्लॉक नहीं है
तारा ब्लॉक का क्षेत्रफल लगभग 5,000 एकड़ बताया गया है, जिसमें 4,000 एकड़ से अधिक घना वन होने का दावा किया गया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस आधार पर 10 लाख से अधिक पेड़ों के संभावित नुकसान की बात कही है। यह आंकड़ा फिलहाल राजनीतिक बयान के रूप में सामने आया है, इसलिए अंतिम प्रकाशित रिपोर्ट में इसे “जयराम रमेश के अनुसार” ही लिखना उचित होगा।
लेकिन इससे अलग एक तथ्य पहले से दस्तावेजीकृत है—2023 में राज्य सरकार की आपत्ति में तारा के भीतर 15.96 वर्ग किलोमीटर Very Dense Forest का उल्लेख था।
यानी सवाल केवल कितने टन कोयले का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या देश की ऊर्जा जरूरत पूरी करने के लिए छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक जंगलों में से एक को ही लगातार नए खनन क्षेत्र में बदला जाना चाहिए?
हसदेव के जंगल और हाथियों का संकट
हसदेव अरण्य का पर्यावरणीय महत्व केवल पेड़ों की संख्या से तय नहीं होता।
यह क्षेत्र हाथियों के आवागमन और मानव-वन्यजीव संबंधों के लिहाज से भी संवेदनशील है। 2022 में विधानसभा में तारा और हसदेव में खनन को लेकर मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने की आशंका भी व्यक्त की गई थी।
तारा ब्लॉक के मामले में यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रस्तावित खनन क्षेत्र लेमरू हाथी रिजर्व के आसपास के वन परिदृश्य से जुड़ता है।
यदि जंगल को अलग-अलग खनन ब्लॉकों में काट दिया गया तो सवाल केवल कितने पेड़ कटे का नहीं होगा।
सवाल होगा—
क्या हाथियों के प्राकृतिक आवागमन के रास्ते टूटेंगे?
क्या मानव-हाथी संघर्ष बढ़ेगा?
क्या जलस्रोत और वन-आधारित आजीविका प्रभावित होगी?
क्या खनन के कारण हसदेव का एक सतत वन परिदृश्य खंडित हो जाएगा?
और अब सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से
मुख्यमंत्री स्वयं आदिवासी समाज से आते हैं।
भाजपा ने 2023 के चुनाव में आदिवासी हितों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा को अपने राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया था। लेकिन हसदेव में सरकार के कदमों को लेकर चुनाव के बाद से लगातार सवाल उठते रहे हैं।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पहले हसदेव में चल रहे काम को पिछली सरकार द्वारा दी गई मंजूरियों का विस्तार बताया था और जंगल संरक्षण तथा पौधरोपण की बात कही थी।
लेकिन तारा का मामला अलग और नया सवाल खड़ा करता है।
क्योंकि यहां सवाल केवल पिछली सरकार द्वारा दी गई किसी अनुमति का नहीं है।
यहां सवाल है—
जिस नए कोल ब्लॉक को 2023 में राज्य सरकार स्वयं नीलामी से बाहर रखना चाहती थी, उसे 2025 में उसी राज्य सरकार ने नीलामी के लिए क्यों आगे बढ़ाया?
और यदि सरकार का रुख बदल गया था तो—
छत्तीसगढ़ की जनता को इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं दी गई?
क्या विधानसभा के 2022 के संकल्प पर पुनर्विचार हुआ?
क्या कोई नया पर्यावरणीय अध्ययन हुआ?
क्या ग्राम सभाओं से नई सहमति ली गई?
क्या हाथी कॉरिडोर का नया वैज्ञानिक अध्ययन हुआ?
क्या 2023 के राज्य सरकार के सुप्रीम कोर्ट हलफनामे में बदलाव किया गया?
और सबसे महत्वपूर्ण—
किस आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि जिस तारा ब्लॉक को 2023 में पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील मानकर नीलामी से बाहर रखने की मांग की गई थी, वही ब्लॉक 2026 में खनन के लिए उपयुक्त हो गया?
क्या विकास का अर्थ जंगल की कीमत पर कोयला है?
