संपादकीय

“जुमलों का युग बनाम जनता का संघर्ष”

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क्या देश ऑटोपायलट पर है?

बीवीदेश का नागरिक महंगाई से जूझ रहा है। पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें जेब पर बोझ हैं, रसोई गैस आम परिवार की पहुँच से दूर होती जा रही है। किसान लागत से परेशान है, युवा रोजगार की तलाश में भटक रहा है और मध्यम वर्ग हर महीने का हिसाब जोड़ने में लगा है।
इसी बीच सीमाओं को लेकर समय-समय पर सवाल उठते हैं, दावे और प्रतिदावे सामने आते हैं, लेकिन जनता की अपेक्षा रहती है कि सरकार स्पष्ट और भरोसेमंद जानकारी दे। लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की चिंता सर्वोच्च होनी चाहिए।
लेकिन सत्ता का चेहरा देखिए—मानो सब कुछ सामान्य हो। प्रचार, समारोह, उपलब्धियों का प्रदर्शन और छवि निर्माण पूरे शोर के साथ जारी है, जबकि जनता पूछ रही है—हमारे सवालों का जवाब कौन देगा?
लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन कैमरे की चमक से नहीं, जनता के जीवन की हकीकत से होता है। यदि महंगाई पर सन्नाटा हो, बेरोज़गारी पर चुप्पी हो और जनता के सवालों के स्थान पर केवल प्रचार दिखाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
भूमकाल समाचार पूछता है—
क्या सत्ता का काम केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाना है?
क्या जनता की पीड़ा अब राजनीतिक प्राथमिकता नहीं रही?
क्या लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह रहेगी, या केवल प्रचार के प्रति?
इतिहास सत्ता के दावों से नहीं, जनता के अनुभवों से लिखा जाता है।

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