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गुंडाधूर और उनका आंदोलन आज और प्रासंगिक हो गया

बुमकाल दिवस के अवसर पर विशेष


आप सभी साथियों को बहुत बहुत सेवा जोहार

बुमकाल के नायक वीर गुंडाधूर को सादर नमन , साथियों गुंडाधूर और उनका आंदोलन आज और प्रासंगिक हो गया है जब देश और दुनिया में हिटलरशाही प्रवृत्तियां पनपने लगी है मिडिया भी हद दर्जे की चापलुसी में लगी हुई है…. वह दौर दुनिया के सबसे शक्तिशाली अंग्रेजी हुकूमत का था जिन्होंने अपने यूरोपियन उद्योगों के हित के लिऐ मध्यप्रात के जंगलों में अपने प्रकृति सम्मत पारम्परिक व्यवस्था में जीवन यापन कर रहे आदिवासी समुदाय को छेड़ने की कोशिश की थी ….तब महान गुंडाधूर और उनके साथियों ने बुमकाल के निर्देशों और अपने प्रकृति सम्मत कोयतोरियन तकनीकी के बल पर अंग्रेजी हुकूमत के छक्के छुड़ा दिए थे ….उनका संदेश पहुंचाने के तरीके और #गोटूल की गतिशीलता से अंग्रेज अधिकारी भौंचक्के रह गये थे…आज के मोबाइल फोन की तरह सुदर सुकमा के आंदोलन कारी को केशकाल घाटी के घटनाक्रम तुरंत पता चल जाती थी

…. “बुमकाल” का अर्थ होता है ऐसी सभा जिसमें बच्चे जवान बुजुर्ग महिलाओं के अतिरिक्त आदिवासियों के पुरखे/पेन भी सम्मिलित रहते है…और जब यह सभा फैसले करती है तो #बुम अर्थात दुनिया पलट जाती है… अंग्रेज़ी हुकूमत ने जब हमारी जल जंगल जमीन पर बुरी नजर गड़ाई तो #बुमकाल उठ खड़ा हुआ…
“भूम” का अर्थ धरती
और “बुम” का अर्थ आकाश भी होता है
अर्थात धरती से लेकर आकाश तक जिनके हलचल हो …
प्रकृति खुद अंग्रेजों के खिलाफ युद्दघोष करने लगा….यह भारतीय इतिहास का बहुत ही खास आंदोलन रहा … इसके नायक गुंडाधूर को अंग्रेज दैवीय शक्तियों से भरा मानते थे…
“#गुडा” का अर्थ है “पगड़ी” या “पागा” या “बागा “
इसलिए गुंडाधूर को इन नामों के साथ भी संबोधित किया जाता है
“तला गुडा ” का अर्थ होता है सिर का घोंसला
अर्थात घोंसला में पुरे समुदाय कि परिपालन करने की क्षमता हो
ऐसे वीर को जब बुमकाल बैठता है तब “नेता” चुना जाता है
उस बुमकाल में भी गुंडाधूर को नेता चुना गया था
और नेता चुनने पर उसके #तला अर्थात सिर पर “गुडा” याने पगड़ी बांधा जाता है पुरे समुदाय की ओर से…..
आप देखेंगे कि उस विशिष्ट पगड़ी का आकार एक घोंसले की तरह ही होती है…. अर्थात पागा बांधकर समुदाय के लिडर को…सबकी रक्षा करने का, एक जिम्मेदारी का बोध कराया जाता है…..पेन पुरखों की ऊर्जा भी धारण कराई जाती है…. ठीक उसी तरह जैसे 1910 की विकट स्थिति में गुंडाधूर को यह पदवी भार दिया गया था ….गुंडाधूर ने उस पगड़ी का बखूबी मान रखा …उनका पगड़ी कभी अंग्रेजी हुकूमत के हाथ नहीं लगा….
…आज से 20 साल पहले समुदाय के जल जंगल जमीन व संस्कृति के तेजी से नष्ट करने की साजिशों को रोकने के लिऐ आज के ही दिन “#केबीकेएस” कि स्थापना हमारे समुदाय के बुजुर्गो ने कि थी …. इसलिए बुमकाल में प्रशिक्षित लयोरो को “गुडा” याने पगड़ी धारण करा कर जल जंगल जमीन की रक्षा व पुरखों के पदचिन्हों पर चलते रहने की शपथ दिलाई जाती है…
1910 में “तला गुडा” के ऊर्जा से..
अंत तक वीर गुंडाधूर अंग्रेजों के चंगुल से आजाद रहे …. अपनी जल जंगल जमीन की रक्षा के लिऐ वीर गुंडाधूर का बुमकाल क्रांति हम सभी को हमेशा हमेशा प्रेरित करते रहेगी …हम आपस में कैसे संगठित होकर रहे …. उसने नार्र -परगना बुमकाल कि जो स्वशासन की प्रशासनिक और न्यायीक ढांचे की जो आधारशिला रखी थी वह आज भी देश के अनुसूचित क्षेत्रों के लिऐ एक आधारभूत ढांचा है… आज हम बुमकाल दिवस पर हम उस स्वशासन “मावा नाटे मावा राज” की कल्पना को साकार करने की दिशा में कार्य करें…. सेवा जोहार! बुमकाल जोहार!!
गुंडाधूर चो लड़तो बेरा
मुंड के ऊपर मुंड गिरे से
लहू के मारे
टार बहे से

योगेश नरेटी
बुम गोटूल यूनिवर्सिटी

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