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आरएसएस पहले चुनाव में भी नहीं चाहती थी कि आम जनता वोटर बने

नीचे एक तस्वीर में भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन हैं। दूसरे में अपने डैडी की फोटू के सामने हंसता, बेशर्म ज्ञानेश गुप्ता है।

नारंगी कीड़ों को बता दूं कि लोकतंत्र सिर्फ़ वोट देने का मसला नहीं है, यह वोट को सुरक्षा देने का भी मसला है।

वरना नॉर्थ कोरिया में भी वोटिंग होती है।

विभाजन के बाद का समय था। सुकुमार बाबू के सामने सवाल आया–भारतीय कौन है?

तब भारत की 84% अवाम अनपढ़ थी। वे कागजों पर अपनी पहचान साबित नहीं कर सकते थे।

तब भारत के संविधान निर्माताओं ने वयस्क मताधिकार को अपनाया। आरएसएस तब भी कहती रही कि वोट डालने का हक सिर्फ उसे मिले, जो टैक्स देता है, या जिसकी प्रॉपर्टी यहां हो।

लेकिन, संविधान निर्माताओं ने कहा, जो जहां 180 दिन से रह रहा है, वही वोटर है।

उधर, नेहरू 1951 के शुरू में पहला चुनाव करवाना चाहते थे। लेकिन, सुकुमार सेन ने उन्हें रोक दिया।

सुकुमार की टीम ने 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक 17 करोड़ भारतीयों का मताधिकार सुरक्षित कर दिया।

भारत के 49% लोग वोटर के रूप में रजिस्टर्ड हो चुके थे।

इनमें भूमिहीन, बेरोजगार, विकलांग, औरतें, मजदूर, भिखारी–सब थे। सबको अपने भारतीय होने का गर्व था। सबकी आंखों में नागरिकता के आंसू थे।

आज उसी आयोग के ज्ञानेश एंड क्रिमिनल कंपनी ने बंगाल के 27 लाख लोगों को नागरिकता से महरूम कर भारत के संविधान निर्माताओं की मेहनत पर पानी फेर दिया।

4 मई को टीएमसी बंगाल जीते या नहीं, ज्ञानेश/आरएसएस/बीजेपी की कंपनी ज़रूर हारेगी।

आरएसएस ने लोकतंत्र को अलोकतंत्र बना दिया है।

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