छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ भाजपा में बदलाव के मायने

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छत्तीसगढ़ राज्य विधान सभा के अगले चुनाव के लिए करीब ढाई वर्ष शेष है. नये चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2028 में होंगे. भाजपा की चुनाव तैयारियां शुरू हो गई हैं. प्रदेश कार्य समिति व कोर कमेटी से कुछ पुराने वरिष्ठ सदस्यों को विदा कर नये व ऊर्जावान साथियों को शामिल किया गया है. ऐसा प्रतीत होता है कि केन्द्रीय नेतृत्व चुनाव के पूर्व अपेक्षाकृत नयी टीम को मैदान में उतारना चाहता है. फिलहाल जो बदलाव हुए हैं , वे चुनाव में उजली संभावनाओं को ध्यान में रखकर किए गए हैं. इस प्रक्रिया में विरोध व असंतोष की लहर का उठना स्वाभाविक है, पर फिलहाल उसकी गति मंद है. कोर कमेटी से सात दिग्गज नेताओं पुन्नूलाल लाल मोहले, गौरीशंकर अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल, राम विचार नेताम, विक्रम उसेंडी, रेणुका सिंह व वर्तमान विधान सभा अध्यक्ष डॉक्टर रमनसिंह को बाहर कर दिया गया है. ये सभी अलग-अलग अवधि मे सरकार व संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके है. इनके स्थान पर डिप्टी सीएम विजय शर्मा, वित्त मंत्री ओ पी चौधरी, पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल, लता उसेंडी व शिवरतन शर्मा को लिया गया है. प्रदेश कार्य समिति में भी बदलाव किया गया है. 23 विधायकों को सदस्य नहीं बनाया गया जबकि परंपरागत रूप से पार्टी के सभी विधायक विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में कार्य समिति में रहते हैं. प्रदेश अध्यक्ष किरण देव की नयी टीम में 14 मंत्री व 17 विधायकों को जगह दी गई है. विधान सभा में भाजपा विधायकों की कुल संख्या 54 है.

केन्द्रीय नेतृत्व के मिजाज व कार्यशैली को देखते हुए यह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है. भाजपा प्रयोगधर्मी पार्टी है. पुराने व पके हुए नेताओं को मुख्य धारा से हटाने की प्रक्रिया पूर्व में अहिस्ता-अहिस्ता और अब कुछ तेज गति से शुरू है. पिछले दस वर्षों में चाहे संगठन के मामले हों या विधान सभा या लोकसभा चुनावों में प्रत्याशियों के चयन का मसला हो , पार्टी ने ऐसे-ऐसे नेताओं को टिकिट दी जिनकी राजनीतिक पहचान खास नहीं थी. नेतृत्व ने जोखिम भरे निर्णय लिए जो कभी गलत साबित नहीं हुए. यह अलग बात है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का जलवा और आरएसएस की जमीनी ताकत चुनावों में अपना असर दिखाती रही. लगभग तमाम चुनावों में प्रत्याशी नहीं पार्टी जीतती रही है. इसलिए अनेक मामूली से मामूली नेता भी सांसद व विधायक बन गए और कुछ को मंत्री बनने का भी सौभाग्य मिला. भाजपा की नीति बहुत स्पष्ट है. यहां नेता नहीं संगठन सर्वोपरि है इसलिए कोई भी जीत व्यक्ति की नहीं, पार्टी की मानी जाती है. इसलिए कठोर से कठोर निर्णय लेने में भी पार्टी आगे-पीछे नहीं देखती. छत्तीसगढ़ इसका ताजा उदाहरण है. छत्तीसगढ़ प्रदेश के मामले में राष्ट्रीय नेतृत्व की कथित सलाह पर प्रादेशिक नेतृत्व ने कोर कमेटी व कार्य समिति से वरिष्ठ नेताओं की छुट्टी करके स्पष्ट संकेत दिया है कि उनके सक्रिय राजनीति से रिटायर होने का वक्त आ गया है.

