भाजपा का ‘मार्गदर्शक मंडल’—मार्गदर्शन का मंच या केवल प्रतीकात्मक व्यवस्था?

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के बाद अपने वरिष्ठ नेताओं के लिए “मार्गदर्शक मंडल” की अवधारणा सामने रखी थी। इसमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी तथा अटल बिहारी वाजपेयी (जीवनकाल में) जैसे वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया गया।
वर्षों बीत जाने के बाद भी एक बड़ा सवाल अनुत्तरित है—क्या इस मंडल की नियमित बैठकें हुईं? इसने अब तक कौन-कौन से सुझाव दिए? उन सुझावों में से किन पर अमल हुआ? सार्वजनिक रूप से इसकी बैठकों, सिफारिशों और उनके क्रियान्वयन का कोई विस्तृत आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
इसके साथ ही एक और प्रश्न भी लगातार उठता रहा है। 2014 के बाद भाजपा में 75 वर्ष की आयु को लेकर एक अनौपचारिक राजनीतिक मानदंड की व्यापक चर्चा रही, जिसके बाद कई वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय संगठनात्मक भूमिका से हटाकर मार्गदर्शक मंडल में रखा गया। हालांकि, पार्टी ने इस संबंध में कोई औपचारिक लिखित नियम सार्वजनिक नहीं किया।
बाद के वर्षों में यह बहस भी सामने आई कि यदि 75 वर्ष का यह मानदंड अपनाया गया था, तो क्या उसका पालन सभी नेताओं पर समान रूप से हुआ? क्योंकि कई वरिष्ठ नेता 75 वर्ष से अधिक आयु में भी सार्वजनिक अथवा संवैधानिक पदों पर बने रहे या महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते रहे। इस पर भी कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में वरिष्ठ नेताओं का अनुभव महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यदि कोई “मार्गदर्शक मंडल” बनाया गया है, तो उसकी भूमिका, बैठकों और सुझावों के संबंध में पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है।
आज भी कुछ सवाल जवाब मांगते हैं—
क्या मार्गदर्शक मंडल आज सक्रिय है?
इसकी अब तक कितनी बैठकें हुईं?
इसने कौन-कौन सी सलाह दी?
किन सलाहों पर अमल हुआ?
75 वर्ष के मानदंड का आधार क्या था और क्या उसका पालन सभी पर समान रूप से हुआ ?
