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नंदराज पहाड़ पर फिर शुरू खनन: जिस ग्रामसभा को जांच में फर्जी पाया गया, उसी के बाद वन स्वीकृति कैसे बहाल हुई?

2019 में आदिवासियों के भारी विरोध के बाद रुका था Deposit-13 का काम, कलेक्टर की जांच में ग्रामसभा कार्यवाही पर उठे थे गंभीर सवाल

भूमकाल समाचार | रायपुर/बस्तर

बस्तर के आदिवासियों की आस्था और समृद्ध जैव विविधता के प्रतीक नंदराज पहाड़ के Deposit-13 पर एक बार फिर खनन गतिविधियां शुरू हो गई हैं। सवाल सिर्फ पहाड़ के खनन का नहीं है, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया का है जिसके आधार पर वर्षों पहले विवादित हुई ग्रामसभा और वन स्वीकृति के बावजूद परियोजना को फिर आगे बढ़ाया गया।

वर्ष 2019 में Deposit-13 के खिलाफ हजारों आदिवासियों ने आंदोलन किया था। ग्रामीणों का आरोप था कि हिरोली ग्रामसभा के नाम पर जिस प्रस्ताव के आधार पर खनन की अनुमति हासिल की गई, वैसी ग्रामसभा हुई ही नहीं थी। तत्कालीन राज्य सरकार ने शिकायत की जांच के आदेश दिए और परियोजना की गतिविधियों पर रोक लगाई थी।

जांच के बाद सरकार के सामने यह मामला आया कि 2014 की हिरोली ग्रामसभा की कार्यवाही को जांच में अमान्य/शून्य माना गया। मार्च 2020 में छत्तीसगढ़ वन विभाग ने NMDC को Deposit-13 की Stage-II Forest Clearance रद्द करने के संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया। NMDC के अपने वार्षिक रिकॉर्ड में भी इसका उल्लेख है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—

जब ग्रामसभा की पुरानी कार्यवाही जांच में अमान्य पाई गई और वन स्वीकृति रद्द करने की प्रक्रिया शुरू हो गई, तो बाद में ऐसी कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई जिसके आधार पर वही परियोजना फिर वैध हो गई?

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार 2017 में Deposit-13 की 315.813 हेक्टेयर क्षेत्र की वन स्वीकृति दी गई थी। 2019 में स्थानीय विरोध के बाद परियोजना रुकी और 2020 में वन विभाग ने Stage-II स्वीकृति रद्द करने के लिए नोटिस दिया। NMDC ने बाद में उस नोटिस का जवाब दिया और 2022 में वन विभाग से स्वीकृति संबंधी स्थिति स्पष्ट करने का अनुरोध भी किया।

इसके बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया।

2 जून 2026 को MoEFCC ने Deposit-13 की Forest Clearance को NMDC-CMDC Limited के नाम ट्रांसफर किया। 13 जुलाई को संशोधित Compensatory Afforestation भूमि को लेकर सहमति और 15 जुलाई 2026 को राज्य वन विभाग द्वारा वन भूमि डायवर्जन आदेश जारी होने के बाद 23 जुलाई 2026 से प्रारंभिक खनन गतिविधियां शुरू होने की बात NMDC के नवीनतम रिकॉर्ड में दर्ज है।

लेकिन जनता के सामने अब भी ये सवाल पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं—

◆ 2019 की जांच में अमान्य पाई गई ग्रामसभा के बाद क्या नई ग्रामसभा हुई?

◆ अगर नई ग्रामसभा हुई तो उसका प्रस्ताव कब, कहां और किन ग्रामीणों की मौजूदगी में पारित हुआ?

◆ क्या नई ग्रामसभा की कार्यवाही सार्वजनिक की गई है?

◆ 6 मार्च 2020 के वन विभाग के कारण बताओ नोटिस का अंतिम निर्णय क्या हुआ?

◆ Stage-II Forest Clearance को रद्द करने की प्रक्रिया समाप्त कब और किस आदेश से हुई?

◆ 2 जून 2026 को Forest Clearance ट्रांसफर करने से पहले 2019 की विवादित ग्रामसभा का कानूनी निपटारा किस आदेश से हुआ?

◆ 15 जुलाई 2026 के वन भूमि डायवर्जन आदेश का आधार क्या है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या नंदराज पहाड़ पर खनन शुरू करने से पहले आदिवासी समुदाय के संवैधानिक और ग्रामसभा संबंधी अधिकारों की प्रक्रिया पूरी तरह दोबारा पूरी की गई?

नंदराज पहाड़ को स्थानीय आदिवासी समुदाय देवस्थल मानता है। 2019 के आंदोलन के दौरान ग्रामीणों ने इसे नंदराज देवता और पितोरमेटा देवी की आस्था से जुड़ा पवित्र पहाड़ बताया था।

ऐसे में सरकार और NMDC-CMDC को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि 2019 में जिस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे थे, 2026 में उसी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए कौन-कौन से नए वैधानिक कदम उठाए गए।

हसदेव से नंदराज तक—क्या सवाल पूछना भी अपराध हो जाएगा?

हसदेव में भी खनन और वन अधिकारों को लेकर विवाद जारी है और सितंबर 2026 में Tara coal block को लेकर फिर विरोध सामने आया है।

ऐसे माहौल में यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि क्या जल-जंगल-जमीन और आदिवासी अधिकारों के सवाल उठाने वाले आंदोलनों को सुरक्षा कानूनों के सहारे दबाया जा रहा है?

इसका जवाब सरकार को देना चाहिए।

क्योंकि विकास का सवाल अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र में विकास की कीमत यह नहीं हो सकती कि प्रभावित समुदाय से उसकी ग्रामसभा, उसकी आस्था और उसके सवाल पूछने का अधिकार ही छीन लिया जाए।

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