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बेऊर जेल से सिवान तक: क्या छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए लोकतंत्र पर चला ‘दमन चक्र’?

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भूमकाल समाचार | एक्सक्लूसिव
अगर छात्र नेताओं के आरोप सही हैं, तो यह मामला केवल एक छात्र आंदोलन का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की गंभीर परीक्षा का विषय है।


छात्र नेता नेहा ने मंगलवार को प्रेस वार्ता में जो आरोप लगाए, वे कई असहज सवाल खड़े करते हैं। उनका दावा है कि पटना की बेऊर जेल में बिहार के 600 से अधिक छात्र-छात्राएँ बंद हैं, जिनमें लगभग 300 नाबालिग बताए गए हैं।


नेहा के अनुसार, गिरफ्तार छात्रों ने आरोप लगाया कि उन्हें 24 घंटे तक भोजन और पानी नहीं दिया गया, हिरासत में मारपीट की गई, और दलित व मुस्लिम छात्रों को विशेष रूप से अधिक प्रताड़ित किया गया। आरोप यह भी है कि उन्हें जातिसूचक शब्द कहे गए, “आतंकवादी” बताया गया और कथित तौर पर फर्जी मुठभेड़ की धमकियाँ दी गईं।


यदि ये आरोप सत्य हैं, तो सवाल केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के वास्तविक अनुपालन पर भी खड़े होते हैं।


नेहा ने सिवान की घटना का भी उल्लेख किया, जहाँ उनके अनुसार प्रदर्शन के दौरान चली गोलियों में चार छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। घायलों का आरोप है कि गोली लगने के बाद पुलिस ने उन्हें तत्काल चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराने के बजाय निष्क्रियता दिखाई और स्थानीय लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया।


नेहा का कहना है कि बिहार के पुलिस महानिदेशक को ज्ञापन सौंपने के बाद सरकार ने 355 छात्रों की रिहाई का आदेश दिया, लेकिन अभी भी 300 से अधिक छात्र जेल में बंद हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि 30 जुलाई तक सभी छात्रों को रिहा नहीं किया गया, तो एक और बड़ा आंदोलन शुरू किया जाएगा, जिसे उन्होंने जंतर-मंतर आंदोलन से भी अधिक व्यापक बताया।


बंगाल में हुई छात्र गिरफ्तारियों को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई और गिरफ्तार छात्रों की तत्काल रिहाई की मांग की।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात कहने वाले छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार स्वीकार्य है? यदि आरोप निराधार हैं, तो सरकार और पुलिस को तथ्यों के साथ उनका खंडन करना चाहिए। लेकिन यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो निष्पक्ष न्यायिक जांच और जवाबदेही लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है।


भूमकाल समाचार का मानना है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत असहमति को सुनने में है, उसे अपराध घोषित करने में नहीं। इसलिए इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच होनी चाहिए, ताकि सच देश के सामने आ सके।
(यह रिपोर्ट छात्र नेता नेहा द्वारा प्रेस वार्ता में लगाए गए आरोपों पर आधारित है।)

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