कोर कमेटी से हटाए गए रमनसिंह पंद्रह वर्षों तक मुख्य मंत्री रहने के बाद अब विधान सभा अध्यक्ष हैं. 2023 के विधान सभा चुनाव के दौरान काफी समय तक उनकी कोई खास पूछ-परख नहीं हुई थी. एक तरह से वे हाशिए पर थे. प्रारंभ में उन्हें चुनाव से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णयों से बाहर ही रखा गया लेकिन नेतृत्व को इस बात का अहसास होते ही कि पूर्व मुख्य मंत्री की उपेक्षा पार्टी को भारी पड़ सकती है, उन्हें पुन: मुख्य धारा में लाया गया. भाजपा ने चुनाव जीता और रमनसिंह सिंह की वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें ‘एडजस्ट’ किया गया. वे विधान सभा अध्यक्ष बना दिये गये. बहुत संभव है कि यह उनका आखिरी राजनीतिक सफर हो. उनकी उम्र तथा स्वास्थगत समस्याओं को देखते हुए नहीं लगता कि उन्हें अगले चुनाव की टिकिट दी जाएगी. अलबता यदि वे दिलचस्पी दिखाएं तो उन्हें किसी राज्य का राज्यपाल बनाया जा सकता है. चर्चा रही है कि 2018 के चुनाव में पार्टी की बुरी हार के बाद उन्हें इस आशय का प्रस्ताव दिया गया था जिसे उन्होंने मंजूर नहीं किया.

कोर कमेटी से जो अन्य नेता बाहर किये गए हैं, उनमें से बृजमोहन अग्रवाल को छोड़कर शेष की सक्रियता पर सवाल उठते रहे हैं. जिन विधायकों को कार्य समिति में स्थान नहीं मिला, वे भी हैरान परेशान हैं. उनके असंतोष की जो धीमी लहरें उठ रही हैं उसके विशेष मायने नहीं हैं लेकिन ‘असंतुष्ट ‘ बृजमोहन अग्रवाल का मामला सबसे अलग माना जा रहा है. यह बहुत स्पष्टत: नज़र आता रहा है कि रायपुर के सांसद पर केन्द्र विशेषकर मोदी मेहरबान नहीं है जबकि वे प्रदेश भाजपा के ताकतवर व खूब लोकप्रिय नेता हैं. चुनाव संचालन में बेजोड़ माना जाने वाले इस नेता को पार्टी का ट्रबल शूटर भी कहा जाता रहा है. यही नहीं हर कठिन परिस्थितियों में उन्होंने स्वयं को साबित भी किया. राज्य के अनेक उपचुनाव में पार्टी की जीत के पीछे बृजमोहन की रणनीति कारगर रही है. उन्हें संसदीय कार्यों का भी लंबा अनुभव है. वे मध्यप्रदेश के जमाने में और बाद में अलग बने छत्तीसगढ में लगातार विधान सभा सदस्य और महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे. बृजमोहन अग्रवाल के बढ़ते कद से जो विरोधी आतंकित रहे हैं उनमें डॉक्टर रमनसिंह का भी नाम लिया जाता है. उन्होंने अपने पन्द्रह वर्षों के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में बृजमोहन के पर कतरने शुरू किए. उनके मुकाबले में तब के अनुभवहीन मंत्री राजेश मूणत को खड़ा किया गया. उनकी पीठ खूब थपथपाई गई. मूणत ताकतवर मंत्री कहे जाने लगे किंतु तमाम कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद बृजमोहन की राजनीतिक सेहत पर फर्क नहीं पड़ा. न तो उनकी राजनीतिक सक्रियता घटी और न ही लोकप्रियता कम हुई.

फिर भी उनके खिलाफ प्रयास जारी रहे. 2023 के विधान सभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद यद्यपि वे विष्णुदेव साय सरकार में शामिल कर लिए गए लेकिन पार्टी के केन्द्रीय प्रमुखों ने उन्हें प्रदेश की राजनीति से दूर रखने का

मन पक्का कर लिया था. मौका मिला छह माह बाद ही हुए 2024 के लोकसभा चुनाव का. उनकी अनिच्छा के बावजूद उन्हें रायपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से टिकिट दे दी गई. वे राष्ट्रीय कीर्तिमान के साथ चुनाव जीत गए. बृजमोहन सांसद जरूर बन गए हैं किन्तु प्रदेश की राजनीति में वैसे ही सक्रिय है जैसे विधायक व मंत्री रहते हुए थे. उनका मानना है कि विरोधी कितनी भी कोशिश कर लें, उनका कुछ नहीं बिगाड पाएंगे क्योंकि उनके पीछे जनता की ताकत है. कोर कमेटी में अब वे नहीं हैं किंतु प्रदेश की जनपक्षधरीय राजनीति में उनका दखल कायम है.

