छत्तीसगढ़

जब तीजन बाई महाभारत के पात्रों को एक-एक कर विदा करती थी

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आज संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा अंतरराष्ट्रीय पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई जी को सांगीतिक श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए संस्कृति विभाग परिसर के मुक्ताकाशी मंच पर एक गरिमामय आयोजन किया गया। प्रदेश के अनेक प्रबुद्धजन, साहित्यकार, कलाकार और संस्कृति प्रेमी वहां उपस्थित हुए तथा छत्तीसगढ़ की इस अमूल्य लोक-सांस्कृतिक धरोहर को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।

डॉ. तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा की आवाज़ थीं। उन्होंने अपनी अद्भुत पंडवानी गायकी से इस माटी की सुगंध को देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया तक पहुंचाया। जीवन भर सामाजिक उपेक्षा, संघर्ष और कठिनाइयों का सामना करते हुए भी उन्होंने कभी अपनी साधना का मार्ग नहीं छोड़ा। यही कारण है कि एक छोटे से गाँव की बेटी विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ की पहचान बन गई।

कल छत्तीसगढ़ समाचार पत्र के यूट्यूब चैनल को दिये गये साक्षातकार में संस्कृति के अच्छे ज्ञाता श्री राहुल सिंह जी ने तीजन बाई के बारे में एक ऐसी बात बताई, जिसे सुनकर मैं देर तक सोचता रहा।

उन्होंने बताया कि जब तीजन बाई अपनी प्रस्तुति समाप्त कर लेती थीं, तो कुछ समय के लिए एकदम शांत होकर बैठ जाती थीं। बहुत से लोगों को लगता था कि वे थक गई हैं, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी।

राहुल जी ने कहा कि जब तीजन बाई मंच पर पंडवानी गाती थीं, तब महाभारत के अनेक पात्र उनके भीतर जीवंत हो उठते थे। कभी वे भीष्म बन जाती थीं, कभी कर्ण, कभी अर्जुन, कभी द्रौपदी, तो कभी श्रीकृष्ण। एक ही शरीर, एक ही स्वर और एक ही मंच पर पूरा महाभारत साकार हो जाता था।

और जब प्रस्तुति समाप्त होती थी, तब वे कुछ देर शांत बैठकर उन सभी पात्रों को अपने भीतर से एक-एक कर विदा करती थीं। इसलिए वे तुरंत किसी से बात नहीं करती थीं। यह थकान का मौन नहीं था, बल्कि एक साधक की साधना का मौन था।

यह बात सुनकर मुझे लगा कि शायद इसी कारण उनकी पंडवानी केवल सुनी नहीं जाती थी, बल्कि महसूस की जाती थी। दर्शक केवल कहानी नहीं सुनते थे, वे महाभारत को अपनी आंखों के सामने घटित होते हुए देखते थे। यह अभिनय नहीं था, यह साधना की वह ऊँचाई थी जहां कलाकार स्वयं पात्र बन जाता है।

मैं भी कई बार सोचता हूँ कि आखिर एक अकेला व्यक्ति मंच पर इतने सारे पात्रों को इतनी सहजता और जीवंतता के साथ कैसे जी सकता है। शायद यही वह अलौकिक कला थी, जिसने तीजन बाई को तीजन बाई बनाया। ऐसी साधना, ऐसी तन्मयता और ऐसी आत्मिक शक्ति विरले कलाकारों को ही प्राप्त होती है।
आज तीजन बाई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनके तंबूरे की तान, उनके चेहरे के भाव और उनके द्वारा जीवंत किए गए महाभारत के पात्र हमेशा हमारे हृदय में जीवित रहेंगे। कलाकार शरीर से विदा हो सकता है, लेकिन उसकी साधना कभी नहीं मरती।

छत्तीसगढ़ की माटी की महान लोकसाधिका, पंडवानी की अप्रतिम सम्राज्ञी, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई जी को शत-शत नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

                                                                     गोकुल सोनी

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