तमिलनाडु को अपना नया “थलपति” मिलने जा रहा है

तमिलनाडु को अपना नया ‘थलपति’ मिलने जा रहा है। जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं। थलपति तमिल मूल का शब्द है जिसका अर्थ होता ‘कमांडर’, ‘सेनापति’ या ‘जननेता’ यानी जिसे जनता का प्यार हासिल है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के रुझानों में तमिलगा वेट्री कजगम (टीवीके) को बहुमत मिलता हुआ नजर आ रहा है। रुझानों में विजय थलपति की पार्टी को 100 से ज्यादा सीटें मिलती दिख रही है। 234 सीटों वाले विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटों की जरूरत होती है।
एग्जिट पोल में भी विजय की पार्टी को बढ़त मिलने के आसार नजर आए थे। तभी सवाल उठा था कि क्या विजय थलपति दिल्ली में अरविंद केजरीवाल जैसी बड़ी सफलता हासिल करने वाले हैं, या फिर उनका हश्र बिहार में प्रशांत किशोर जैसा होगा? आज के रुझान बता रहे हैं कि विजय थलपति दिल्ली में केजरीवाल की तरह तमिलनाडु में सत्ता की धुरी बनने जा रहे हैं। पहले माना जा रहा था कि विजय की पार्टी सिर्फ एक बड़ी ताकत बनेगी। लेकिन रुझान बता रहे हैं कि सिर्फ ताकत नहीं बनेगी बल्कि सत्ता भी हासिल करेगी।
रुझानों से साफ हो गया है कि शहरी और युवा वोटरों ने विजय की पार्टी पर जमकर प्यार बरसाया है। टीवीके की सीटों में जबरदस्त उछाल इस बात का संकेत है कि विजय की पार्टी सत्ता हासिल करने जा रही है। पहली बार चुनाव मैदान में उतरे विजय थलपति भी केजरीवाल जैसा ही कमाल करते नजर आ रहे हैं। याद कीजिए जब अरविंद केजरीवाल अपने पहले चुनाव में ही सत्ता पर काबिज हो गए थे। विजय अब तमिलनाडु की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं।
अब विजय, अरविंद केजरीवाल की लीग में शामिल हो गए हैं। विजय के पास अपनी ‘सुपरस्टार थलाइवर’ वाली छवि है। तमिलनाडु में यह सिलसिला चला आ रहा है। एमजी रामचंद्रन और जे जयललिता इसकी मिसाल रही हैं। हालांकि, 2013 के दिल्ली चुनाव के विपरीत – जहां केजरीवाल सिर्फ भ्रष्टाचार-विरोधी लहर के सहारे आगे बढ़े थे – तमिलनाडु का चुनावी मुकाबला काफी पेचीदा रहा; यह द्रविड़ राजनीति, मजबूत पार्टी तंत्र और दशकों पुरानी मतदाताओं की वफादारी में गहराई से जुड़ा हुआ दिखा।
अगर आज विजय नाकाम साबित होते तो कहा जाता है कि वो तमिलनाडु के प्रशांत किशोर साबित हुए हैं। पिछले साल बिहार में पॉलिटिकल स्ट्रैटजिस्ट प्रशांत किशोर की शुरुआत को लेकर काफी चर्चा हुई थी, लेकिन उनकी ‘जन सुराज पार्टी’ विधानसभा चुनावों में अपना खाता खोलने में भी नाकाम रही। प्रशांत किशोर के साथ यह तुलना एक और लिहाज से भी अहम है। किशोर की बिहार मुहिम का मकसद एक वैकल्पिक राजनीतिक जगह बनाना था, लेकिन वह अपनी लोकप्रियता को वोट में तब्दील करने में नाकाम रहे। विजय ऐसे नेता बनकर उभरे हैं जिसने अपनी लोकप्रिया को वोट में बदल दिया। कभी केजरीवाल ने भी यही किया था।
