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झीरम में 13 साल बाद 10 दोषियों को फांसी, लेकिन बड़े सवाल अब भी बाकी

25 मई 2013 के नरसंहार में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व समेत 29 लोगों की हुई थी मौत; 28 आरोपी अब भी फरार, साजिश की पूरी जांच पर उठते रहे सवाल

जगदलपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे भयावह राजनीतिक हमलों में से एक झीरम घाटी हत्याकांड में 13 साल बाद अदालत ने 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। जगदलपुर स्थित एनआईए की विशेष अदालत ने 16 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। इससे पहले 5 सितंबर को अदालत ने सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया था।

25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा से लौट रहे काफिले पर बस्तर की झीरम घाटी में माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल, पूर्व मंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और कांग्रेस नेता उदय मुदलियार सहित कुल 29 लोगों की मौत हुई थी। इनमें सुरक्षाकर्मी भी शामिल थे। बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे।

यह हमला इसलिए भी असाधारण था क्योंकि इसमें तत्कालीन छत्तीसगढ़ कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा एक ही हमले में मारा गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हमले में बड़ी संख्या में माओवादी शामिल थे। एनआईए की चार्जशीट में 34 माओवादियों के खिलाफ आरोप लगाए गए थे, जबकि मामले में अभी भी 28 आरोपी फरार बताए जाते हैं।

10 को सजा, लेकिन क्या पूरी साजिश सामने आई?

अदालत का फैसला हमले में दोषी ठहराए गए 10 आरोपियों के संबंध में है। हालांकि झीरम कांड की जांच और कथित व्यापक आपराधिक साजिश को लेकर राजनीतिक और कानूनी स्तर पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

2013 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने एनआईए जांच के साथ न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। बाद में 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद एसआईटी गठित की गई और 2020 में एक अलग एफआईआर भी दर्ज हुई। एनआईए ने इस जांच को अपने हाथ में लेने की कोशिश की, लेकिन मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक गया और राज्य की जांच को आगे बढ़ने का रास्ता मिला।

न्यायिक आयोग की कार्यवाही और उसके कार्यक्षेत्र को लेकर भी वर्षों तक विवाद रहा। 2021 में आयोग ने रिपोर्ट सौंपी, लेकिन बाद में आयोग के दायरे में विस्तार किए जाने को भाजपा नेता धरमलाल कौशिक ने अदालत में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 2022 में संबंधित अधिसूचना पर रोक लगा दी और मामला अब भी न्यायिक प्रक्रिया में है।

क्या सिर्फ सजा से झीरम के सवाल खत्म हो जाएंगे?

झीरम कांड पर बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहा है कि हमले को अंजाम देने वालों की सजा के साथ-साथ उसके पीछे की पूरी साजिश, हमले की पूर्व तैयारी और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष और पूर्ण जांच हुई या नहीं।

कांग्रेस लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि एनआईए की जांच ने हमले के पीछे की कथित बड़ी साजिश की पूरी पड़ताल नहीं की। दूसरी ओर भाजपा ने इन आरोपों को राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगाया है। इन पर अंतिम निष्कर्ष अदालत के रिकॉर्ड और जांच की पूर्ण सामग्री के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

मामले में 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और करीब 13 वर्षों तक सुनवाई चली। रिपोर्टों के अनुसार मुकदमे में 294 सुनवाई हुईं। एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई, जबकि अन्य आरोपी फरार हैं। दोषियों के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील का रास्ता भी खुला है।

झीरम का घाव अभी भी बाकी

झीरम सिर्फ कांग्रेस नेताओं की हत्या का मामला नहीं था। यह एक लोकतांत्रिक राजनीतिक यात्रा पर हुआ ऐसा हमला था, जिसमें जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सुरक्षा कर्मियों की जान गई।

13 साल बाद 10 लोगों को मिली मृत्युदंड की सजा न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पड़ाव जरूर है, लेकिन झीरम से जुड़े सभी सवालों का जवाब तभी मिलेगा जब हमले की पूरी पृष्ठभूमि, आपराधिक साजिश, जिम्मेदार लोगों की भूमिका और सुरक्षा से जुड़े प्रत्येक पहलू का तथ्यात्मक रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से स्पष्ट हो।

झीरम के पीड़ित परिवारों और उस हमले से बचकर निकले लोगों के लिए न्याय का अर्थ केवल दोषियों को सजा मिलना नहीं, बल्कि यह जानना भी है कि 25 मई 2013 को आखिर झीरम में हुआ क्या था और इतने बड़े राजनीतिक नरसंहार को संभव बनाने वाली पूरी कड़ी क्या थी?

यही सवाल आज भी झीरम की घाटी से लोकतंत्र के सामने खड़ा है।

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