ज्ञानेश कुमार की बेटी के मामले में ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ का आरोप
CJI सूर्यकांत को चिट्ठी, रोस्टर से हटकर सुनवाई और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग म्यूट किए जाने पर उठे गंभीर सवाल
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की IAS बेटी मेघा रूपम से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक मामले को लेकर न्यायपालिका में ‘विशेष व्यवहार’ के आरोपों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है।
द लॉयर्स एसोसिएशन ऑफ कंस्टीट्यूशन ने इस मामले को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को पत्र लिखकर सुनवाई की सूचीबद्धता, पीठ के आवंटन और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को म्यूट किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
एसोसिएशन का आरोप है कि प्रचलित रोस्टर व्यवस्था के अनुसार यह मामला उस पीठ के समक्ष स्पष्ट रूप से नहीं आता था, फिर भी इसे कथित तौर पर विशेष रूप से एक विशेष पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया।
पत्र में कहा गया है कि मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि याचिकाकर्ता एक लोक सेवक हैं और भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त की पुत्री हैं। एसोसिएशन के अनुसार मामले की कथित ‘आउट-ऑफ-टर्न’ सूचीबद्धता विशेष व्यवहार का संकेत देती है और न्यायिक व्यवस्था में गलत मिसाल कायम कर सकती है।
‘सार्वजनिक सुनवाई को म्यूट करना चिंता का विषय’
पत्र में सुप्रीम कोर्ट की खुली न्यायिक कार्यवाही और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया है। एसोसिएशन ने कहा कि न्यायालय की कार्यवाही सामान्यतः सार्वजनिक होती है और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वकील, पत्रकार तथा आम मुकदमेबाज भी कार्यवाही देख सकते हैं।
ऐसे में उस मामले की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को म्यूट किया जाना, जिसे मीडिया और जनता के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है, गंभीर चिंता का विषय है।
यह मामला उन छात्रों की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तारी से संबंधित बताया गया है, जिन्होंने मजदूरों के समर्थन में प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
संयोग या संस्थागत सवाल?
विवाद को और हवा तब मिली जब इंडियन एक्सप्रेस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े कथित विवादों पर रिपोर्ट प्रकाशित होने और इसी दिन इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हालांकि, इन घटनाओं के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध का निष्कर्ष निकालने के लिए स्वतंत्र और पुष्ट प्रमाण जरूरी होंगे।
फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि—
क्या सुप्रीम कोर्ट में मामलों की सूचीबद्धता और पीठ आवंटन की स्थापित प्रक्रिया से हटकर किसी संवेदनशील मामले को विशेष पीठ के सामने लाया गया?
क्या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को म्यूट करने का कोई स्पष्ट न्यायिक कारण था?
और सबसे अहम—
क्या किसी संवैधानिक पदाधिकारी के परिवार से जुड़े व्यक्ति के मामले में सामान्य न्यायिक प्रक्रिया और पारदर्शिता के समान मानक लागू हुए?
इन सवालों पर अब मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट की ओर से स्थिति स्पष्ट किए जाने की प्रतीक्षा है।
भूमकाल समाचार की नजर में मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता, रोस्टर व्यवस्था और समान व्यवहार के उस भरोसे का है जिस पर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता टिकी है।
