एथेनॉल का ‘पुत्र मोह’ और इंजन की बर्बादी: गडकरी जी, यह ग्रीन फ्यूल है या ‘फैमिली बिजनेस’ का टूल?

भारत की सड़कों पर ‘ग्रीन इकोनॉमी’ का जो सपना बेचा जा रहा है, उसके पीछे का सच गन्ने के रस की मिठास जैसा नहीं, बल्कि कड़वा है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का ड्राफ्ट देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए कम और कुछ खास राजनीतिक परिवारों की शुगर मिलों और डिस्टिलरीज़ के टर्नओवर के लिए ज़्यादा लाया गया लगता है।
- जनता का इंजन और ‘पुत्र मोह’ की बलि
एथेनॉल की अधिक मात्रा (E20 और उससे ऊपर) सामान्य इंजन के लिए धीमा ज़हर है।
इंजन की बर्बादी: एथेनॉल पानी सोखता है, जिससे गाड़ियों के फ्यूल पंप और इंजन के पुर्जों में जंग (Corrosion) लगती है। आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई से गाड़ी खरीदता है, लेकिन सरकार ‘पुत्र मोह’ में उसे खराब ईंधन की ओर धकेल रही है।
सीधा लाभ: जब नीति बनाने वाले ही एथेनॉल उत्पादन से जुड़ी बड़ी कंपनियों और डिस्टिलरीज़ के मालिक हों या उनके परिवार के हित उससे जुड़े हों, तो ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ का यह सबसे बड़ा उदाहरण है।
- ‘शून्य’ रणनीतिक भंडार और एथेनॉल का शोर
एक तरफ भारत का रणनीतिक तेल भंडार चीन के 1,400 मिलियन बैरल के मुकाबले मात्र 21 मिलियन बैरल (0% विकास) पर खड़ा है।
क्या एथेनॉल ब्लेंडिंग इस गंभीर रणनीतिक विफलता को छिपाने का एक तरीका है?
प्राथमिकता का संकट: जिस ऊर्जा का उपयोग रणनीतिक भंडार बनाने में होना चाहिए था, उसे चुनावी चंदे और पारिवारिक बिजनेस को चमकाने वाली सब्सिडी में झोंका जा रहा है।
‘एथेनॉल घोटाला’ और मध्यम वर्ग की कमर
एक तरफ देश का मध्यम वर्ग महंगाई और ‘ईएमआई’ के बोझ तले अपना सोना गिरवी रख रहा है, और दूसरी तरफ उसे ऐसा पेट्रोल खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है जो उसकी गाड़ी के इंजन की उम्र कम कर देगा।
यह “गन्ने से फ्यूल” का खेल दरअसल “आम आदमी की जेब से पारिवारिक तिजोरी” तक का रास्ता है। प्रधानमंत्री की ‘लापता डिग्री’ की तरह ही इस एथेनॉल नीति की निष्पक्ष जाँच की फाइलें भी कभी नहीं मिलेंगी।
गडकरी जी, देशहित का मतलब ‘जनता का हित’ होता है, ‘परिवार की बैलेंस शीट’ सुधारना नहीं। अब बहुत हुआ लफ्फाजी का खेल, जनता अब इस ‘एथेनॉल ब्लफ’ को समझ चुकी है!

ज्ञानेंद्र अवस्थी