सरकार के पास विकास और ऊर्जा सुरक्षा का तर्क होगा।
कोयला देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है—यह तथ्य है।
लेकिन उतना ही बड़ा तथ्य यह भी है कि हर कोयला भंडार को खदान में बदलना अनिवार्य नहीं होता।
2023 में राज्य सरकार ने स्वयं केंद्र को लिखा था कि पर्याप्त वैकल्पिक खदानें उपलब्ध होने के कारण इतने संवेदनशील क्षेत्र में खनन उचित नहीं है—तारा पर राज्य की आपत्ति के दस्तावेजी विवरण में यही तर्क सामने आया था।
तो आज सरकार को यह बताना चाहिए कि—
वह कौन-सा नया राष्ट्रीय हित पैदा हुआ है जिसने हसदेव के जंगलों का संरक्षण करने वाली 2023 की नीति को 2026 में बदल दिया?
हसदेव के लोगों से बड़ा सवाल
पिछले वर्षों में हसदेव के आदिवासी ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ग्रामसभा, धरना, पदयात्रा और लंबे आंदोलनों के जरिए खनन का विरोध किया है। इस संघर्ष का मुद्दा केवल पेड़ नहीं है।
यह जल, जंगल, जमीन और आजीविका का सवाल है।
और यही कारण है कि तारा की नीलामी को केवल एक आर्थिक घटना की तरह नहीं देखा जा सकता।
यह उस पूरे संघर्ष की अगली कड़ी है जिसमें एक तरफ आदिवासी समुदाय और जंगल हैं और दूसरी तरफ खनन आधारित विकास मॉडल।
मुख्यमंत्री से भूमकाल के सीधे सवाल
1. 26 जुलाई 2022 के विधानसभा के सर्वसम्मत संकल्प का क्या हुआ?
2. 23 जून 2023 को छत्तीसगढ़ सरकार ने तारा समेत नौ कोल ब्लॉकों को नीलामी से बाहर रखने की मांग क्यों की थी?
3. तब तारा में 15.96 वर्ग किलोमीटर Very Dense Forest था—क्या आज वह जंगल नहीं है?
4. जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार के उस रुख का क्या हुआ कि हसदेव में नए कोल ब्लॉक विकसित करने की जरूरत नहीं है?
5. 11 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार ने केंद्र से तारा की नीलामी का अनुरोध क्यों किया?
6. इस निर्णय से पहले क्या विधानसभा के 2022 के संकल्प पर पुनर्विचार कराया गया?
7. क्या प्रभावित ग्रामसभाओं से नई सहमति ली गई?
8. क्या हाथी कॉरिडोर और जैव विविधता पर नया स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन कराया गया?
9. क्या सरकार यह सार्वजनिक करेगी कि 11 दिसंबर 2025 का पत्र किस विभाग ने लिखा, किस अधिकारी ने अनुमोदित किया और उसके पीछे क्या वैज्ञानिक/प्रशासनिक आधार था?
10. और सबसे महत्वपूर्ण—जब नीलामी की विजेता कंपनी अदाणी एंटरप्राइजेज की अप्रत्यक्ष पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है, तो क्या सरकार जनता को यह भरोसा दिलाएगी कि निर्णय में किसी कॉरपोरेट हित का प्रभाव नहीं था?
सवाल अदाणी का नहीं, सत्ता की जवाबदेही का है
हसदेव की लड़ाई को केवल “अदाणी बनाम जंगल” कह देना भी शायद समस्या को छोटा करना होगा।
असल सवाल इससे बड़ा है।
क्या किसी लोकतांत्रिक सरकार का अपना रुख सत्ता बदलने के साथ इतना बदल सकता है कि जिस जंगल को कल बचाने की मांग की गई थी, आज उसी जंगल की नीलामी कर दी जाए?
यदि सरकार का मत बदल गया है तो उसे बदलने का वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और संवैधानिक आधार जनता के सामने रखना चाहिए।
क्योंकि जंगल सरकार की निजी संपत्ति नहीं हैं।
हसदेव छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक विरासत है।
और विधानसभा का संकल्प भी किसी सरकार की सुविधा के अनुसार याद करने और भूल जाने वाला कागज नहीं होना चाहिए।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को अब छत्तीसगढ़ की जनता को जवाब देना होगा—
2023 में जिस तारा कोल ब्लॉक को बचाने के लिए आपकी ही सरकार ने केंद्र के दरवाजे पर दस्तक दी थी, 2025 में उसी की नीलामी के लिए दरवाजा किसने खोला?
क्या हसदेव का जंगल बदला है—या सरकार की नीयत?
