देशभक्ति के नारों से सावधान!

अगर उसने देशभक्ति की बात की, तो समझ जाना—शायद इस साल देश के दुश्मनों के साथ कोई बड़ा समझौता करने की तैयारी है।
अगर उसने सांप्रदायिक सौहार्द्र की बात की, तो समझ जाना—कहीं न कहीं बड़े दंगे-फसाद की जमीन तैयार की जा रही है।
अगर उसने गरीबों और किसानों की चिंता जताई, तो समझ जाना—किसी बड़े कॉरपोरेट के लिए उनकी जमीन, जंगल या संसाधनों पर अगला निशाना साधा जा रहा है।
अगर उसने पर्यावरण बचाने की बात की, तो समझ जाना—लाखों हेक्टेयर जंगल किसी उद्योगपति के हवाले करने की फाइल शायद तैयार हो रही है।
अगर उसने आदिवासियों के अधिकार और जल-जंगल-जमीन की बात की, तो समझ जाना—जल्द ही उनके जल, जंगल और जमीन पर कोई बड़ा फैसला आने वाला है।
अगर उसने महंगाई कम करने का वादा किया, तो समझ जाना—जेब पर एक और बोझ डालने की तैयारी हो सकती है।
अगर उसने आत्मनिर्भर भारत का नारा लगाया, तो समझ जाना—किसी विदेशी कंपनी या बड़े कारोबारी के लिए कोई बड़ा दरवाजा खुलने वाला है।
अगर उसने चीन के सामानों के बहिष्कार की बात की, तो समझ जाना—चीन के साथ कोई बहुत बड़ा कारोबारी सौदा पर्दे के पीछे आकार ले रहा है।

अगर उसने राष्ट्रहित का हवाला दिया, तो सवाल पूछिए—किसका राष्ट्रहित?
अगर उसने जनहित कहा, तो पूछिए—किस जनता का हित?
और अगर उसने बार-बार त्याग, बलिदान और देशभक्ति की दुहाई दी, तो लोकतंत्र का नागरिक होने के नाते सबसे पहले दस्तावेज मांगिए।
क्योंकि सत्ता के भाषणों में शब्द अक्सर घोषणा नहीं, संकेत होते हैं।
और लोकतंत्र में सबसे खतरनाक नागरिक वह नहीं जो सवाल पूछता है—
खतरनाक वह व्यवस्था है जो हर सवाल को देशद्रोह और हर असहमति को राष्ट्रविरोध बताने लगे।
देशभक्ति नारे में नहीं, फैसलों में दिखाई देती है।
राष्ट्रहित भाषण में नहीं, नीतियों के परिणाम में दिखाई देता है।
और लोकतंत्र तालियों से नहीं—सवालों से मजबूत होता है।
