राख के ढेर में बदलता रायगढ़

कभी नदियों खेतों हरियाली और श्रमशील लोगों की पहचान रखने वाला रायगढ़ आज धीरे धीरे राख के शहर में बदलता दिखाई दे रहा है विकास, उद्योग और बिजली उत्पादन के बड़े बड़े दावों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है…? सिर्फ़ गांव, किसान, मजदूर, बच्चे और आने वाली पीढ़ियां.
थर्मल पावर प्लांटों की चिमनियों से निकलती राख अब सिर्फ फैक्ट्री परिसर तक सीमित नहीं रही यह राख हवा में घुलकर गांवों की सांसों में उतर रही है, खेतों की मिट्टी पर जम रही है जलस्रोतों तक पहुंच रही है और धीरे धीरे पूरे सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रही है सुबह घरों की चौखट पर जमी धूल अब सामान्य धूल नहीं बल्कि औद्योगिक राख बन चुकी है…!!!
सबसे चिंता की बात यह है कि जिन परियोजनाओं को रोजगार और समृद्धि विकास का माध्यम बताया गया था उन्हीं परियोजनाओं के आसपास रहने वाले लोग आज प्रदूषण, बीमारी और असुरक्षा के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की शिकायत है कि राख से फसलें प्रभावित हो रही हैं जल स्रोत दूषित हो रहे हैं और सांस संबंधी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं.
अब एनटीपीसी लारा के थर्ड फेज विस्तार और उससे निकलने वाली करोड़ों टन फ्लाई ऐश को लेकर लोगों की चिंता और गहरी हो गई है सवाल सिर्फ बिजली उत्पादन का नहीं है सवाल यह है कि क्या पर्यावरणीय संतुलन, मानव स्वास्थ्य और भविष्य की कीमत पर विकास स्वीकार किया जा सकता है…!!!
जनसुनवाई लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है लेकिन जब जनता को पूरी जानकारी पारदर्शिता और वास्तविक पर्यावरणीय प्रभावों की स्पष्ट तस्वीर नहीं मिलती, तब यह प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाती है लोगों को यह जानने का अधिकार है कि कितनी जमीन ली जाएगी कितनी राख निकलेगी उसका निस्तारण कहां होगा और आने वाले वर्षों में इसका असर कितना भयावह हो सकता है.
रायगढ़ आज सिर्फ एक जिला नहींबल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी बनता जा रहा है यदि समय रहते प्रदूषण नियंत्रण फ्लाई ऐश प्रबंधन और पर्यावरणीय जवाबदेही को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में यह संकट और विकराल रूप ले सकता है…
विकास जरूरी है लेकिन ऐसा विकास जो लोगों की सांस छीन ले नदियों को जहर बना दे और जमीन को राख में बदल दे उस पर सवाल उठाना भी उतना ही जरूरी है रायगढ़ की लोग अब सिर्फ आश्वासन नहीं जवाब क्या है यह जानना चाहेंगे।

दीपक शर्मा रायगढ़
