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हौसला इतना बड़ा कि मौत का खौफ भी हार गया, बस्तर का वो ‘लौह पुरुष’ शिक्षा की गंगा बहा गया।

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​बस्तर की आबोहवा में जब मौत का सन्नाटा पसरा था और जंगलों से सिर्फ बारूद की गंध आती थी, तब एक युवा ‘तपस्वी’ ने अपनी आंखों में एक ऐसा सपना पाला, जिसे दुनिया ‘पागलपन’ कह रही थी। दंतेवाड़ा की जावंगा एजुकेशन सिटी महज पत्थरों और सीमेंट का ढांचा नहीं है, बल्कि यह उस अजेय साहस का स्मारक है, जिसने एके-47 की नली के सामने ‘कलम’ की ताकत को खड़ा कर दिया। ​
ओपी चौधरी जानते थे कि इतना बड़ा परिवर्तन में कदम फुक फुक कर रखना होगा। इस लिए इस विजन को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने स्थानीय संवेदनाओं और अटूट भरोसे का एक मजबूत सेतु तैयार किया। उन्होंने स्थानीय आदिवासी नेता बोमड़ा राम कवासी जैसे जमीन से जुड़े व्यक्तित्वों को साथ लिया, ताकि इस मिशन को जन-जन का समर्थन मिल सके। साथ ही, शंकर गोयल सहित तमाम विश्वसनीय साथियों की एक ऐसी टीम खड़ी की, जिसने बाधाओं को चुनौती दी और बस्तर के दुर्गम अंचलों में विश्वास की नई पौध रोपी।

  • ​मौत की परछाई में ‘अभिमन्यु’ का संकल्प

​आज के दौर में विकास की बातें करना आसान है, लेकिन याद कीजिए वो खौफनाक रातें जब दंतेवाड़ा में सांस लेना भी किसी जोखिम से कम नहीं था। जहा सुरक्षा का घेरा भी डर को कम नहीं कर पाता था, वही दूसरी और एक युवा कलेक्टर अपनी गाड़ियों के काफिले बदल-बदल कर मौत को चकमा दे रहा था।

कलेक्टर ​बंगले के आलीशान बिस्तरों को ठुकरा कर, हाथ में लोड ऑटोमैटिक राइफल लिए छत पर जागते हुए रातें काटना… क्या यह कोई साधारण प्रशासनिक ड्यूटी थी? नहीं! यह एक ‘घातक साधना’ थी। हवा से हिलते पत्तों की सरसराहट में भी जब मौत की आहट सुनाई देती थी, तब वह शख्स जागता था..सिर्फ इसलिए ताकि बस्तर के वन-पुत्रों का आने वाला ‘कल’ सो न जाए।
​लोग कहते थे कि बारूद की इस धरती पर “शिक्षा का महल” बनाना नामुमकिन है। पर ओपी चौधरी वो शख्सियत हैं, जिनका विजन वहां से उड़ान भरता है जहाँ आम आदमी की सोच घुटने टेक देती है। वह ‘नारियल’ जैसा व्यक्तित्व—बाहर से प्रशासन की कड़क अनुशासनात्मक चट्टान, लेकिन भीतर से एक भावुक पिता जैसा कोमल हृदय, जो बस्तर के बच्चों के पैरों में चुभते कांटों को अपने सीने पर महसूस करता था।

​अगले चुनाव की नहीं, अगली पीढ़ी का ‘भागीरथ’

​राजनेताओं की भीड़ में अक्सर ‘अगले पांच साल’ की चिंता करने वाले मिलते हैं, लेकिन ओपी चौधरी जैसे विरले ही होते हैं जो ‘अगली पचास साल’ की नींव रखते हैं। वे हुकूमत करने नहीं, इतिहास बदलने आए थे। आज जब दंतेवाड़ा का कोई बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बनकर निकलता है, तो वह केवल एक डिग्री नहीं लेता, बल्कि वह उस ‘भागीरथ’ के संकल्प को सार्थक करता है जिसने अपनी रातों की नींद बेचकर उनके सपनों को जिंदा रखा था।

​ओपी चौधरी केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक ‘क्रांति’ का घोष हैं। सत्ता की ऊंचाइयों पर बैठकर भी जिनका मन आज भी दंतेवाड़ा की पगडंडियों में उन मासूमों की आंखों में अपना भविष्य तलाशता है, वही सच्चा जननायक है। लाख बदनाम करने की राजनैतिक साजिशें हों, लाख कोई लांछन लगाने का प्रयास करे, पर इतिहास गवाह है कि कारवां उन्हीं का आगे बढ़ता है जिनके विजन में स्पष्टता और इरादों में नेकदिली की फौलाद होती है।
​सलाम है उस ‘लौह पुरुष’ को, जिसने बस्तर की तकदीर का भूगोल ही बदल दिया!

दिनेश शर्मा

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