जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन खत्म हो गया, लेकिन कई सवाल छोड़ गया।

सोशल मीडिया पर ऐसा माहौल बनाया गया था मानो देशभर के युवा एक ही मंच पर आ गए हों। लाखों-करोड़ों समर्थकों के दावे किए गए, लेकिन जब आंदोलन सड़क पर उतरा तो तस्वीर उतनी बड़ी नहीं दिखी, जितनी मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई जा रही थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम सोशल मीडिया की लोकप्रियता को वास्तविक जनसमर्थन समझने लगे हैं?
लेकिन इस बहस में सबसे जरूरी बात कहीं पीछे नहीं छूटनी चाहिए।
युवाओं का गुस्सा असली है। उनकी पीड़ा असली है। नीट हो या दूसरी प्रतियोगी परीक्षाएं, लाखों बच्चे सालों तक दिन-रात मेहनत करते हैं। माता-पिता अपनी कमाई, अपनी उम्मीदें और कभी-कभी अपनी पूरी जिंदगी की बचत बच्चों के सपनों पर लगा देते हैं। फिर एक दिन खबर आती है कि पेपर लीक हो गया। किसी माफिया ने सिस्टम में सेंध लगा दी। और देखते ही देखते लाखों मेहनती छात्रों का भविष्य सवालों के घेरे में आ जाता है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल सरकार से शुरू होता है।
जनता जिस सरकार को चुनकर लाती है, जिस पर भरोसा करती है, उसकी जवाबदेही बनती है। सिर्फ शोक व्यक्त कर देने, सोशल मीडिया पर दुख जता देने या खानापूर्ति के लिए एक-दो अधिकारियों का तबादला कर देने या नये अधिकारियों की नियुक्ति करने से जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। सरकार अपने फर्ज से इस तरह पल्ला नहीं झाड़ सकती।
बच्चों को यह भरोसा कौन दिलाएगा कि अगली परीक्षा में फिर ऐसा नहीं होगा?
माता-पिता को यह विश्वास कौन देगा कि उनके बच्चे की मेहनत किसी माफिया की वजह से बर्बाद नहीं होगी?
अगर किसी परीक्षा में सफल होने के लिए एक छात्र को वर्षों तक मेहनत करनी पड़ती है, तो क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह परीक्षा प्रणाली की कमजोर पड़ चुकी जड़ों को मजबूत करे? सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बनाए? माफियाओं पर ऐसा शिकंजा कसे कि दोबारा पेपर लीक करने की कोई हिम्मत न कर सके?
आखिर तमाम एजेंसियां हैं, बड़े-बड़े संगठन हैं, सुरक्षा के दावे हैं, तकनीकी इंतजाम हैं, फिर भी हर साल कोई न कोई परीक्षा विवादों में क्यों घिर जाती है? हर बार लाखों बच्चों का भविष्य दांव पर क्यों लग जाता है? हर बार वही जांच, वही बयान और वही आश्वासन क्यों सुनाई देते हैं?
कॉकरोच जनता पार्टी हो या कोई और संगठन, किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसके नारों या फॉलोअर्स से नहीं, बल्कि उसके द्वारा खड़े किए गए सवालों और सुझाए गए समाधानों से होना चाहिए। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि जनता भावनाओं में बहने के बजाय तथ्यों को देखे, दावों और हकीकत के बीच का अंतर समझे और किसी भी राजनीतिक या सामाजिक अभियान को आंख मूंदकर स्वीकार न करे।
समाधान सिर्फ गुस्से में नहीं, जवाबदेही में छिपा है।
जरूरत है कि पेपर लीक के मामलों की समयबद्ध जांच हो। दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो जो दूसरों के लिए नजीर बने। परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जाए। और सबसे बढ़कर, सरकार यह साबित करे कि उसे बच्चों के भविष्य की उतनी ही चिंता है जितनी चुनावों के समय उनके सपनों की बात करने की।
दुख की बात यह है कि जनता की आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती। कुछ दिन शोर होता है, फिर नया मुद्दा आ जाता है और पुराने सवाल फाइलों में दब जाते हैं।
लेकिन हर दबे हुए सवाल के पीछे लाखों छात्रों की टूटी उम्मीदें होती हैं।
कब रुकेगा यह सिलसिला?
कब तक बच्चों की मेहनत माफियाओं और सिस्टम की लापरवाही की भेंट चढ़ती रहेगी?
कब तक माता-पिता अपने बच्चों को यह समझाते रहेंगे कि गलती उनकी नहीं, व्यवस्था की थी?
और सबसे महत्वपूर्ण-कब वह दिन आएगा जब किसी परीक्षा के बाद छात्रों को रिजल्ट का इंतजार होगा, पेपर लीक की खबर का नहीं?
इन सवालों का जवाब किसी ट्रेंड, किसी हैशटैग या किसी नए राजनीतिक प्रयोग के पास नहीं है। इसका जवाब सरकार और पूरी व्यवस्था को देना होगा, क्योंकि बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी भी आखिर उन्हीं की है।
श्वेता सिंह
