वोटर को नागरिकता नहीं, अब वोटर होने का सबूत देना होगा?
SIR की ‘डेटा मशीन’ में चुनाव आयुक्त से लेकर आम मतदाता तक फंसे—13 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट से बाहर, दिल्ली में 33 लाख से अधिक नोटिस; 26 सितंबर को आयोग ने खुद बदली प्रक्रिया
भूमकाल समाचार | नई दिल्ली
जिस चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए, उसी आयोग की SIR प्रक्रिया अब एक बड़े सवाल के सामने खड़ी है—क्या डेटा को नागरिक से ऊपर रख दिया गया है?
दिल्ली की SIR सूची में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू का नाम “self-name mismatch” के कारण नोटिस वाली सूची में आया। इसका अर्थ नागरिकता पर सवाल उठना नहीं था, बल्कि पुराने और वर्तमान रिकॉर्ड के बीच नाम के मेल में विसंगति थी। बाद में उनके दस्तावेजों का सत्यापन हुआ और दिल्ली कैंट के निर्वाचन अधिकारी ने उनकी प्रविष्टि को अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए वैलिडेट कर दिया।
लेकिन सवाल संधू का नाम जुड़ जाने से खत्म नहीं होता।
सवाल यह है कि अगर एक मौजूदा चुनाव आयुक्त का रिकॉर्ड भी केंद्रीय डेटा-मिलान में ‘मिसमैच’ हो सकता है, तो उस आम मतदाता का क्या होगा जिसके पास पुराने रिकॉर्ड तक पहुंच ही नहीं है?
दिल्ली में 31 लाख से ज्यादा मतदाताओं को SIR के दौरान नोटिस जारी किए गए हैं। 33.13 लाख नोटिसों में नाम, माता-पिता के नाम, उम्र और पुराने रिकॉर्ड से मैपिंग जैसी विसंगतियां सामने आईं।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’—गलती छोटी, असर कितना बड़ा?
“Logical discrepancy” सुनने में तकनीकी शब्द है।
लेकिन लोकतंत्र में किसी नागरिक के नाम के आगे लगा एक छोटा-सा डेटा फ्लैग उसके मतदान के अधिकार पर बड़ा प्रशासनिक बोझ डाल सकता है।
दिल्ली के मंगोलपुरी में नागरिक संगठनों द्वारा किए गए एक सार्वजनिक ऑडिट में लगभग 9,600 मतदाताओं वाले क्षेत्र में हजारों नामों को ASDD—Absent, Shifted, Dead या Duplicate—श्रेणियों में पाया गया। ऑडिट में ऐसे लोगों के मामले सामने आए जो उसी पते पर रह रहे थे, लेकिन रिकॉर्ड में अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत बताए गए थे।
यानी सवाल केवल यह नहीं है कि डेटाबेस में गलती हुई या नहीं।
सवाल यह है कि डेटाबेस की गलती साबित करने का बोझ किस पर पड़ा?
‘मृत’ कौन हुआ—मतदाता या रिकॉर्ड?
मंगोलपुरी की जनसुनवाई में कांताप्रसाद का मामला सामने आया। 36 वर्षीय व्यक्ति ने पाया कि SIR ड्राफ्ट में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था, जबकि वे उसी पते पर रह रहे थे।
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा खतरा यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज गलती पहले नागरिक को संदिग्ध बनाती है और फिर नागरिक को अपनी ही मौजूदगी साबित करनी पड़ती है।
जिंदा आदमी को यह साबित करने के लिए कागज क्यों ढोने पड़ें कि वह जिंदा है?
BLO घर जाएगा—लेकिन यह तो नियम पहले से था
26 सितंबर को चुनाव आयोग ने घोषणा की कि जिन लोगों को SIR में “unmapped” या “logical discrepancy” के कारण नोटिस मिला है, उनके घर BLO जाएगा, दस्तावेज जुटाएगा और उन्हें ECINet पर अपलोड करेगा। सामान्यतः ऐसे मतदाताओं को ERO/AERO कार्यालय में बुलाने की जरूरत नहीं होगी।
लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण सवाल है।
बिहार SIR के दौरान चुनाव आयोग ने खुद 4 जुलाई 2025 को कहा था कि BLO हर घर में तीन बार तक जाएगा। आयोग के आधिकारिक प्रेस नोट में लगभग 1.5 करोड़ घरों की पहली यात्रा पूरी होने और तीन दौर की यात्राओं का उल्लेख था।
तो अगर घर-घर सत्यापन पहले से प्रक्रिया का हिस्सा था, फिर आज उसी को सुधारात्मक उपाय के रूप में क्यों घोषित करना पड़ा?
क्या समस्या नियम में थी या उसके जमीन पर लागू होने में?
यही असली जांच का सवाल है।
13 करोड़ नाम—लेकिन हर नाम ‘फर्जी’ नहीं
SIR के अब तक के चरणों में 30 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के ड्राफ्ट रोल से 13 करोड़ से ज्यादा नाम बाहर हुए हैं। यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि 13 करोड़ पात्र मतदाताओं को गलत तरीके से हटाया गया—इनमें मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और डुप्लीकेट प्रविष्टियां भी शामिल हो सकती हैं।
लेकिन यहीं से एक और गंभीर पत्रकारिता का सवाल पैदा होता है—
इन 13 करोड़ में कितने वास्तविक पात्र मतदाता थे? कितनों का रिकॉर्ड गलत फ्लैग हुआ? कितने वापस जोड़े गए? कितनों ने दावा ही नहीं किया?
