यहाँ कलेक्टर भी मैं हूँ एसपी भी और तेरा बाप भी : अनिल मिश्रा

बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार अनिल मिश्रा के अनुभवों का दस्तावेज : जीवंत कहानियों की नजर से देखिये बस्तर

 

ये कहाँ ले आये। इनको तो जले हुए गाँव देखना है। वो बोला जो गोरों को लेकर आया था।

वो अक्सर किसी न किसी विदेशी को लेकर आता और इनके सर पर सवार हो जाता।
एक दो कैम्प और कुछ गाँव घुमा दो भाई। वह ऐसे कहता मानो भीख मांग रहा हो। जब मामला सेट हो जाता तो कहता लिशन ड्यूड दीज गाय्स आर नॉट इम्बेसाइल एट आल। यू कांट चीट देम। इनको तो वही चाहिए जो असल है। जुल्म दर्द गरीबी।
फिर वह उनकी ओर घूमता और कहता। यू नो। हाउ लोकल मीडिया बयास्ड। एक्चुअली दे हैव टू स्क्रिबल इन फेवर ऑफ़ गवर्मनेन्ट। रियली। दे आर पेड फॉर दैट। यू कांट ट्रस्ट ऑन देम। सोचता ये चूतिये क्या समझेंगे।
गोरों के झुंड में हलचल मचती। ओ। इज इट सो। देन हाऊ वी विल डू सुरेश।
डोंट वरी। एम हीयर। वो गर्व से कहता। फिर इनसे कहता कुछ पानी की बोतल ले आओ। अपन बाहर का नहीं पी सकते। मेरी तबियत तुरन्त बिगड़ जाती है।
ये सुनो। कलेक्टर है क्या। उससे बताओ हम आये हैं। वह चपरासी को ऐसे आदेश देता मानो वो खुद ही कलेक्टर हो।
आस्क हिम इफ ही नोस जेनेवा कन्वेंशन ऑन कनफ्लिक्ट। फिर वह गोरों को सलाह देता।
सर ये अमेरिका से आये हैं। कुछ पूंछेंगे। और उनके मुंह खोलने से पहले खुद ही सवाल करने लगता।
ये जुडूम तो गैर कानूनी है।
आपने लोगों को इल्लीगल डिस्प्लेस कर दिया है।
जुडूम वाले गाँव जला रहे।
वहां नाका किससे पूँछकर बनाया।
लोकल मीडिया की आँखों में निवेदन का भाव आता। कलेक्टर कभी उसे देखते कभी लोकल्स को।
ऐसा नहीं है। नक्सलवाद कोई सिविल वार नहीं है। ये ला एन्ड ऑर्डर से ज्यादा सोशियो इकानामिक प्रॉब्लम है।
पर उन लोग हत्या कर रहे। हम देखकर आये हैं। वह तेवर और कड़े करता। बीच बीच में विदेशियों को समझाता चलता क्या बात हो रही। गोरे उसकी आक्रामक शैली से प्रभावित होते। स्टोरी बन रही है।
ही इज डेयरडेविल मैन। वेरी टफ इन हिज मैनर्स।
नक्सल बन्द का दिन है भैया। इस सड़क पर शायद ही जाने को मिले। एक ने जले घर के सवाल को टालना चाहा।
अरे चलो। तुम लोग बहुत डरते हो। उसने व्यंग्य किया।
गाडी आगे बढ़ी। तीन गोरी लड़कियां और एक लड़का। ड्राइवर के बगल की सीट पर वह खुद बैठा था। और सूमो की सबसे पिछली सीट पर दो स्थानीय पत्रकार।
वहां जला हुआ गाँव नहीं है भैया। उधर कैम्प हैं। एक ने फिर समझाने की कोशिश की।
अरे। क्या पत्रकार हो तुम लोग। इतना डरते हो। चलो चलो। मैं दिखाता हूँ। दे आर अफ्रेड। वह पीछे मुड़कर विदेशियों से कहता और मुस्कराता।
सड़क भरी दोपहर में खामोश हो गई थी। बीच बीच में जंगल में धंसे सिपाही नजर आते। बाकी कोई नहीं बस सन्नाटा। अचानक सड़क पर एसएलआर लेकर खड़े एक सिपाही ने उन्हें रुकने का इशारा किया। गाडी रुकी।
पीछे से एक पत्रकार उतरने लगा। उसने रोका।
बैठे रहो। वो खुद आएगा।
उसने ऊँगली के इशारे से सिपाही को बुलाया। जवान थोड़ा आगे बढ़ा।
कहाँ जा रहे हो मैडम लोग को लेकर। आज बन्द है पता नहीं। सिपाही ने कहा।
तू क्यों रोका हमको। पता है हम कौन हैं। यह पूरे फार्म में था।
तू कोई भी हो। उधर नहीं जाने का। सिपाही ने कंधे से बन्दूक उतार हाथ में ले ली।
अबे तू है कौन। हम कलेक्टर से परमिशन लेकर आये हैं। यह गरजा।
मादर..यहाँ कलेक्टर भी मैं हूँ एसपी भी। और तेरा बाप भी। वो तेजी से उस तक पहुंचा और कालर थाम लिया।
अब उसका चेहरा देखने लायक था। हक हक हक। देख भाई। अरे क्या कर रहा।
जाने दो सर। पीछे से एक पत्रकार ने कहा।
नहीं। साला बात किससे कर रहा। ठोंक दूंगा साले को यहीं। मादर हम यहाँ मरा रहे ये मेरे को आँख दिखायेगा। जा ले के आ तेरे कलेक्टर को। यहीं खड़ा हूँ।
उसकी बोलती बन्द।
जाने दो भैया। ये चूतिया है। बाहर से आया है। इसको कुछ नहीं पता। एक बोला।
हम जानते हैं। आप हमारी सुरक्षा के लिए यहाँ खड़े हैं। दूसरे ने भी उसे शांत करने की कोशिश की।
चल निकल यहाँ से। मादर। उसने कालर छोड़ दिया।
वह जुडूम के उस पर्यटक का अंतिम दौरा रहा।
–अनिल मिश्रा।
07 अक्टूबर 2016

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