छत्तीसगढ़

नकटी के सवाल और सरकार

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  • दिवाकर मुक्तिबोध

राजधानी से सटे नकटी गांव की घटना से सांसद बृजमोहन अग्रवाल को इस बात का मलाल रहेगा कि इस गांव के 85 परिवारों को दिये गए आश्वासन को वे पूरा नहीं कर सके. 29 जून को नकटी में बरसों से आबाद उन गरीब परिवारों के घरों को सरकारी जमीन पर अवैध बसाहट के नाम पर उजाड दिया गया जिनसे रायपुर के सांसद ने न्यायसंगत रास्ता निकालने का वायदा किया था.

लेकिन पार्टी के इस वरिष्ठ व जनप्रिय नेता द्वारा मुख्य मंत्री को लिखे गए पत्र की भी परवाह न करते हुए सरकार ने अपनी ज़िद पूरी कर ली. नागरिक सुविधाओं से लैस बस्ती के घरों को सरकारी आदेश के तहत बुलडोज़रों से ध्वस्त कर दिया गया. बताया गया कि अवैध कब्जाधारियों से रिक्त की गई जमीन पर विधायकों व सांसदों के लिए बंगले बनाए जाएंगे. लेकिन अब कहा जा रहा है कि रायपुर विकास प्राधिकरण का यहां विधायक बंगले बनाने का कोई इरादा नहीं है और न ही ऐसा कोई प्रस्ताव है.

दरअसल कथित अवैध कब्जे हटाने एवं बंगले बनाने के मामले में सरकार के दो विभाग आवास एवं पर्यावरण तथा रायपुर विकास प्राधिकरण के परस्पर विरोधाभासी बयान है. राजस्व विभाग के दस्तावेज भी अलग कहानी कहते हैं. जब ऐसी स्थिति हो तो जाहिर है राजनीति को अपने पैर पसारने का मौका मिलता ही है. सो नकटी के मुद्दे पर राजनीति शुरू हो गई है. लोकतंत्रिक शासन में प्रशासनिक निर्णयों की वैधता केवल कानूनी आधार से नहीं बल्कि उनकी नैतिक स्वीकार्यता और संस्थागत पारदर्शिता से भी निर्धारित होती है.

घरों पर बुलडोज़र चलने के बाद पीड़ित परिवार के लोग आंदोलित है. इसमें उन्हें कांग्रेस का साथ मिला है. विपक्ष के तीखे प्रहार के बाद सरकार को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है. संभव है विधायक आवास गृह के लिए अन्यत्र जमीन तलाश ली जाए तथा रिक्त की गई भूभि का उपयोग अन्य निर्माण के लिए हो. अगर ऐसा है तो भरी बरसात में 85 परिवारों के घरों पर बुलडोज़र चलाने का क्या औचित्य था ? अत्यंत अमानवीय एवं क्रूरतापूर्ण कृत्य क्यों किया गया ? ऐसा वहीं सरकार कर सकती है जिसका अपने नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता से कोई लेना-देना नहीें है.

विष्णुदेव साय सरकार चाहती तो नकटी का हल आसानी से निकाला जा सकता था. गांव के लोगों की सुविधानुसार , उनकी सहमति से अन्यत्र जमीन का चयन किया जाता तथा उन्हें एक जैसे पक्के मकान बनाकर दिए जाते. लेकिन यह सरकार के अहम् का प्रश्न था जिसकी संतुष्टि गरीबों के घरों पर बुलडोज़र चलाकर हुई.

नकटी प्रकरण ने भारतीय जनता पार्टी के अंतर्विरोध को भी उजागर कर दिया है. यह स्पष्ट हो गया सांसद बृजमोहन अग्रवाल के प्रति साय सरकार का रूख मित्रतापूर्ण नहीं है. उनकी लोकप्रियता व राजनीतिक कुशलता काफी समय से भाजपा संगठन के एक धड़े को रास नहीं आ रही है जबकि रमन सिंह के कार्यकाल में ट्रबल शूटर कहे जाने वाले सांसद बृजमोहन विपक्षी हमलों के समय साय सरकार के लिए ढाल का काम कर सकते थे बशर्ते उनके तथा सरकार के बीच बेहतर तालमेल बना रहता. तब सरकार की वैसी छीछालेदर नहीं होती जैसी पूर्व की अनेक गंभीर घटनाओं और अब नकटी मामले में हो रही है.

लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व ने साय को मुख्य मंत्री बनाने के साथ ही तय कर लिया था कि बृजमोहन को प्रदेश की राजनीति से बाहर रखा जाएगा ताकि मुख्य मंत्री विष्णुदेव साय को स्वच्छंद होकर अपनी प्रशासनिक क्षमता तथा राजनीतिक सूझ-बूझ को साबित करने का अवसर मिल सके.

किंतु विष्णुदेव साय ऐसे राजनेता हैं जो चाहकर भी स्वविवेक से फैसले नहीं ले सकते. एक तो केन्द्रीय नेतृत्व का दबाव व उसका हस्तक्षेप तथा दूसरे ओपी चौधरी व कुछ अन्य मंत्रियों पर दिल्ली की कृपादृष्टि. दरअसल मुख्य मंत्री साय संगठन के कुछ नेताओं, कुछ नौकरशाहों तथा कुछ मंत्रियों के प्रभाव व दबाव में है जिनमें आवास व पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है.
काॅकस से घिरे विष्णुदेव साय प्रारंभ से ही नाममात्र के मुख्य मंत्री कहे जाते रहे हैं. दीर्घ राजनीतिक अनुभव, केन्द्रीय मंत्री व दो बार प्रदेश अध्यक्ष रहने के बावजूद मुख्य मंत्री के रूप में उनकी स्वतंत्र व प्रभावी छवि नहीं बन पा रही है. दलगत राजनीति व नौकरशाही के दबाव को ढोते-ढोते उनके कार्यकाल के ढाई वर्ष बीत चुके हैं. नकटी मामले में वे चाहते तो दमखम के साथ फरमान जारी कर सकते थे. कह सकते थे कि नकटी के प्रभावित परिवारों को उनके सुझाए इलाके में बेहतर आवास की व्यवस्था होने के बाद ही उनसे जमीन खाली कराई जाएगी. इसके बाद ही वहां विधायकों के बंगले बनाए जाएंगे. सरकार प्रमुख होने के नाते वे ऐसा कर सकते थे. इससे एक मिसाल कायम होती तथा पार्टी सांसद बृजमोहन अग्रवाल के मान-सम्मान की भी रक्षा हो जाती. किंतु अवसर गरीबों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने का नहीं भाजपा की अंदरूनी राजनीति में शह और मात का था जिसकी बिसात पर एक तरफ बृजमोहन तो दूसरी ओर मुख्य मंत्री साय व आवास मंत्री ओपी चौधरी थे और उनके बीच ज़िद का टकराव था. जब शासन की प्राथमिकताएं जन कल्याण के स्थान पर अंतर्दलीय शक्ति संतुलन से संचालित होने लगती है तब नीति और राजनीति के बीच का संतुलन कमज़ोर पड़ जाता है.

उनकी इसी ज़िद की ख़बर लेते हुए पूर्व मुख्य मंत्री भूपेश बघेल ने कहा – ‘ यदि नकटी के लोग बृजमोहन के से फरियाद करने के बजाए ओपी चौधरी से मिलते तो उनके घर नहीं टूटते. वे बृजमोहन से मिले, यही उनसे गलती हो गई.’ भूपेश बघेल का कटाक्ष भले ही राजनीति प्रेरित हो, पर इससे भाजपा सरकार व संगठन के बीच सब कुछ ठीक न चलने का संकेत ज़रूर मिलता है. बहरहाल इस मुद्दे पर कांग्रेस को 13 जुलाई से प्रारंभ होने वाले विधान सभा सत्र में सरकार को घेरने का एक अच्छा अवसर मिल गया है.