जब तक चुनाव आयोग राज्यवार और श्रेणीवार पूरा डेटा सार्वजनिक नहीं करता, तब तक केवल कुल डिलीशन का आंकड़ा किसी निष्कर्ष के लिए पर्याप्त नहीं है।
बंगाल ने दूसरा सवाल खड़ा कर दिया
पश्चिम बंगाल में SIR के बाद अपीलों का आंकड़ा इस पूरी बहस को और गंभीर बनाता है।
चुनाव आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 1,26,194 तय अपीलों में 1,13,943 लोगों के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने का फैसला हुआ—लगभग 93 प्रतिशत। 8,649 अपीलें खारिज हुईं।
लेकिन असली संख्या यहां भी लंबित मामलों में छिपी है।
38 लाख से अधिक अपीलें दाखिल हुईं और 37 लाख से ज्यादा अभी लंबित बताई गईं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से अपीलीय ट्रिब्यूनलों की संख्या बढ़ाने की मांग भी की है।
और जिन लोगों के नाम बाद में बहाल हुए, उनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनका नाम चुनाव के समय उपलब्ध नहीं था।
यानी—
वोट वापस आया, लेकिन चुनाव गुजर चुका था।
Form 6 था, लेकिन सवाल समय का है
नाम छूट जाने पर Form 6 के जरिए नाम शामिल कराने की व्यवस्था मौजूद है। दिल्ली के CEO की वेबसाइट भी स्पष्ट रूप से बताती है कि ड्राफ्ट रोल में नाम नहीं मिलने वाला पात्र व्यक्ति दावा-अवधि में Form 6 के जरिए आवेदन कर सकता है।
लेकिन लोकतंत्र में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “आप बाद में अपना नाम जुड़वा सकते हैं।”
मतदान का अधिकार ऐसा अधिकार है जिसका मूल्य चुनाव के दिन है।
अगर नाम चुनाव के बाद वापस जुड़ता है तो प्रशासनिक रिकॉर्ड सुधर सकता है, लेकिन उस नागरिक का छूटा हुआ मतदान वापस नहीं आता।
सबसे कमजोर कौन?
घर बदलने वाली महिलाएं।
गांव से शहर आने वाले मजदूर।
किराए के मकान में रहने वाले युवा।
बुजुर्ग।
बेघर लोग।
रात के आश्रय में रहने वाले नागरिक।
और वे लोग जिनके परिवार ने वर्षों पहले अपना गांव, जिला या राज्य बदल दिया।
26 सितंबर को खुद चुनाव आयोग ने कहा कि रात के आश्रय, मजदूर, गरीब और बेघर लोगों के लिए विशेष हेल्प डेस्क और कैंप बनाए जाएं।
सवाल फिर वही—
अगर व्यवस्था पहले से सबके लिए सहज थी, तो इन विशेष व्यवस्थाओं की जरूरत क्यों पड़ी?
सबसे बड़ा सवाल: डेटा का मालिक कौन?
SIR में डेटा तैयार होता है।
डेटा का मिलान होता है।
विसंगति चिन्हित होती है।
नोटिस जारी होता है।
दस्तावेज मांगे जाते हैं।
ERO फैसला करता है।
फिर अपील होती है।
यानी नागरिक और उसके वोट के बीच एक लंबी प्रशासनिक सीढ़ी खड़ी हो जाती है।
यही कारण है कि 26 सितंबर का एक और फैसला महत्वपूर्ण है।
चुनाव आयोग ने कहा कि ECINet की समीक्षा के लिए वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त की अध्यक्षता में एक समिति बनेगी, जिसमें IIT/IIIT का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल होगा। समिति यह देखेगी कि प्रणाली कानून और नियमों के अनुरूप काम कर रही है या नहीं।
यह किसी गलती की स्वीकारोक्ति है—ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।
लेकिन यह जरूर दिखाता है कि डेटा-आधारित चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच और पारदर्शिता अब खुद एक सार्वजनिक मुद्दा बन चुकी है।
भूमकाल का सवाल
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को कई सुधारात्मक कदम उठाए हैं—घर पर BLO, विशेष कैंप, ऑनलाइन सुनवाई, ECINet की स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा और छूटे हुए मतदाताओं के लिए विशेष अभियान।
अब अगला सवाल इससे भी बड़ा है—
जिस सिस्टम ने किसी नागरिक को ‘unmapped’, ‘mismatch’, ‘dead’, ‘shifted’ या ‘duplicate’ के खाने में डाल दिया, क्या उसी सिस्टम की गलती साबित करने का पूरा बोझ भी उसी नागरिक पर होना चाहिए?
लोकतंत्र में मतदाता को सिस्टम पर भरोसा करना चाहिए—या सिस्टम को मतदाता के अधिकार की रक्षा करने के लिए खुद ज्यादा मेहनत करनी चाहिए?
SIR की असली परीक्षा साफ-सुथरी मतदाता सूची भर नहीं है।
असली परीक्षा यह है कि एक भी पात्र नागरिक सिर्फ डेटा की गलती के कारण वोट से बाहर न हो।
क्योंकि—
डेटाबेस गलत हो सकता है।
एल्गोरिदम गलत हो सकता है।
रिकॉर्ड गलत हो सकता है।
लेकिन लोकतंत्र में नागरिक को ‘गलत’ साबित करने से पहले सिस्टम को अपनी गलती की संभावना स्वीकार करनी ही होगी।
