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SIR विवाद में नया मोड़: दो चुनाव आयुक्तों की चिट्ठी, कैबिनेट सचिव और लॉ कमीशन के बीच क्या है कड़ी?

नई दिल्ली। Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों के बाद अब मामला एक और गंभीर मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों पर कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें मतदाता नाम जोड़ने, नाम हटाने और प्रक्रिया से जुड़े फैसले शामिल बताए गए हैं।

पत्रकार रोहिणी सिंह ने अब दावा किया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से भेजी गई चिट्ठी को कैबिनेट सचिव ने लॉ कमीशन को फॉरवर्ड किया था। यदि यह दावा सही है तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि चुनाव आयोग के भीतर उठी आपत्तियां आखिर किस स्तर तक पहुंचीं और उन पर आगे क्या कार्रवाई हुई।

इसी बीच 26 सितंबर को चुनाव आयोग के SIR संबंधी फैसलों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक PIL भी दाखिल हुई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दो अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद कुछ फैसले लिए गए।

13 करोड़ नाम हटने का सवाल

SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची से हटाए गए नाम अंतिम रूप से मताधिकार से बाहर हो गए हैं, ऐसा मानना सही नहीं होगा; दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के बाद नाम वापस जुड़ भी सकते हैं।

उत्तर प्रदेश इसका एक बड़ा उदाहरण है। वहां अंतिम SIR सूची में ड्राफ्ट सूची की तुलना में 84.28 लाख से अधिक मतदाता बढ़े और कुल मतदाता संख्या 13.39 करोड़ हो गई।

यही वजह है कि अब सबसे बड़ा सवाल प्रक्रिया पर है—अगर बड़ी संख्या में नाम बाद में वापस जोड़े जाते हैं, तो इतनी बड़ी संख्या में नाम पहले ड्राफ्ट सूची से बाहर क्यों हुई? क्या प्रक्रिया में ऐसी खामियां थीं जिनसे वास्तविक मतदाताओं के नाम भी प्रभावित हुए?

सुप्रीम कोर्ट के सामने भी गंभीर सवाल

SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले से कानूनी बहस चल रही है और अब CEC के खिलाफ दाखिल नई PIL ने विवाद को और बढ़ा दिया है। याचिका में SIR से जुड़े फैसलों की वैधता और लगभग 13 करोड़ नाम हटने की जांच की मांग भी की गई है।

इस पूरे विवाद में अब निगाहें इस बात पर हैं कि चुनाव आयोग के दोनों आयुक्तों की कथित आपत्तियों, कैबिनेट सचिव को भेजी गई चिट्ठी और लॉ कमीशन तक पहुंची जानकारी का आगे क्या हुआ।

विपक्ष की ओर से इन घटनाओं को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी SIR के जरिए 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के अधिकार प्रभावित होने का आरोप लगाया है। हालांकि ये राजनीतिक आरोप हैं और चुनाव आयोग ने आयोग के निर्णयों को लेकर अलग रुख रखा है।

अब सबसे अहम सवाल यही है—

क्या SIR के दौरान दर्ज आपत्तियों और हटाए गए नामों की स्वतंत्र जांच होगी?

और यदि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़े जाते हैं, तो फिर यह भी पूछा जाएगा कि उन्हें पहली बार सूची से बाहर करने की वजह क्या थी?

आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के स्तर पर होने वाली कार्रवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।

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