लोक तंत्र की सरेआम हत्या हो रही है

मीनाक्षी नटराजन जी के मामले में रिटर्निंग ऑफिसर (RO) का फैसला विकृत है, कानूनी रूप से गलत है, जिसका समर्थन कानूनन नहीं किया जा सकता ।
- रिटर्निंग ऑफिसर ने जिस आधार पर मीनाक्षी नटराजन जी का नामांकन रद्द कर दिया, वो आधार कानून में Exist ही नहीं करता। ऐसा कोई क्रिमिनल केस था ही नहीं, जिसका मीनाक्षी जी खुलासा कर सकती थीं
- कोर्ट से एक नोटिस आया, जिसमें मीनाक्षी जी से कहा गया कि आप आकर हमें बताइए कि हम केस का संज्ञान लें या नहीं
- मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेना एक प्राथमिक चरण होता है और उसमें ये फैसला किया जाता है कि ये केस आगे चलना चाहिए या नहीं। बिना संज्ञान के कोई भी क्रिमिनल केस जन्म ही नहीं लेता है
- मजे की बात ये है कि चुनाव आयोग के कानून में स्पष्ट लिखा है कि आपको सिर्फ वो खुलासा करना है, जिसमें अपराध अगर सिद्ध हो तो सजा दो साल से ज्यादा हो और जिसमें charges फ्रेम हो चुके हैं। इसे देखने का उत्तरदायित्व RO का होता है
- इस मामले में मजिस्ट्रेट ने संज्ञान नहीं लिया है। मीनाक्षी जी को सुनने के बाद मजिस्ट्रेट संज्ञान लेंगे, उसके बाद जांच होगी और फिर चार्जशीट तैयार होगी और अगर चार्जशीट बनेगी, तब जाकर charges फ्रेम होंगे
- यानी इस मामले में आगे के तीन चरण बचे हैं। मजिस्ट्रेट ने संज्ञान तक नहीं लिया है, मगर RO ने मान लिया कि ये एक क्रिमिनल केस लंबित है
इसके अलावा, हमने कई और मुद्दे रखे और कहा कि ऐसी बेहूदी गलती के कारण राज्यसभा उम्मीदवार का नामांकन रद्द नहीं किया जा सकता है।
ये गणतंत्र के सिद्धांतों के विरुद्ध है और not a level playing field बनता है। ये संविधान के मूल ढांचे को भी विकृत करता है।
हमारी माँग है कि चुनाव आयोग के पास पूरा अधिकार क्षेत्र है कि वे RO के फैसले को रिवर्स कर दें या आदेश निरस्त कर दें। चुनाव आयोग पहले भी हरियाणा और गुजरात के मामलों में हस्तक्षेप कर चुका है।
