पत्रकार और दो जून की रोटी का संघर्ष?

लेख – राजेन्द्र सिंह जादौन
कहते हैं पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है। यह बात सुनकर अक्सर पत्रकार मुस्कुरा देता है, क्योंकि उसे अच्छी तरह पता है कि वह स्तंभ तो है, लेकिन उस पर छत किसी और की टिकी हुई है। उसकी अपनी छत कब टपकने लगे, इसका कोई भरोसा नहीं।
देश में पत्रकारिता का इतिहास गौरवशाली बताया जाता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर सामाजिक आंदोलनों तक पत्रकारों ने कलम की ताकत से साम्राज्य हिला दिए। लेकिन आज का पत्रकार सुबह घर से निकलते समय यह सोचकर निकलता है कि शाम को खबर पहले भेजे या घर के लिए सब्जी ले जाए।
पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिसमें आदमी दूसरों की समस्याएं हल करने के लिए दिन-रात भागता है, लेकिन अपनी समस्या बताने में शर्माता है। वह जिले के कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री तक से सवाल पूछ सकता है, लेकिन महीने के अंत में किराने वाले से उधार मांगते समय उसकी आवाज धीमी हो जाती है।
आज का पत्रकार बड़ी विचित्र स्थिति में है। वह करोड़ों के घोटाले उजागर करता है, लेकिन उसके अपने खाते में अक्सर चार अंकों का बैलेंस भी नहीं होता। वह उद्योगपतियों की सफलता की कहानी लिखता है, लेकिन अपनी मोटरसाइकिल में पेट्रोल डलवाने के लिए मोबाइल बैंकिंग का बैलेंस चेक करता रहता है।
मजेदार बात यह है कि समाज पत्रकार को बहुत शक्तिशाली मानता है। मोहल्ले में कोई विवाद हो जाए तो लोग कहते हैं, “अरे भाई, पत्रकार हैं, सब करवा देंगे।” लेकिन वही पत्रकार बिजली का बिल जमा करने की आखिरी तारीख निकल जाने पर लाइन में खड़ा दिखाई देता है।
पत्रकार का जीवन भी बड़ा रोचक है। सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस, दोपहर में धरना प्रदर्शन, शाम को दुर्घटना कवरेज और रात को खबर लिखना। इन सबके बीच पत्नी का फोन आता है “घर आते समय आटा लेते आना।” पत्रकार जवाब देता है “पहले खबर भेज लूं, फिर देखता हूं।”
असल में पत्रकारिता में दो तरह के संघर्ष चलते हैं। एक खबर पाने का और दूसरा घर चलाने का। पहले संघर्ष में वह प्रशासन, राजनीति और व्यवस्था से लड़ता है। दूसरे संघर्ष में महंगाई, स्कूल फीस, गैस सिलेंडर और राशन की दुकान से।
कई संस्थानों में पत्रकारों की हालत ऐसी है कि उनसे उम्मीद की जाती है कि वे कैमरा भी चलाएं, वीडियो भी बनाएं, एंकरिंग भी करें, सोशल मीडिया भी संभालें और विज्ञापन भी लाएं। यानी एक व्यक्ति में पूरा मीडिया हाउस समाहित होना चाहिए। वेतन की बात करो तो जवाब मिलता है “आपको पहचान मिल रही है न!”
यह पहचान भी बड़ी अद्भुत चीज है। बाजार में दुकानदार कहता है “अरे आप तो पत्रकार हैं!” लेकिन जब सामान खरीदने की बारी आती है तो पहचान नहीं, नकद भुगतान ही स्वीकार किया जाता है।
पत्रकार की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह रोज दूसरों की सफलता की खबरें लिखता है। किसी का सम्मान समारोह, किसी का पुरस्कार, किसी की पदोन्नति, किसी का नया बंगला। लेकिन जब अपनी जिंदगी की खबर लिखने बैठे तो शीर्षक कुछ ऐसा बनता है “पत्रकार ने फिर एक महीने की किस्त समय पर भरने के लिए संघर्ष किया।”
फिर भी पत्रकारिता चल रही है। इसलिए नहीं कि इसमें अपार धन है, बल्कि इसलिए कि इसमें अब भी कुछ लोग जुनून से जुड़े हुए हैं। वे मानते हैं कि खबर सिर्फ व्यवसाय नहीं, समाज के प्रति जिम्मेदारी भी है। यही कारण है कि तमाम आर्थिक कठिनाइयों, अनिश्चितताओं और उपेक्षाओं के बावजूद पत्रकार सुबह फिर कैमरा उठाता है, नोटबुक संभालता है और निकल पड़ता है।
शायद इसी उम्मीद में कि कभी लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को भी उतनी ही मजबूती मिलेगी, जितनी मजबूती से यह दूसरों के लिए खड़ा रहता है। और तब तक पत्रकार का संघर्ष जारी रहेगा एक हाथ में कलम, दूसरे हाथ में दो जून की रोटी की चिंता लिए हुए।
