गणतंत्र की जय हो : अनिल मिश्रा

नदी उस पार हैं वो गाँव। पर आप क्यों वहां जाएंगे। उसके कोरों पर हल्की मुस्कान कौंधी फिर तेजी से लुप्त हो गई।
क्यों नहीं जाएंगे सर। हमें पता होता तो पहले ही जाते। इनमें से एक बोला।
अभी चलो। दूसरे ने दृढ़ता से निर्णय सुनाया। वो जानता था अभी पीछे हटने पर उसे आरोप लगाने का मौक़ा मिल जाएगा। जानते सभी थे पर बाकी चार असमन्जस में थे। दो दिन बाद गणतंत्र का पर्व है। साल भर का कारोबार। अखबार इसी से चलता है।
आज कैसे जाएंगे। एक ने उस दिन के महत्व को रेखांकित किया। आज दिनभर काम होगा। मेटर भेजा जाएगा। प्रेस में रातभर ले आउट और डिजाइन बनेगी। कल दिन में विज्ञापनों के विशेष पेज छपेंगे। तब जाकर गणतंत्र दिवस पर लोगों को बधाई मिल पाएगी, अखबारों को रेवन्यू और फील्ड के कलमकारों को कमीशन तथा झटका।
अजब व्यक्ति है। एन मौके पर आ गया है। ललकार रहा। देखें तुम कैसे पत्रकार हो। भूख से, गरीबी से, तंगहाली से, मामूली बीमारियों से, एक मुट्ठी नमक की खातिर, नदी की बाढ़ में, फर्जी मुठभेड़ों में…। हर हाल में उन्हें मरना ही है। खबर आज नहीं छपेगी तो क्या बिगड़ जाएगा। कल भी तो वहां जा सकते हैं। गणतंत्र की परेड खत्म होते ही निकल लेंगे। पर क्या करें। इसे कैसे टालें।
आज तो बहुत काम है सर। परसों 26 जनवरी है। उसने मजबूरी सुनाई जो अखबार के अलावा दुकान भी चलाता था।
ओह। ठीक है आज नहीं कभी और सही। उसके चेहरे पर अब सरेआम व्यंग्य नुमायाँ था। इन्हें मुंह चिढाता रहा। बेचारे।
नहीं नहीं। आज ही चलते हैं। अभी 9 ही बजे हैं। 3 या 4 बजे तक लौट आएंगे। तब भी अपना काम हो जाएगा। वो बोला जो मौके की नजाकत समझता था। उसकी एक ही दुकान थी। अखबार की।
थोड़ा बहुत विरोध हुआ। आज कैसे। धंधा का दिन। रोज नहीं आता। साल भर का अवसर। ठीक है तुम जाओ।
दो जिन्हें विज्ञापन के साथ दुकानदारी भी देखनी थी नहीं गए। बाकी चार उस बोलेरो में बैठ गए जो उन्हें ले जाने आई थी। शहर से नदी के घाट तक। 22 किलोमीटर का सफर।
जल्दी आना है। एक बोला।
हाँ। बस गए और लौटे। दूसरे ने कहा।
मैं तो लिस्ट भी नहीं बनाया हूँ। उधर फोन भी नहीं लगेगा। दफ्तर वाले परेशान होंगे। तीसरा अब भी चिंतित था।
चौथा शांत रहा। उसे पता था होना कुछ नहीं है।
सड़क से उतर गाडी कुछ दूर कच्चे रास्तों पर चली फिर रुक गई। आगे एक किलोमीटर पैदल हई जाना होगा।
पैदल। ऐसे तो बहुत देर हो जायेगी। वो बोला जो गाडी में चुप था।
अब आ गए हैं तो चलो।
चल तो रहे ही हैं। इस नदी पर पुल क्यों नहीं बना देती सरकार। उस पार दर्जनों गाँव हैं।
गाँव हैं पर उधर खदानें नहीं हैं ना। उसने फिर व्यंग्य किया जो उन्हें उन गाँवों को दिखाने ले जा रहा था।
