जशपुर में फिर मिला हाथी का शव: पीठ और सूंढ़ पर चोट के निशान, वन विभाग की निगरानी पर भी सवाल
दुलदुला रेंज की रिपोर्ट में ‘एक भी हाथी नहीं’, उसी इलाके में मिला करीब 15 वर्षीय नर हाथी का शव
जशपुर। छत्तीसगढ़ में हाथियों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह जिले जशपुर के दुलदुला वन परिक्षेत्र में करीब 15 वर्षीय नर हाथी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत मिला है। हल्दीमुंडा ढोढीआरा गांव के पास हाथी का शव मिलने की सूचना के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू की।
मृत हाथी की पीठ और सूंढ़ पर चोट के गंभीर निशान बताए जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि हाथी की मौत आखिर किन परिस्थितियों में हुई? क्या यह प्राकृतिक मौत है, किसी दुर्घटना का परिणाम है या इसके पीछे कोई अन्य वजह है? इसका स्पष्ट जवाब पोस्टमार्टम और विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएगा।
लेकिन इस घटना ने वन विभाग की निगरानी और रिपोर्टिंग व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया जा रहा है कि दुलदुला वन परिक्षेत्र की गुरुवार को जारी हाथियों की रिपोर्ट में क्षेत्र में एक भी हाथी मौजूद नहीं होने की जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद उसी रेंज में हाथी का शव मिलना वन विभाग की निगरानी प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। यदि किसी क्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी की नियमित निगरानी हो रही है तो फिर उसी क्षेत्र में एक वयस्क नर हाथी की मौजूदगी विभाग की रिपोर्ट से कैसे गायब रही?
विधानसभा में सरकार ने खुद माना—26 महीनों में 38 हाथियों की मौत
छत्तीसगढ़ विधानसभा में मार्च 2026 में वन मंत्री केदार कश्यप ने बताया था कि दिसंबर 2023 से जनवरी 2026 के बीच राज्य में 38 हाथियों की मौत हुई। इनमें 14 मौतें करंट लगने और 10 डूबने से बताई गई थीं।
यानी हाथियों की मौत कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं है। यह लगातार सामने आती ऐसी घटनाओं की श्रृंखला है, जिसके पीछे वन्यजीवों के सुरक्षित रहवास, जंगलों के बदलते स्वरूप, मानव-हाथी संघर्ष और निगरानी व्यवस्था जैसे कई गंभीर प्रश्न जुड़े हुए हैं।
रायगढ़ में छह महीने में 10 हाथियों की मौत
रायगढ़ से सामने आए आंकड़े इस संकट की गंभीरता को और बढ़ाते हैं। जनवरी से जून 2026 के बीच रायगढ़ जिले में 10 हाथियों की मौत की रिपोर्ट सामने आई, जिनमें 9 शावक बताए गए। जून तक विभिन्न घटनाओं में हाथी शावकों की लगातार मौत की खबरें सामने आती रही हैं।
कहीं शावक नदी में डूबे, कहीं दलदल में फंसे और कहीं अन्य परिस्थितियों में उनकी मौत हुई। मई 2026 तक रायगढ़ में पांच महीनों के भीतर आठ हाथी शावकों की मौत की रिपोर्ट भी सामने आ चुकी थी।
यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि एक ही क्षेत्र में लगातार हाथियों और खासकर शावकों की मौत हो रही है, तो क्या वन विभाग की मौजूदा निगरानी और संरक्षण व्यवस्था पर्याप्त है?
हाथियों का बदलता रास्ता, बदलता जंगल और बढ़ता संकट
छत्तीसगढ़ के हाथियों के लिए जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि उनका पारंपरिक रहवास और आवागमन का प्राकृतिक गलियारा है। जंगलों के बदलते भू-दृश्य, खनन और अन्य मानवीय गतिविधियों के बीच हाथियों के पारंपरिक आवागमन पर दबाव बढ़ने की चिंता लगातार व्यक्त की जाती रही है।
इसी बदलते परिदृश्य के बीच सरगुजा क्षेत्र में रहने वाले हाथियों के बस्तर तक पहुंचने की घटनाएं भी सामने आई हैं। यह केवल हाथियों के स्थान बदलने की कहानी नहीं, बल्कि उनके पारंपरिक आवास और कॉरिडोर में हो रहे बदलाव का संकेत भी हो सकती है।
गणेश की पूजा के बीच गजराजों की मौत का सवाल
इन दिनों देश और छत्तीसगढ़ में भगवान गणेश की पूजा हो रही है। भारतीय परंपरा में हाथी को भगवान गणेश के स्वरूप से जोड़ा जाता है।
लेकिन विडंबना देखिए—एक तरफ हम गणेश की पूजा कर रहे हैं और दूसरी तरफ हमारे जंगलों में गजराज लगातार मर रहे हैं।
सवाल किसी एक हाथी की मौत का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ अपने जंगलों में हाथियों के लिए सुरक्षित रहवास और सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित कर पा रहा है?
सवाल यह भी है कि यदि वन विभाग की रिपोर्ट में किसी क्षेत्र में हाथियों की संख्या शून्य बताई जाती है और उसी क्षेत्र में हाथी मृत मिलता है, तो निगरानी और रिपोर्टिंग की व्यवस्था की जवाबदेही किसकी है?
हाथी केवल वन्यजीव नहीं हैं। वे जंगल के पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
सरकार को हर हाथी की मौत को महज एक आंकड़े के रूप में दर्ज करने के बजाय उसके कारण की पारदर्शी जांच, जिम्मेदारी तय करने और हाथियों के सुरक्षित रहवास व कॉरिडोर की रक्षा पर गंभीरता से काम करना होगा।
