छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा आदिवासी आंदोलन

आदिवासी मारो सरकारी अभियान के खिलाफ 21 नवम्बर को जनता सड़को पर उतरे

रमेश ठाकुर @ भूमकाल समाचार रायपुर

छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर संभाग के कांकेर जिला से 4 बार सांसद सदस्य रहे सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक श्री सोहन पोटाई जी ने गोंडवाना दर्शन के प्रतिनिधि से एक मुलाकात के दौरान बस्तर के भयावह स्थिति पर चर्चा कर बताया कि देश के भीतर पिछले छ: दशक के बाद भी सरकार आदिवासियों के दुर्दशा व दशा को समझने में जानबूझकर नाकाम रही है। बहरहाल छत्तीसगढ़ राज्य में सत्तारूढ़ भा.ज.पा. के डॉ. रमन सरकार युगो-युगो से रहने वाली आदिवासी समाज को कानून और व्यवस्था में सबसे बड़े बाधा मानकर उन्हें जल, जंगल, जमीन से नहीं ब्लकि इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए रूखसत करने हेतु युद्ध स्तर पर कार्य करने में लगी हुई है। जिसका प्रमुख कारण है कि मूल निवासीयों के निवास स्थान के भू-गर्भ के अंदर छिपे अकुत प्राकृतिक सम्पदा को कैसे बड़े-बड़े कम्पनीयों के मालिक उद्योगपतियों को खैरात के रूप में मनमर्जी माफिक बांट सके।
गौरतलब है कि विगत दो दशकों से बस्तर के महज वनाचल क्षेत्रों में निवासरत आदिवासी लोग न जाने कब कौन किस समय यमराज रूपी बस्तर पुलिस के गोली के शिकार हो जाये, या कल किसे नक्सली के मदद्गार सहयोगी होने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल के अंदर ठूस दे कुछ कहा नहीं जा सकता। इस तरह से बस्तर के लोग दहशत मे जीवन जी रहे है। जबकि यहां के मूल निवासी जनता जनना चाहती है कि स्वतंत्र भारत में देश का संवैधानिक कानून आदिवासियों के हित में लागू है या नहीं ? यह जग जाहिर है कि पूरे विश्व में प्रकृति बचाने, अनमोल संस्कृति के जनक बस्तर के लोग विश्व विख्यात है एैसे स्थानों में रहने वाले लाखों लोग वर्ष 2006 के समय में सरकार के सलवा जूडूम नामक सरकारी संरक्षण प्राप्त आंदोलन से पीडित प्रभावित होकर अपनी जान बचाने के लिए आंध्रप्रदेश, तेलांगना की सीमावर्ती स्थानों की ओर पलायन किए हुए हैं जिनकी पुनर्वास की दिशा में एक इंच भी सरकार ने काम नहीं किया गया है। और आज के वर्तमान समय में इस सरकार के द्वारा आदिवसियों के समूल नाश करने के लिए आदिवासी मारों के रूप में अभियान छेडने वाली पुलिस अधिकारी के कारगुजरियों पर ध्यान न दे कर उल्टा उनके ही पीठ को थपथपा रही है, जिसका उदाहरण है कि हाल के समय में अगस्त माह के अंतिम सप्ताह में प्रदेश के मंत्रालय में पुलिस अधिकारियों के विडियों कान्फ्रेंस में सभी आई.पी.एस. अधिकारियों को डा. रमन सिंह यह कहते है कि पुलिस अधिकारियों को बस्तर के आई.जी.एस.आर.पी. कल्लूरी के काम करने वाली तरीके से सीख लेकर काम करना चाहिए।
जबकि इसी पुलिस अधिकारी के सरगुजा पदस्थापना कार्यकाल के दौरान बलरामपुर जिला की चांदो अन्तर्गत ग्राम करचा की आदिवासी नाबालिक लड़की कु. मीना खलको के साथ सामूहिक बलात्कार कर उनकी हत्या करते हुए उन्हें फर्जी नक्सली घोषित कर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास हुआ था जिसमें सरकार के द्वारा गठित न्यायिक जांच आयोग ने दूध का दूध, पानी की तरह साफ करते हुए कु. मीना खल्को को र्निदोष साबित कर उनके साथ दुष्र्कम करने वाले पुलिस अधिकारी-कर्मचरी के खिलाफ कार्यवाही करने का आदेश जारी कर चुके है लेकिन आदिवासी नाबालिक से बलात्कार-हत्या के प्रकरण में दो वर्ष से जारी हुए आदेश में आज दिनांक तक क्यों कार्यवाही नहीं की गई है ? सरकार क्यों चुप्पी साधे हुई है, सरकार की यह रवैय्या आदिवासियों के प्रति शासन प्रशासन कितना संवेदनशील है इससे बड़ा प्रमाण और कोई नहीं हो सकता। और आज इसी पुलिस अधिकारी को पूरे बस्तर संभाग के प्रमुख पुलिस अधिकारी के रूप में कमान सौंप दी गई है। बस्तर के आई.जी.आर.एस.