हा हा। ये भी सही है। तो कितने मरे हैं उधर।
कम से कम 6 तो एक ही गाँव के हैं। दूसरे गाँवों में और भी होंगे।
चलो देखते हैं।
तट पर पहुंच उन्होंने देखा इकलौती नाव उस पार थी। नदी का चौड़ा पाट। उस ओर खड़ा मल्लाह जंगल से आने वाली सवारियों का इंतज़ार करता रहा। इस ओर ये बेचैन होते रहे।
12 तो यहीं बज गए। उस पार 1 बजे तक पहुँच जाएंगे। फिर इक घण्टे रिपोर्टिंग। 3 तक वापस पहुंच जायेंगे। क्यों सर।
शायद। उस पार उतरकर 7 किलोमीटर पैदल जाना है। तब पहला गाँव आएगा। न किसी के पास राशनकार्ड है न मतदाता परिचय पत्र। अपनी धरती में अनाम अवैध आदिवासी। यह वाकई उनकी हालत पर दुखी था। चाहता था मीडिया जमीनी हकीकत से वाकिफ हो।
पर सर। आधा घण्टा ऐसे ही गुजर गया। पता नहीं नाव कब आएगी। ऐसे तो पहुंचने में ही शाम हो जायेगी। एक बोला।
आज अपन बेकार आ गए। बहुत काम था। दूसरे ने कहा।
लौट चलते हैं। तीसरे ने निर्णय दिया।
मैं तो पहले ही बोल रहा था। वो बोला जो पहले पूरे समय चुप रहा था।
वे वापस लौट आये। इस वादे के साथ कि फिर किसी रोज उन मौतों की रिपोर्टिंग करने जरूर जाएंगे। आज नहीं। धंधे का दिन है।
वो बोलेरो लेकर चला गया। जाते वक्त मुस्कुरा नहीं रहा था। खुलकर हंस रहा था। जानता हूँ तुम्हारी औकात।
कुछ देर बाद वो कलेक्टर के दफ्तर पहुंचा जो सबसे पहले नदी पार जाने को तैयार हुआ था।
साहब से मुलाक़ात हुई।
सर। गणतंत्र दिवस पर आपका इक एड लगाना है।
अरे नहीं नहीं। दूसरे मार डालेंगे।
कुछ नहीं होगा सर। प्लीज
नहीं। आप कहीं और से करिये। साहब ने फिर भी टालने की कोशिश की।
और क्या खबर है सर।
कुछ खास नहीं। तैयारी चल रही है। मंत्री जी कल शाम को पहुंचेंगे।
उधर नदी उस पार बीमारी फैली है क्या। कई मर गये हैं। अरे नहीं। वहां मेडिकल कैम्प लगाने कहा है। मौत की खबर सही नहीं है। एक आदमी मरा है। वो बूढ़ा था। 80 का।
हम उस पार गए थे सर।
अरे कब। उधर नक्सली हैं। इसीलिए दिक्कत आ रही। फिर भी कर रहे हैं। साहब दबाव में आ गए।
सर प्लीज। फुल नहीं तो हाफ पेज ही करवा दीजिये। अब सही मौक़ा था जिसका उपयोग बनता था।
साहब चुप हो गए। फिर बोले किसी को पता तो नही चलेगा।
नहीं सर। अपन आपने दिया किसी को बताएंगे थोड़े ही। आप बोल देना मैं नहीं जानता।
ओके। पर हाफ। फुल नहीं। साहब ने एक फाइल अपनी ओर खींच ली।
नदी के उस ओर से नाव कुछ और बीमारों को लेकर पहुंची थी। घाट पर न डाक्टर न एम्बुलेंस। आदिवासी कावड़ बनाते रहे। यहाँ गणतंत्र की जय जय होती रही।
—अनिल मिश्रा।
2 अक्टूबर 16

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