भाजपा को SIR के 13 करोड़ नामों का इतना सटीक हिसाब कहां से मिला ?
ECI की सार्वजनिक वेबसाइट पर नहीं दिखता पूरा राष्ट्रीय ब्रेकअप, फिर भाजपा के पास 2.8 करोड़ मृत, 6.3/6.8 करोड़ शिफ्टेड और 1 करोड़ डुप्लीकेट का आंकड़ा कैसे आया?
भूमकाल समाचार | विशेष पड़ताल
देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद अब एक बेहद गंभीर सवाल पर पहुंच गया है—आखिर भाजपा के पास SIR में ड्राफ्ट रोल से बाहर हुए करीब 13 करोड़ नामों का इतना विस्तृत श्रेणीवार आंकड़ा आया कहां से?
भाजपा ने कांग्रेस के 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप का जवाब देते हुए दावा किया है कि ये सभी अंतिम रूप से हटाए गए मतदाता नहीं हैं, बल्कि ड्राफ्ट चरण में सत्यापन के लिए चिन्हित नाम हैं।
6 अक्टूबर को भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने चुनाव आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि इनमें करीब 2.8 करोड़ मृत मतदाता, 6.3 करोड़ स्थानांतरित, 1 करोड़ डुप्लीकेट और करीब 3 करोड़ ऐसे मतदाता हैं जिन्हें ट्रेस नहीं किया जा सका।
लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है।
अगर आंकड़े चुनाव आयोग के हैं तो उनका मूल दस्तावेज कहां है?
चुनाव आयोग की वेबसाइट पर SIR-2026 के लिए मतदाता सूची और राज्यवार चुनावी दस्तावेज उपलब्ध हैं। आयोग ने ड्राफ्ट रोल और मतदाता खोजने की व्यवस्था भी सार्वजनिक की है।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर 2.8 करोड़ मृत + करीब 6.3/6.8 करोड़ स्थानांतरित + 1 करोड़ डुप्लीकेट + करीब 3 करोड़ अनुपस्थित/अप्राप्य का वह एकीकृत दस्तावेज, जिसे भाजपा अपनी राजनीतिक दलील के आधार के रूप में पेश कर रही है, हमारी पड़ताल में आयोग की सार्वजनिक वेबसाइट पर उसी रूप में नहीं मिला।
यानी सवाल आंकड़ों के अस्तित्व से ज्यादा उनके स्रोत और सार्वजनिक पारदर्शिता का है।
यूपी का आंकड़ा जरूर सार्वजनिक हुआ था
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
उत्तर प्रदेश में 6 जनवरी 2026 को जारी SIR ड्राफ्ट सूची के समय मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट आंकड़े दिए थे। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 46.23 लाख मृत मतदाता, 2.17 करोड़ स्थानांतरित/अनुपस्थित और 25.47 लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियां मिली थीं। कुल करीब 2.89 करोड़ नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए ।
इसलिए यूपी के मामले में श्रेणीवार आंकड़ों का सार्वजनिक आधार मौजूद है।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यही पूरी तस्वीर किस दस्तावेज से तैयार हुई—यह अभी स्पष्ट नहीं है।
और भाजपा के आंकड़ों में भी अंतर क्यों?
यह सवाल और गंभीर हो जाता है क्योंकि सार्वजनिक रूप से सामने आए भाजपा के अलग-अलग प्रस्तुतियों में भी आंकड़े एक जैसे नहीं हैं।
एक प्रस्तुति में करीब 2.6 करोड़ मृत, 3 करोड़ अनुपस्थित, 6.3 करोड़ स्थानांतरित और 1 करोड़ डुप्लीकेट बताए गए हैं।
वहीं 6 अक्टूबर को सुधांशु त्रिवेदी के बयान में 2.8 करोड़ मृत, 6.3 करोड़ शिफ्टेड, 1 करोड़ डुप्लीकेट और करीब 3 करोड़ अप्राप्य बताए गए।
और सोशल मीडिया पर प्रसारित भाजपा के जिस ग्राफिक को लेकर विवाद है, उसमें 6.8 करोड़ शिफ्टेड और करीब 2.4 करोड़ अन्य मतदाताओं का आंकड़ा दिखाई देता है।
तो आखिर आधिकारिक भाजपा आंकड़ा कौन-सा है?
सबसे बड़ा सवाल: भाजपा को यह डेटा किसने दिया?
यदि ये आंकड़े वास्तव में ECI के आंतरिक SIR डेटा से निकले हैं, तो स्वाभाविक सवाल है—
क्या यही विस्तृत डेटा सभी राजनीतिक दलों को समान रूप से उपलब्ध कराया गया था?
यदि हां, तो चुनाव आयोग इसे सार्वजनिक क्यों नहीं करता?
और यदि यह डेटा सार्वजनिक नहीं था, तो—
भाजपा के पास यह राष्ट्रीय स्तर का श्रेणीवार डेटासेट किस माध्यम से पहुंचा?
क्या यह डेटा राजनीतिक दलों के Booth Level Agents (BLA) को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों से तैयार हुआ?
या भाजपा के पास चुनाव आयोग से प्राप्त कोई ऐसा विस्तृत डेटासेट है जिसे आम नागरिक अभी तक नहीं देख पाए हैं?
भाजपा ने खुद कहा है कि SIR से संबंधित ऐसी जानकारी राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के प्रतिनिधियों तक साझा की गई थी। �
The Statesman
तो फिर अगला सवाल और सीधा है—
क्या वही डेटा सार्वजनिक किया जा सकता है?
क्या ECI और भाजपा की मिलीभगत है?
इस सवाल का अभी कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
इसलिए केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि चुनाव आयोग और भाजपा के बीच मिलीभगत है, तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल पूछना पूरी तरह जायज है।
क्योंकि चुनावी लोकतंत्र में मतदाता सूची से जुड़े करोड़ों नामों का राष्ट्रीय स्तर का डेटा यदि किसी राजनीतिक दल के पास विस्तृत रूप में उपलब्ध है, तो उस डेटा का स्रोत, पद्धति और मूल दस्तावेज सार्वजनिक होना चाहिए।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता केवल निष्पक्ष होने से नहीं, बल्कि निष्पक्ष दिखाई देने और अपने आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करने से भी मजबूत होती है।
भूमकाल का सीधा सवाल
भाजपा को 13 करोड़ नामों का इतना सटीक श्रेणीवार हिसाब किस दस्तावेज से मिला?
ECI के पास अगर यह पूरा डेटा है तो जनता से क्यों छिपा है?
अगर यह डेटा सभी दलों को दिया गया है तो उसका स्रोत सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
और अगर भाजपा के पास कोई अलग डेटाबेस है, तो चुनाव आयोग बताए कि वह डेटाबेस भाजपा तक कैसे पहुंचा?
13 करोड़ नामों का सवाल सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस का राजनीतिक विवाद नहीं है। यह भारत के मतदाता और उसके मताधिकार के भरोसे का सवाल है।
इसलिए अब सवाल किसी पार्टी से नहीं—सीधे चुनाव आयोग से है:
‘ये आंकड़े आए कहां आये ?