पी. कल्लूरी का दुरसाहस तो देखिए जिस तरह सरगुजा में नाबालिक मीना खल्को के साथ घटना घटित हुआ ठीक उसी तरह बस्तर की बेटी / सुकमा जिले की गोमपाड निवासी आदिवासी युवती मडकामी हिडमें के साथ घटित बलात्कार व हत्या फर्जी नक्सली घोषित प्रकरण में दैनिक समाचार पत्रों को प्रेस वक्तय जारी कर बडे दावे के साथ कहते है कि गोमपाड की मडकामी हिडमें के साथ बलात्कार हुआ ही नहीं है ? तो फिर सवाल यह उठता है कि आखिर मडकामी हिडमें को क्यों मारा गया ? जबकि पुलिस द्वारा उन्हें उनकी मॉं की उपस्थ्िित में सुबह के समय घर से घसीट कर जब ले जा रहे थे तब इस दौरान शोर गुल सुनकर गॉंव की कई महिलाओं ने उनकी मॉं के साथ मिलकर मडकामी हिडमें को पुलिस के चुंगल से छुड़ाने के अनेको प्रयास किया गया जिसमें पुलिस के द्वारा महिलाओं से मारपीट करने के साथ गोली चलाने की धमकी से मडकामी हिडमें को नहीं छुडा पायी और जिसके बाद में मडकामी हिडमें के साथ क्या-क्या कैसे घटना घटित हुआ यह उस क्षेत्र की महिलाएं आज भी गवाही देने को तैयार है। बस्तर में आदिवासीयों के साथ जो घटना घट रही है वह देश के अन्य नागरिकों के साथ एैसा अमानवीय अत्याचार-कृत्य नहीं हो रहा है। आदिवासियों में क्या जवान, बूढ़े, महिलाओं, बच्चों को अब भी बख्शा नहीं जा रहा है। जो कि सितम्बर 2३ तारीख की घटना दिल दहला देने वाली है। दंतेवाड़ा जिला के बारसूर पोटा केबिन (स्कूल) में वर्ष 2015-16 तक अध्यरत रहने वाले बुरगुम क्षेत्र अंतर्गत ग्राम भटपाल (गरदापारा) के रहने वाले 14 वर्षीय सोनकू उर्फ सुकालू राम सोमडूराम उर्फ बिजली जो कि अपनी बुआ के घर शोक संदेश देने के लिए गये हुए थे। जिन्हें पुलिस फोर्स सुबह 4 बजे पकड़कर ले जाते है और गोली मार व गला रेत कर हत्या कर देते हैं पुलिस के द्वारा आदिवासियों को पकड़कर गोली मार देना उन्हें नक्सली घोषित कर मामले में पर्दा डालदेना कोई पहली घटना नहीं है इसके पहले भी कई नाबालिंक बच्चे जैसे बीजापुर जिला के सेन्ड्रा क्षेत्र में कक्षा 8वीं में अध्ययनरत छात्र की हत्या का प्रकरण, नारायणपुर जिला के ओरछा में अपनी माँ के साथ बाजार आये कक्षा 10वीं के छात्र की उनकी माँ की आंखो के समक्ष गोली चलाकर हत्या कर देना जैसे अनगिनत सैकड़ों आदिवासीयों की हत्या के मामले है जिस पर न्याय देने वाला आदिवासियों की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है।
श्री पोटाई जी ने आगे कहा कि बस्तर में सरकारी आंतक वाद जिस तरह से चरम सीमा में पहुच कर मौत का तांडव मचा रहा है उससे पूरे आदिवासी समुदाय का अस्तित्व, जीवन संकट में पड गया जिनसे मुक्ति पाने के लिए सामाजिक रूप से संगठित हो कर प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अपनी पीडा को व्यक्त करने हेतु दिनांक 21 नवम्बर को बस्तर संभाग के प्रत्येक जिलों के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय व राज्य मार्ग में हजारों की संख्या में सड़कों पर उत्तर कर एक दिन की आर्थिक नाकेबंदी (चक्का जाम) किया जायेगा। जिसमें निम्न मांगों को शामिल किया जायेगा।
1. नक्सली उन्मूलन के नाम पर बस्तर में गठित आदिवासी बटालियन भर्ती को रद्द किया जाये।
2. आदिवासी क्षेत्र में लागू 5वी अनुसूची कानून का कडाई से पालन क्रियान्वय किया जाये।
3. भूमि अधिग्रहण प्रकरण में पीडित किसानों को शेयरधारी के रूप् में उनकी पुर्नवास, व्यवस्थापन किया जाये।
4. बस्तर संभाग के सभी विभागों में तृतीय व चर्तुथ के पदों पर 100 प्रतिशत आदिवासियों की भर्ती हेतु आरक्षण सुनिश्चित किया जाये।
5. पांचवी अनुसूची क्षेत्र में गैर आदिवासियों को दिये जाने वाले आबादी भूमि पट्टा मालिकाना हक को रद्द किया जाये।
6. पूरे बस्तर संभाग को एक अलग बस्तर राज्य बनाया जाये।
7. अभी तक हुए नक्सली मुटभेड एवं नक्सली गिरफ्तारी के प्रकरण में केन्द्रीय स्तर पर जांच कमेटी का गठन कर फर्जी मुटभेड व गिरफ्तार मामले दोषी अधिकारी कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही किया जाये।

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