क्या आस्था का अर्थ यह है कि कानून कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर चला जाए?
क्या आस्था का मतलब कानून से ऊपर होना है?
हर साल कांवड़ यात्रा आती है। हर साल लाखों श्रद्धालु शांतिपूर्वक यात्रा भी करते हैं। लेकिन हर साल ऐसी घटनाएँ भी सामने आती हैं, जिनमें सड़कें जाम होती हैं, वाहनों में तोड़फोड़ होती है, आम नागरिक परेशान होते हैं और कानून व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।
सवाल कांवड़ का नहीं है, सवाल सरकार का है।
अगर यही काम किसी किसान, छात्र, बेरोज़गार, आदिवासी या किसी दूसरे आंदोलन में हो, तो क्या पुलिस का रवैया भी यही रहता? या फिर कुछ ही मिनटों में लाठीचार्ज, गिरफ्तारियाँ और मुकदमे शुरू हो जाते?
क्या कानून की ताकत भी धर्म देखकर बदल जाती है?
धर्म श्रद्धा का विषय है, लेकिन कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। यदि कुछ लोग आस्था के नाम पर हिंसा या तोड़फोड़ करते हैं, तो उनके खिलाफ वैसी ही कार्रवाई होनी चाहिए जैसी किसी भी दूसरे नागरिक के खिलाफ होती है।
सरकार से मेरा सीधा सवाल है— क्या “सबका साथ, सबका विकास” का अर्थ “सबके लिए एक कानून” भी है, या फिर कानून का रंग भी सत्ता की सुविधा के अनुसार बदलता है?
आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन संविधान उससे छोटा नहीं हो सकता।
