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हिंदू धर्म की सांस्कृतिक पहचान चूड़ी हमे जोड़ती है मुस्लिम संस्कृति से

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भारत में चूड़ी पहनने की परंपरा लगभग 5,000 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। इसका सबसे पहला ठोस प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई से मिलता है, जहां टेराकोटा, सीप और तांबे से बनी चूड़ियां पहने हुए नर्तकी की मूर्ति मिली थी। खुदाई में मिली प्राचीन वस्तुओं से स्पष्ट होता है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो काल से ही भारतीय महिलाएं अपनी कलाइयों को सजाने के लिए चूड़ियों का उपयोग कर रही हैं। समय के साथ चूड़ियां केवल मिट्टी या तांबे तक सीमित नहीं रहीं; मध्यकाल और मुगल काल में सोने, चांदी, कीमती रत्नों, लाख और मीनाकारी का काम शुरू हुआ। भारतीय परंपरा में सुहाग या विवाहित स्थिति के प्रतीक के रूप में चूड़ियां पहनना अनिवार्य माना जाता है। क्षेत्रीय आधार पर इनके अलग-अलग रूप हैं, जैसे राजस्थान की लाख की चूड़ियां या बंगाल की शाखा और पोला। भारत में चूड़ियों को पहनने की परंपरा प्राचीन काल से शुरू हुई। आज भी महिलाएं अपनी स्त्रीत्व की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए चूड़ियां पहनती हैं।

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भारत में चूड़ी बनाने, बेचने और पहनाने के काम में मुस्लिम समुदाय की बड़ी भूमिका के पीछे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक कारण हैं। यह सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक एकता का एक बेहतरीन उदाहरण है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मुगल काल का प्रभाव, राजसी संरक्षण मुगल काल में कांच कला, मीनाकारी और आभूषण निर्माण को शाही संरक्षण मिला। फ़िरोज़ाबाद जैसे शहरों की स्थापना और विकास में मुगल शासकों और उनके कुशल मुस्लिम कारीगरों का बड़ा योगदान रहा। रुस्तम उस्ताद की विरासत फ़िरोज़ाबाद में आधुनिक कांच की चूड़ी बनाने की तकनीक की शुरुआत का श्रेय हाजी रुस्तम मोहम्मद उस्ताद को जाता है। उनके वंशजों और समुदाय ने इस हुनर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया। परंपरागत मनिहारी संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण मुस्लिम समुदाय में मनिहार या सिद्दीकी उप-जाति के लोग सदियों से चूड़ी बनाने, सजाने और पहनाने के पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े हैं। पिता से बेटे और माँ से बेटी को यह हुनर विरासत में मिलता है। चूड़ी पहनाने की कला कांच की चूड़ियों को बिना तोड़े, सही नाप देखकर कलाई में बिठाना एक बारीक कला है। इस हुनर में मनिहार समुदाय के लोग शुरू से ही माहिर माने जाते हैं। व्यावसायिक ढांचा और श्रम विभाजन सांप्रदायिक सौहार्द का मॉडल भारत के सबसे बड़े चूड़ी उद्योग में व्यापारिक संतुलन देखने को मिलता है। यहां अधिकांश कारखानों और पूंजी निवेश में हिंदू व्यापारी शामिल हैं, जबकि भट्टियों में काम करने, चूड़ियों की जुड़ाई, नक्काशी, पॉलिश और खुदरा बिक्री का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम कारीगरों द्वारा संभाला जाता है।

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सामाजिक और सांस्कृतिक स्वीकार्यता त्योहारों की रौनक भारत में तीज, करवाचौथ, शादियों और ईद जैसे मौकों पर चूड़ी पहनने का विशेष महत्व है। सदियों से गांवों और शहरों के बाजारों में मुस्लिम मनिहारों की दुकानें सजती आ रही हैं, जहां हर धर्म की महिलाएं बिना किसी सामाजिक भेदभाव के उनसे चूड़ियां पहनती हैं। इस प्रकार, यह पेशा धार्मिक रूप से तय नहीं है, बल्कि कौशल, पारिवारिक विरासत और सदियों पुराने आर्थिक तालमेल का परिणाम है। उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में आज भी मनिहार ही चूड़ी पहनाने का काम करते हैं, जो कि मुस्लिम समुदाय के लोग होते हैं। उनको आज भी गांव-देहात के समाज में वही मान-सम्मान प्राप्त होता है, जो पहले होता आया है। उनके बिना कोई शादी-विवाह अथवा अन्य मांगलिक कार्य संभव होना मुश्किल है।

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मनोज पाठक

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