इतिहास की अदालत कभी बंद नहीं होती: हर सत्ता के लिए अतीत की चेतावनी

भूमकाल समाचार | संपादकीय।
सत्ता आती है, सत्ता चली जाती है। लेकिन इतिहास कहीं नहीं जाता। वह हर निर्णय, हर आदेश, हर अन्याय और हर जनहितकारी कार्य का लेखा-जोखा अपने पन्नों में दर्ज करता रहता है। इसलिए इतिहास की अदालत किसी चुनाव, किसी बहुमत या किसी प्रचार अभियान से प्रभावित नहीं होती। उसका फैसला समय देता है।
विश्व इतिहास ऐसे अनेक शासकों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपने समय में स्वयं को अजेय समझा। उनके पास विशाल सैन्य शक्ति थी, प्रशासन था, प्रचार तंत्र था और विरोध को दबाने की क्षमता भी। लेकिन समय बीतने के बाद उनकी पहचान उनके भाषणों से नहीं, बल्कि उनके शासन के मानवीय परिणामों से तय हुई।
जब सत्ता आलोचना को शत्रु समझने लगती है, असहमति को अपराध मानने लगती है, मीडिया की स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ता है, नागरिक अधिकार सीमित होने लगते हैं और कानून का भय केवल विरोधियों तक सीमित दिखाई देने लगता है, तब इतिहास चेतावनी देता है कि लोकतंत्र का स्वास्थ्य कमजोर हो रहा है।
इतिहास यह भी बताता है कि जो सरकारें जनता की पीड़ा सुनने के बजाय केवल अपनी उपलब्धियों का प्रचार करती रहीं, वे अंततः जनता के विश्वास से दूर होती चली गईं। भय के सहारे शासन कुछ समय तक चल सकता है, लेकिन सम्मान और विश्वास के बिना स्थायी नहीं होता।
लोकतंत्र की असली ताकत चुनाव जीतना नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता, प्रशासन की जवाबदेही, मीडिया की आज़ादी और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। यही कसौटियाँ इतिहास में किसी भी शासन का मूल्यांकन करती हैं।
आज सत्ता में जो भी हैं केंद्र में हों या राज्य में—उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि इतिहास प्रचार नहीं पढ़ता, वह परिणाम पढ़ता है। वह भाषण नहीं, नागरिकों का जीवन देखता है। वह यह दर्ज करता है कि सत्ता ने सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार किया, असहमति को कितना सम्मान दिया और न्याय को कितना निष्पक्ष रखा।
हर दौर के शासकों के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि सत्ता क्षणिक है, लेकिन उसके निर्णयों के परिणाम पीढ़ियों तक याद रखे जाते हैं। इसलिए इतिहास से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उससे सीखना चाहिए।
इतिहास की अदालत में अंतिम निर्णय जनता की स्मृति और समय की कसौटी मिलकर लिखते हैं। वही निर्णय सबसे स्थायी होता है।
