पत्रकार पर हमला होते ही पहला सवाल—”क्या वह सचमुच पत्रकार है?”

रायपुर । पत्रकारों पर हमले, फर्जी मुकदमे, गिरफ्तारी, धमकी या उत्पीड़न की घटनाओं में एक दिलचस्प और चिंताजनक पैटर्न बार-बार सामने आता है। प्रताड़ना की घटना के बाद चर्चा अक्सर इस बात पर नहीं होती कि हमला क्यों हुआ, बल्कि इस पर होने लगती है कि “वह पत्रकार है भी या नहीं?”
देश-विदेश के अनेक चर्चित मामलों में यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। जिस पत्रकार की रिपोर्टिंग या विचारों से किसी वर्ग को असहमति होती है, उसके खिलाफ कार्रवाई होते ही सोशल मीडिया पर उसके पेशे, नीयत और पहचान पर सवाल उठने लगते हैं। कई बार उसे “दलाल”, “एजेंट”, “यूट्यूबर”, “एक्टिविस्ट” या अन्य विशेषणों से संबोधित कर उसकी पत्रकारिता को ही खारिज करने की कोशिश की जाती है।
यह पैटर्न केवल बड़े नामों तक सीमित नहीं है। स्थानीय और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकार भी जब किसी विवाद या कार्रवाई का सामना करते हैं, तब अक्सर सबसे पहले उनकी पत्रकारिता की वैधता पर ही सवाल उठाए जाते हैं।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति की पत्रकारिता की गुणवत्ता या निष्पक्षता पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन केवल प्रताड़ना की घटना के आधार पर उसके पत्रकार होने या न होने का निष्कर्ष निकालना स्वयं एक अलग सामाजिक प्रवृत्ति है। यह विषय मीडिया अध्ययन, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में गंभीर शोध का विषय हो सकता है।
ऐसी ही एक घटना जशपुर जिले के पत्थलगांव में पत्रकार अमित पांडे के साथ कथित रूप से पुलिस थाने के भीतर मारपीट की घटना सामने आई है। आरोप है कि थाने में मौजूद पुलिस अधिकारियों के सामने कुछ लोगों ने उनके साथ अभद्रता और हमला किया। घटना के बाद पत्रकार संगठनों और नागरिकों ने निष्पक्ष जांच तथा दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग उठाई है।
मगर जशपुर जिले से ही कुछ लोग द्वारा अमित पांडे के पत्रकार होने पर ही सवाल उठाए जा रहा है, आश्चर्य है कि इन सवाल उठाने वालों द्वारा पुलिस थाने में हुई खुलेआम गुंडागर्दी पर एक शब्द भी नहीं कहा जा रहा ।