वैसे नकटी की घटना एकमात्र घटना नहीं है जिसमें विष्णुदेव साय सरकार की आलोचना हुई हो. सरकार के पिछले ढाई वर्षों में अनेक ऐसे मामले सामने आए जिनसे उसकी छवि मलिन हुई. हाल ही में बैकुंठपुर प्रकरण ने तो सरकार व संगठन की नींद उड़ा दी. वर्चस्व की लड़ाई में रेत माफिया के बीच खूनी लडाई, हत्याएं व इस कारोबार में कुछ मंत्रियों, अधिकारियों व भाजपा नेताओं की कथित संलिप्तता के आरोपों के संदर्भ में सरकार को अंतत: मामला सीबीआई को सौंपना पड़ा है.

जहां तक नकटी मामले पर बृजमोहन अग्रवाल के रूख का प्रश्न है , वे जनता की लड़ाई लड़ते रहे हैं. वे रायपुर लोकसभा से संसद के लिए निर्वाचित है और एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी जिम्मेदारी को बेहतर समझते हैं एवं उसे निभाते भी हैं. इसीलिए एक तरह से उन्होंने नकटी वालों को अभयदान दे रखा था कि जब तक उनके व्यवस्थापन की उचित व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक वे उन्हें घरों से बेदखल नहीं होने देंगे. इस संदर्भ में वे निरंतर गांव के लोगों तथा अधिकारियों के सम्पर्क में रहे. लेकिन उनकी नहीं सुनी गई. इससे उनका आहत होना स्वाभाविक है. फिर भी बेदखली के बाद उन्होंने राज्य सरकार को नहीं अधिकारियों को फटकारा जबकि वे अच्छी तरह जानते थे कि सरकार के आदेश के बिना तोड़फोड़ की कार्रवाई नहीं की जा सकती थी.

इसका मतलब है भाजपा का यह वरिष्ठ नेता और सांसद अपनी पार्टी की सरकार से सीधा पंगा लेने से बचना चाहता हैं क्योंकि आखिरकार यह दलीय अनुशासन व प्रदेश की राजनीति में अपनी अहमियत को कायम रखने का प्रश्न है. इसीलिए अब तक शासन-प्रशासन से जुड़े विभिन्न मामलों में उनकी टिप्पणियां संयमित रही हैं. सीधे सरकार पर उनके आरोप नहीं है. हालांकि उनका मानना था कि नकटी की घटना से पार्टी की साख गिरी है.

इसमें दो राय नहीं कि रायपुर लोकसभा सदस्य के रूप में बृजमोहन अपने क्षेत्र में जितने सक्रिय है छत्तीसगढ़ में शायद ही कोई और सांसद होगा. वे निरंतर
पार्टी कार्यकर्ताओं व आम लोगों के सम्पर्क में रहते हैं और अपने स्तर पर उनकी समस्याएं सुलझाने का प्रयत्न करते हैं. चूंकि वे लोकप्रिय हैं, उनकी अपनी राजनीतिक जमीन है, लंबा संसदीय अनुभव भी है तथा कर्मठ होने के साथ ही पार्टी के प्रति निष्ठावान है इसलिए पार्टी चाहकर भी उन्हें प्रदेश की राजनीति से बाहर नहीं कर पा रही है. पार्टी संगठन में वे एक बड़े समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बहुत ताकतवर माना जाता है.
सरकार की चाल-ढाल पर टिप्पणियां करने वाले वे अकेले नेता नहीं है. भाजपा की असंतुष्ट लाॅबी विधान सभा के बीते सत्रों में अपने सवालों से मंत्रियों को असहज करती रही है. 13 जुलाई से प्रारंभ होने वाले पावस सत्र में नकटी प्रकरण में सरकार को घेरने का मौका कांग्रेस को तो है ही पर यह देखना भी दिलचस्प रहेगा कि अजय चंद्राकर, धरम लाल कौशिक सरीखे अन्य वरिष्ठ असंतुष्ट विधायकों की बैकुंठपुर व नकटी जैसे संगीन मामलों में भूमिका कैसी रहेगी. यह प्रकरण अंतत: इस व्यापक प्रश्न को भी सामने लाता है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता की आंतरिक प्रतिस्पर्धा और नागरिक हितों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए.

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