किंतु यह मान लेना चाहिए कि अब भाजपा में बृजमोहन की राजनीति ढलान पर है. यदि कोई चमत्कार हो जाए और देर-सबेर उन्हे केन्द्रीय मंत्रिमंडल में ले लिया जाए या कोई और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी जाए तो बात अलग है लेकिन फिलहाल इसकी उम्मीद कम ही नज़र आती है. लेकिन पार्टी को इस तथ्य पर भी विचार करना होगा कि बृजमोहन जैसे वरिष्ठ व अनुभवी नेता को किनारे करने से चुनाव में पार्टी को कितना नुकसान हो सकता है.

बहरहाल कोर कमेटी व कार्य समिति से दिग्गज नेताओं को बाहर किए जाने के बाद सरकार व संगठन से नाराज असंतुष्टों की लंबी कतार बनती जा रही है. राज्य विधान सभा के अब तक के सत्रों में विष्णुदेव साय सरकार को दोहरे मोर्चे पर लड़ना पड़ रहा है. मुख्य विपक्ष कांग्रेस तो है ही, दूसरा उसका अपना प्रतिपक्ष है अर्थात अपनी ही सरकार से तल्ख सवाल करने वाले वे विधायक हैं जो असंतुष्ट खेमे का प्रतिनिधित्व करते हैं. अब सवाल है कि क्या केन्द्रीय नेतृत्व तथा प्रदेश संगठन कथित असंतुष्टों की मिजाजपुर्सी करेगा? उन्हें शांत करने के लिए कोई मीठी या बहुत कडवी दवाई दी जाएगी ? भाजपा की राजनीति को देखते हुए कहा जा सकता है कि ऐसा कुछ नहीं होगा. कोई भी पार्टी से विद्रोह करने की स्थिति में नहीं है. लिहाज़ा चाय की प्याली में असंतोष का जो थोडा बहुत उबाल दिखाई पड़ रहा है वह कुछ समय में ही झाग की तरह अपने आप नीचे बैठ जाएगा. लेकिन यदि कार्यकताओं की पूछ-परख नहीं होगी, सत्ता व संगठन में उन्हें सम्मान नहीं मिला, सरकार से संबंधित छोटे-मोटे कार्यों के लिए भी उन्हें तरसाया गया तो जाहिर है असंतोष का लावा अंदर ही अंदर खदबदाता रहेगा और अवसर मिलते ही बाहर आ जाएगा. बीते ढाई वर्ष में साय सरकार व संगठन के कामकाज से ऐसी स्थिति धीरे-धीरे बनती जा रही है.

फिलहाल राज्य संगठन के संदर्भ में किसी महत्वपूर्ण घटनाक्रम की प्रतीक्षा है. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन नबीन की कार्यकारिणी के शीघ्र गठन की उम्मीद की जा रही है. यह देखना दिलचस्प रहेगा कि संगठन प्रभारी महामंत्री पवन साय के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में जमकर कार्य करने वालों में से किसे राष्ट्रीय संगठन में काम करने का अवसर मिलेगा या केवल जबानी तारीफ ही चलती रहेगी ? जो भी हो पर यह स्पष्ट है कि साय सरकार स्वतंत्र नहीं है. सत्ता के वास्तविक सूत्र संगठन के चंद नेताओं के हाथ में है जिनमें केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और पवन साय का नाम विशेष रूप से चर्चा में रहता है. बहरहाल 2028 का चुनाव भाजपा के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण रहेगा क्योंकि सरकार की कमजोरियां संगठन पर बोझ की तरह सवार रहेंगी.

दिवाकर मुक्तिबोध

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