कृषिकर्म की थकान मिटाने और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने का त्यौहार “चिखल लोंदी “

तिरंगा यात्रा से लौटते समय सुकमा नकुलनार मार्ग पर खेत में रोपा लगाते मिट्टी से होली खेलकर मस्ती करते युवतियों और महिलाओं को देखकर रुकना ही पड़ा…
भूमकाल के पत्रकार प्रभात सिंह द्वारा कैमरे से ली गई बस्तर के माटी की खुशबु लिए खूबसूरत तस्वीर

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इसे कृषि संस्कार या त्यौहार को “चिखल लोंदी ” कहतें है | जिसे गाँव में अंतिम रोपा और मिजाई खत्म होने के दोपहर बाद खेला जाता है | कृषिकर्म की थकान मिटाने और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने का ये बस्तरिया संस्कार है | यह त्यौहार जिन रिश्तों में मजाक की सम्भवनाये होती है उनमें उल्लास ले कर आता है | (जय नारायण सिंह ‘बस्तरिया’)

One thought on “कृषिकर्म की थकान मिटाने और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने का त्यौहार “चिखल लोंदी “

  • September 28, 2016 at 5:08 pm
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