भ्रष्टाचार की खबर दिखाई तो पत्रकारों पर एफआईआर! क्या महासमुंद में सच बोलना अपराध बन गया है?
भूमकाल समाचार | विशेष रिपोर्ट

महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला सामने आया है। ग्राम पंचायत खट्टी में कथित वित्तीय अनियमितताओं और पंचायत कार्यों में हस्तक्षेप की खबर प्रकाशित और प्रसारित करने वाले दो पत्रकार—मयंक गुप्ता (बेबाक बयान न्यूज़) और मनोज गिरी गोस्वामी (सेंट्रल न्यूज़)—के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने और उन्हें थाने में बैठाए जाने की जानकारी सामने आई है।
बताया जा रहा है कि 24 जून 2026 को ग्राम पंचायत खट्टी में आयोजित ग्रामसभा की कवरेज के दौरान पत्रकारों ने ग्रामीणों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों और पंचायत से जुड़े घटनाक्रम को कैमरे में रिकॉर्ड किया। इसके बाद कथित अनियमितताओं और सरपंच पति द्वारा पंचायत के कार्यों में हस्तक्षेप के आरोपों को लेकर खबरें प्रकाशित हुईं। इसी क्रम में जिला प्रशासन को भी शिकायत से अवगत कराया गया।
इसके बाद सरपंच अनिता मेहरा की शिकायत पर दोनों पत्रकारों के खिलाफ सिटी कोतवाली में मामला दर्ज किया गया। आरोप है कि बिना निष्पक्ष जांच पूरी किए ही गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की गई। यदि ऐसा हुआ है, तो यह केवल दो पत्रकारों का मामला नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़ा बड़ा प्रश्न है।
पत्रकार सुरक्षा कानून के पालन पर भी उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने छत्तीसगढ़ पत्रकार सुरक्षा कानून के पालन को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्रकार संगठनों का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य पत्रकारों को उनके पेशेगत कार्यों के दौरान मनमानी और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करना है। यदि किसी पत्रकार के विरुद्ध उसकी पत्रकारिता से जुड़े कार्य के कारण शिकायत होती है, तो कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया और जांच का पालन किया जाना चाहिए।
आरोप है कि महासमुंद सिटी कोतवाली पुलिस ने इस मामले में आवश्यक जांच पूरी किए बिना ही गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई कर दी। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह पत्रकार सुरक्षा कानून की भावना के विपरीत माना जा सकता है।
इस बीच यह चर्चा भी सामने आ रही है कि एफआईआर के पीछे एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि संबंधित पत्रकारों में से एक ने कुछ समय पहले थाना पुलिस के कथित रवैये के खिलाफ वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की थी। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस प्रशासन की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर पत्रकार सुरक्षा कानून के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करता है या नहीं।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ दबाव में?
पत्रकारों का दायित्व तथ्यों को सामने लाना है। यदि किसी रिपोर्ट से असहमति है, तो उसका जवाब तथ्य, जांच और कानूनी प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए। लेकिन यदि भ्रष्टाचार या अनियमितताओं की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर ही आपराधिक मुकदमे दर्ज होने लगें, तो इससे स्वतंत्र पत्रकारिता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
स्थानीय पत्रकारों में इस कार्रवाई को लेकर नाराजगी बताई जा रही है। उनका कहना है कि यदि खबर प्रकाशित करने की कीमत एफआईआर होगी, तो भविष्य में भ्रष्टाचार और जनहित के मुद्दों को सामने लाना कठिन होता जाएगा।

निष्पक्ष जांच की मांग
यह आवश्यक है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो। यदि पत्रकारों ने तथ्यात्मक रिपोर्टिंग की है, तो उन्हें संरक्षण मिलना चाहिए। वहीं यदि किसी पक्ष को लगता है कि रिपोर्टिंग गलत थी, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कानून का उपयोग न्याय के लिए होना चाहिए, न कि भय का वातावरण बनाने के लिए।
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है।
