रायपुर में पेन का भी इलाज होता थ “पेन हॉस्पिटल” की अनसुनी कहानीl

क्या आपने कभी “पेन हॉस्पिटल” देखा है…?
जी हाँ… रायपुर में कभी पेन का भी अस्पताल हुआ करता था। आज की पीढ़ी शायद यकीन ही नहीं करेगी कि जिस पेन को आज लोग रिफिल खत्म होते ही फेंक देते हैं, कभी उसी पेन का इलाज करवाया जाता था। उसका ऑपरेशन होता था, उसके पुर्जे बदले जाते थे और फिर वह सालों तक चलती रहती थी।
कोतवाली चौक पर पीपल के विशाल पेड़ के नीचे, गेलीचंद की मशहूर कचौड़ी की दुकान के सामने झापक परिवार का प्रसिद्ध “पेन हॉस्पिटल” हुआ करता था। उस दौर में विद्यार्थियों से लेकर बाबुओं और अधिकारियों तक, हर किसी की खराब पेन यहीं ठीक होती थी।
वह फाउंटेन पेन का जमाना था। स्कूलों में डॉट पेन लाने की मनाही थी। हर बच्चे के हाथ में फाउंटेन पेन और जेब में स्याही के दाग मिलना आम बात थी।
तब पेन में रिफिल नहीं बदली जाती थी। उसे खोलकर उसमें स्याही भरी जाती थी। कोतवाली से कालीबाड़ी जाने वाली सड़क पर रमेश स्टेशनरी की छोटी-सी दुकान में सुबह से रात तक पेन में स्याही भरने वालों की लाइन लगी रहती थी। एक पेन में स्याही भरने का मेहनताना था सिर्फ पांच पैसे।
अमीर लोग कैमल इंक की पूरी दवात खरीद लेते थे, लेकिन अधिकांश लोग पांच पैसे की स्याही की गोली या पाउडर खरीदकर घर में शीशी में घोलते थे। चाहे जितनी सावधानी बरतो… हाथ, उंगलियां और कभी-कभी कपड़े भी नीले जरूर हो जाते थे। उस समय घर में स्याही बनने की यही पहचान थी।
मेरे पास आज भी उस दौर की एक फाउंटेन पेन और स्याही की दवात सुरक्षित रखी हुई है। उन्हें देखते ही बचपन की पूरी दुनिया आँखों के सामने घूम जाती है।
अब बात उस पेन हॉस्पिटल की करते हैं।
अगर निब खराब हो गई, तो पहले उसे पत्थर पर घिसकर या ब्लेड से साफ करके ठीक किया जाता। नहीं बनी तो चार आने में नई निब लग जाती।
अगर पेन “स्याही पोंकने” लगता, यानी जेब और कॉपी और हाथ नीली करने लगता, तो पहले उसकी रीड पर वैसलीन लगाकर देखा जाता। जरूरत पड़ने पर रीड भी बदल दी जाती।
ढक्कन खो गया… नया मिल जाएगा।
क्लिप टूट गई… नई लगा दी जाएगी।
जीभ खराब हो गई… वह भी बदल जाएगी।
कुल मिलाकर पेन का कोई भी पुर्जा खराब हो जाए, उसका इलाज यहीं होता था। सच पूछिए तो यह दुकान नहीं, सचमुच पेन का अस्पताल थी।
यही नहीं…
रूपकला कपड़े की दुकान के सामने एक और दुकान थी, जहां पेन पर आपका नाम इतनी खूबसूरती से लिखा जाता था कि लगता था कंपनी ने ही छापा हो।
और अब सबसे हैरान करने वाली बात…
क्या आप जानते हैं कि उस समय रायपुर में पेन भी गिरवी रखी जाती थी।
सदर बाजार के एक प्रसिद्ध गिरवी व्यापारी के यहां लोग जरूरत पड़ने पर सिर्फ गहने या सामान ही नहीं, बल्कि अपनी फाउंटेन पेन और छाता और टेबल फैन, टेबली घड़ी, हैंडवॉच तक गिरवी रख देते थे।
आज की पीढ़ी के लिए यह सब किसी कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन यही हमारा रायपुर था जहां चीजों को फेंका नहीं जाता था, उन्हें संभाला जाता था, सुधारा जाता था और वर्षों तक सहेजकर रखा जाता था।
अब आपकी बारी
क्या आपने भी फाउंटेन पेन से लिखा है ?
क्या आपका पेन भी कभी “स्याही पोंकता” था ?
क्या आपको रायपुर का यह मशहूर पेन हॉस्पिटल याद है ?
और बताइए… क्या आपके घर में भी कभी पांच पैसे वाली स्याही की गोली घोली जाती थी ?
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प्रदेश के वरिष्ठ फोटोग्राफर गोकुल सोनी का स्मृति वृतांत
