सिलगेर से उठी आवाज़… लोकतंत्र की मांग से जेल की सलाखों तक
भूमकाल समाचार | विशेष रिपोर्ट

11 मई 2021 को बस्तर के सिलगेर से शुरू हुआ आंदोलन केवल एक गांव का विरोध नहीं था। यह जल, जंगल, ज़मीन, ग्रामसभा के अधिकार और संविधान प्रदत्त लोकतांत्रिक असहमति की रक्षा का आंदोलन था। कुछ ही दिनों में यह आंदोलन बस्तर के 30 से अधिक स्थानों तक फैल गया और हजारों आदिवासी शांतिपूर्ण तरीके से इसमें शामिल हुए।
17 मई 2021 की पुलिस फायरिंग ने इस आंदोलन को पूरे देश की चर्चा बना दिया।

इसके बाद आंदोलन से जुड़े अनेक ग्रामीणों और युवाओं पर मुकदमे दर्ज हुए। समय बीतता गया, लेकिन कई चेहरे आज भी जेल की सलाखों के पीछे हैं।
रघु मोड़ियामी, सुनीता और आंदोलन से जुड़े अन्य कई युवा नेता आज भी जेल में हैं। उन पर माओवादी संगठन से संबंध रखने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। इन आरोपों की न्यायिक प्रक्रिया जारी है और अदालत में उनका अंतिम निर्णय होना बाकी है।
इसी बीच सरकार ने लगातार अभियानों के माध्यम से दावा किया कि बड़ी संख्या में माओवादी मारे गए, गिरफ्तार हुए या उन्होंने आत्मसमर्पण किया। यदि सरकार के अनुसार माओवादी संगठन की ताकत निर्णायक रूप से कमजोर हो चुकी है, तो फिर यह सवाल स्वाभाविक है कि सिर्फ संबंध रखने के आरोप में वर्षों से जेल में बंद ग्रामीणों और शांतिपूर्ण आंदोलन से जुड़े युवाओं के मामलों की निष्पक्ष और शीघ्र न्यायिक समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए?
लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी नहीं माना जाता। अपराध सिद्ध करना अदालत का काम है। यदि कोई निर्दोष है तो उसे वर्षों तक जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों पर प्रश्न खड़े करता है। वहीं यदि किसी पर आरोप हैं, तो उनका समयबद्ध और निष्पक्ष परीक्षण होना भी उतना ही आवश्यक है।
भूमकाल समाचार इस आंदोलन का केवल दर्शक नहीं रहा। हमने सिलगेर आंदोलन की शुरुआत से ज़मीनी रिपोर्टिंग की। हमने गांवों में रातें बिताईं, धरना स्थलों पर लोगों की बातें सुनीं, आंदोलन को फैलते देखा और उसके बाद गिरफ्तारियों का दौर भी देखा। इस पूरे घटनाक्रम के हम प्रत्यक्ष गवाह रहे हैं।
आज भी वे तस्वीरें गवाही देती हैं कि यह आंदोलन संविधान की प्रस्तावना हाथ में लेकर, पारंपरिक संस्कृति के साथ, शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे लोगों का आंदोलन था। इसके बावजूद इसे धीरे-धीरे मुकदमों, गिरफ्तारियों और जेलों की कहानी में बदल दिया गया।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है
यदि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाले युवा वर्षों से जेल में हैं, जबकि अनेक गंभीर आरोपों का सामना कर रहे प्रभावशाली लोग खुलेआम सार्वजनिक जीवन जी रहे हैं, तो क्या न्याय का पैमाना सबके लिए समान है?
सिलगेर आज केवल एक गांव का नाम नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ा एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर केवल अदालतों से नहीं, बल्कि शासन की संवैधानिक प्रतिबद्धता से भी जुड़ा हुआ है।
— भूमकाल समाचार
