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यदि स्वयं को स्वाहा कर सको तो पत्रकारिता करना

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आजकल पत्रकारिता में प्रवेश लेना वैसा ही हो गया है जैसे किसी शादी में बिना बुलावे के घुस जाना। न कोई योग्यता पूछता है, न कोई उद्देश्य। बस एक मोबाइल, दो-चार सोशल मीडिया अकाउंट और प्रोफाइल फोटो पर “वरिष्ठ पत्रकार” लिखवा लीजिए, पत्रकारिता का द्वार आपके लिए खुला है।

पुराने समय में पत्रकारिता को मिशन कहा जाता था। आजकल मिशन का स्थान कमीशन ने ले लिया है। पहले पत्रकार खबर खोजता था, अब खबर पत्रकार को खोजती है और पूछती है”भाई साहब, मुझे चलाने का रेट क्या है?”

इसीलिए जब कोई युवा मुझसे पूछता है कि पत्रकारिता कैसे करें, तो मेरा मन करता है कि उसे किसी विश्वविद्यालय का पता न बताकर सीधे किसी यज्ञशाला का पता बता दूँ। क्योंकि पत्रकारिता यदि सचमुच करनी है तो पहले स्वयं को स्वाहा करना पड़ता है। यह कोई साधारण नौकरी नहीं है कि सुबह हाजिरी लगाई, शाम को तनख्वाह ली और घर आ गए।

पत्रकारिता तो ऐसा प्रेम है जिसमें प्रेमिका भी पत्रकारिता है, पत्नी भी पत्रकारिता है और कभी-कभी सास भी पत्रकारिता ही बन जाती है। चौबीस घंटे आपकी परीक्षा लेती रहती है। रात के दो बजे फोन बजे तो पत्रकार उठता है, जबकि आम आदमी तकिया पलटकर फिर सो जाता है।

लेकिन समय बदल गया है। अब पत्रकारिता त्याग नहीं, टैग मांगती दिखाई देती है। जितने ज्यादा फेसबुक टैग, उतना बड़ा पत्रकार। किसी कार्यक्रम में दस नेताओं के साथ फोटो खिंचवा ली तो पत्रकारिता में पीएचडी मानी जाती है। खबर लिखना आवश्यक नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि खबर लिखते हुए सेल्फी जरूर आनी चाहिए।

आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट यह है कि हर कोई पत्रकार बनना चाहता है, लेकिन पत्रकारिता कोई नहीं करना चाहता। सबको प्रेस कार्ड चाहिए, प्रेस की जिम्मेदारी नहीं। सबको पहचान चाहिए, पर पहरेदारी नहीं। सबको मंच चाहिए, पर जनता के प्रश्न नहीं।

एक समय था जब पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था। आज कई जगह सत्ता पत्रकार से पूछती है”भाई, इस महीने सब ठीक चल रहा है ना?” और पत्रकार मुस्कुराकर कहता है”जी, आपका आशीर्वाद बना रहे।”

त्याग की बात करें तो पत्रकारिता आज भी त्याग मांगती है, लेकिन त्याग करने वालों की संख्या कम होती जा रही है। आज त्याग का अर्थ बदल गया है। कुछ लोग सत्य का त्याग कर देते हैं, कुछ निष्पक्षता का और कुछ तो व्याकरण का भी। बचता क्या है? केवल “ब्रेकिंग न्यूज” का लाल पट्टा।

पत्रकारिता का हाल उस रिश्तेदार जैसा हो गया है जिसे हर कोई अपना बताता है लेकिन कोई उसकी जिम्मेदारी नहीं उठाता। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले बहुत मिल जाएंगे, लेकिन उस स्तंभ की मरम्मत कौन करेगा, यह कोई नहीं बताता।

सबसे मनोरंजक दृश्य तब होता है जब पाँच लोगों का व्हाट्सएप ग्रुप बनता है और अगले दिन उसका नाम रख दिया जाता है”राष्ट्रीय पत्रकार संघ अंतरराष्ट्रीय प्रकोष्ठ”। फिर अध्यक्ष, महासचिव, संरक्षक और मुख्य संरक्षक के पद बाँट दिए जाते हैं। संगठन में सदस्य पाँच होते हैं और पद सात।

पत्रकारिता के नाम पर पुरस्कारों की भी अद्भुत खेती चल रही है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि देश में पत्रकार कम और पुरस्कार प्राप्त पत्रकार अधिक हैं। कुछ लोगों के ड्राइंग रूम में इतनी ट्रॉफियाँ होती हैं कि यदि उन्हें बेच दिया जाए तो एक छोटा-मोटा न्यूज़ चैनल शुरू हो सकता है।

फिर भी इस सारी विडंबना के बीच कुछ लोग ऐसे हैं जो सचमुच पत्रकारिता को यज्ञ मानते हैं। वे आज भी बिना संसाधनों के खबर खोजते हैं, बिना दबाव के सच लिखते हैं और बिना किसी पुरस्कार की अपेक्षा के जनता के सवाल उठाते हैं। वही लोग इस पेशे की असली पूँजी हैं।

इसलिए यदि पत्रकारिता में आना है तो पहले यह तय कर लीजिए कि आपको पत्रकार बनना है या केवल प्रेस लिखी गाड़ी में घूमना है। यदि आपको सम्मान चाहिए तो बहुत रास्ते हैं, लेकिन यदि आपको सच का साथ चाहिए तो रास्ता कठिन है।

पत्रकारिता में बने रहना आसान नहीं है। यहाँ कभी विज्ञापन नाराज़ होता है, कभी नेता, कभी अधिकारी और कभी अपना ही पाठक। फिर भी यदि आप हर परिस्थिति में सत्य के साथ खड़े रह सकते हैं, तो आपका स्वागत है।

क्योंकि पत्रकारिता आज भी वही कहती है यदि स्वयं को स्वाहा कर सको तो पत्रकारिता करना। बाकी तो आजकल मोबाइल का कैमरा भी पत्रकार है, रिंग लाइट भी पत्रकार है और कुछ मामलों में तो ट्राइपॉड भी वरिष्ठ पत्रकार घोषित होने की प्रतीक्षा में खड़ा है ।

राजेन्द्र सिंह जादौन
व्यंग्यकार एवं पत्रकार

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